कैसा होता है दुनिया के 'सबसे ख़ुशनुमा देश' में डिप्रेशन में होना?

  • 30 सितंबर 2019
कैसा होता है विश्व के 'सबसे ख़ुशनुमा देश' में अवसादग्रस्त होना ? इमेज कॉपीरइट Maddy Savage

गुनगनी धूप में उत्तरी यूरोपीय शैली के फ़र्नीचर से सुशोभित कॉफ़ी शॉप में बैठे टूका सारनी फ़िनलैंड की एक जानीमानी शख़्सियत हैं. फ़िनलैंड लगातार दूसरे वर्ष संयुक्त राष्ट्र की 'सबसे ख़ुशनुमा' देशों की सूची में सबसे ऊपर रहा है.

और टूका सारनी इसी उपलब्धि का जानामाना चेहरा बन चुके हैं. 19 वर्षीय टुका सारनी ने हाल ही में हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की है और कुछ ही महीनों में उन्हें किराना की एक दूकान में नौकरी मिल गयी है, जहां वो जल्द ही काम पर लग जाएंगे.

वो मानते हैं कि अगर उनकी ज़िंदगी के ख़ुशी के स्तर को वो नापें तो वो उसे 10 में से 10 अंक देंगे. वो कहते हैं ना उन्हें और ना उनके मित्रों के गुट में कभी किसी को डिप्रेशन (अवसाद) का सामना करना पड़ा.

वो कहते है, "फ़िलहाल मैं बहुत ख़ुश हूं. हमारी ज़िंदगी बहुत अच्छी है. यहां कई बार मौसम सुहाना होता है. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं अच्छी हैं."

उन्हें फ़िनलैंड का प्राकृतिक सौंदर्य पसंद है, ख़ुश हैं कि देश में बेरोज़गारी की दर कम है. और देश की संस्कृति दोस्तों के साथ समय बिताने को ही नहीं बल्कि निजता को भी प्रोत्साहित करती है.

वो कहते हैं, "काफ़ी नौकरियां हैं. मुझे लगता है अगर कोई नौकरी ढूंढना चाहे और आवेदन करे तो सबको काम मिल सकता है."

यह कुछ पैमाने हैं, जिन्हें देश में सुरक्षा, विश्वास, बेरोज़गारी और आर्थिक विषमता की कम दर के साथ जोड़ कर देखें तो समझा जा सकता है कि क्यों फ़िनलैंड विश्व के ख़ुशनुमा देशों की सूची में कई बार चोटी पर रहता है, हालांकि यह दर्जा विवादास्पद हो सकता है.

उत्तरी यूरोप के केवल 55 लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश के बारे में ऐतिहासिक तौर पर यह धारणा रही है कि यहां लोग कुछ उदास क़िस्म के होते हैं क्योंकि यहां सर्दी और कम रौशनी का मौसम लंबा होता है.

इस तरह कि धारणा रही है कि वहां मदमस्त तरीक़े से ख़ुशियां व्यक्त करते लोग कम पाए जाएंगे. लेकिन उत्तरी यूरोप के अपने अन्य पड़ोसी देशों की तरह फ़िनलैंड भी अच्छे जीवन की आत्मपरक व्याख्याओं की कई कसौटियों पर खरा उतरता है.

मज़बूत समाज कल्याण व्यवस्था और विषमता की निचली दर के चलते वहां टूका सारनी जैसे कई युवाओं को डिप्रेशन से जूझना नहीं पड़ता.

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कहीं अधिक पेचीदा दुनिया

लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि फ़िनलैंड की यह ख़ुशनुमा छवि दरअसल वहां के लोगों, ख़ास तौर पर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी मौजूदा समस्याओं पर पर्दा डाल रही है.

कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस छवि की वजह से फ़िनलैंड के लोगों के लिए इस समस्या की मौजूदगी को और डिप्रेशन के लक्षणों को देख पाना और उसे स्वीकार कर के उसके इलाज का प्रयास करना मुश्किल हो जाता है.

1990 के दशक की तुलना में फ़िनलैंड में आत्महत्या की दर सभी आयु वर्ग में अब पचास प्रतिशत घट चुकी है. इस बदलाव की वजह आत्महत्याओं को टालने के लिए शुरु किए गए अभियान और डिप्रेशन के इलाज के बेहतर तरीक़े बताए जाते हैं.

लेकिन फ़िनलैंड में आत्महत्याओं की दर अभी भी यूरोप की औसत दर से अधिक है. 15 से 24 वर्ष के आयु वर्ग में होने वाली मौतों में से एक तिहाई मौतें आत्महत्या की वजह से होती हैं.

उत्तर यूरोपीय मंत्रियों और कोपनहैगन की हैपीनेस रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा 2018 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, फ़िनलैंड में 18 से 23 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 16 % महिलाओं और 11% युवा पुरुषों ने अपने आपको डिप्रेशन का शिकार (अवसादग्रस्त) बताया. 80 वर्ष और उससे अधिक के आयुवर्ग में यह स्तर और अधिक पाया गया.

फ़िनलैंड में डिप्रेशन की समस्या पर अंतिम बार विस्तृत राष्ट्रव्यापी अध्ययन 2011 में किया गया था. फ़िनलैंड मेंटल हेल्थ नामक ग़ैर सरकारी संस्था का क़यास है कि पिछले वर्ष 30 साल से कम आयुवर्ग में लगभग 20% लोगों में डिप्रेशन के लक्षण पाए गए.

फ़िनलैंड मेंटल हेल्थ के एक मनोवैज्ञानिक यहो मेरटानेन कहते हैं, "यह हर जगह व्याप्त है. और संकेत तो यही हैं कि यह फैल रहा है. हालांकि यह वृद्धि इतनी नहीं है जितना कि यहां का मीडिया दावा करता है."

2017 में नॉर्डिक सेंटर फॉर वेलफ़ेयर ऐंड सोशल इशूज़ की रिपोर्ट में नशीले पदार्थों और बुरे स्वास्थ्य के बीच संबंध पर ख़ास तौर पर ज़ोर दिया गया था. रिपोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया गया था कि फ़िनलैंड के लोग पड़ोसी देश के लोगों की तुलना में शराब का सेवन अधिक करते हैं. रिपोर्ट में कहा गया था कि 25 से 34 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों में नशीले पदार्थों के सेवन में वृद्धि हुई है.

हालांकि फ़िनलैंड में राष्ट्रीय स्तर पर बेरोज़गारी की दर कम है लेकिन युवाओं मे यह दर अधिक है. 2018 के अंत तक 15 से 19 वर्ष के बीच के लोगों में लगभग 12.5% लोग बेरोज़गार थे जो कि अन्य उत्तर युरोपीय देशों की तुलना में अधिक है. यही नहीं बल्कि यह इस आयुवर्ग में यूरोपीय संघ की औसत बेरोज़गारी की दर से भी एक प्रतिशत ज़्यादा है.

फ़िनलैड भले ही ख़ुशनुमा देशों की सूची में विश्व में चोटी पर हो, लेकिन वहां नशीले पदार्थों के सेवन और युवाओं में डिप्रेशन और आत्महत्या की दर यूरोपीय औसत से कहीं अधिक है.

मर्टेनन मानते हैं कि रोज़गार के क्षेत्र में आजकल जो अनिश्चितता है उसका भी असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है. वो कहते हैं अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में फ़िनलैंड आर्थिक तौर पर स्थिर देश है मगर यहां विषमता बढ़ रही है.

मर्टेनन मानते हैं फ़िनलैंड भी वैश्विक अर्थव्यवस्था और डिजीटल तकनीक से प्रभावित हो रहा है.

वो कहते हैं, "दुनिया अधिकाधिक पेचीदा हो रही है. अर्थव्यवस्था बदल रही है. पेशों में पहले जैसी स्थिरता नहीं है."

साथ ही मर्टेनन सोचते हैं कि सोशल मीडिया का भी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ रहा है. वो यह भी मानते हैं कि अभी तक इस प्रभाव के बारे में जो अधययन हुए हैं, वो सीमित ही हैं.

मगर वो यह दलील भी देते हैं कि "डिप्रेशन के शिकार व्यक्ति में औरों से तुलना की प्रवृत्ति अधिक होती है और सोशल मीडिया इसके लिए ज़रिया बनता है. और लोग सोशल मीडिया पर अपने सबसे दुखी लम्हों की तुलना दूसरों के सबसे सुखद क्षणों से करने में लग जाते हैं."

मर्टेनन कहते हैं विश्व के 'सबसे ख़ुशनुमा देश' होने की फ़िनलैंड की छवि का भी यहां के लोगों के दिमाग़ पर असर पड़ता है. क्योंकि लोगों को लगता है कि इस छवि के अनुसार तो सबको ख़ुश होना चाहिए लेकिन बहुत से युवा अपने अनुभवों का इस सामान्य धारणा से कोई मेल नहीं पाते.

कई युवा, जिन्होंने डिप्रेशन झेला है, वो उनके विचारों से सहमत हैं.

किर्सी मारिया मोबर्ग अब 34 साल की हैं लेकिन किशोरावस्था में ही वो डिप्रेशन की शिकार हो गयी थीं और क़रीब तीस वर्ष की आयु तक वो इस बीमारी से जूझती रहीं. वो बताती हैं, "आपको लगता है कि फ़िनलैंड जैसे देश में, जहां जीवन स्तर इतना ऊंचा है, वहां आपका डिप्रेशन का शिकार होना जायज़ ही नहीं है."

कई विशेषज्ञों के अनुसार फ़िनलैंड की 'सबसे ख़ुशनुमा देश' होने की छवि का वहां के लोगों पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है.

27 वर्षीय यॉन युंटुरा एक डॉक्टर हैं मगर विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान छह महीने तक वो डिप्रेशन का शिकार रहे थे.

यॉन युंटुरा कहते हैं, "आपको लगता है कि फ़िनलैंड में सब सही होना चाहिए, जबकि ऐसा नही है."

वो कहते हैं कि आम तौर पर निजी मुश्किल हालात जैसे संबंध विच्छेद या विश्व की घटनाएं, जैसे आर्थिक मंदी भी डिप्रेशन का कारण बन सकती हैं. यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, चाहे जीवन स्तर कैसा भी हो."

यॉन युंटुरा कहते हैं, "आंकड़ों के आधार पर फ़िनलैंड सबसे ख़ुशनुमा देश है मगर आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखातीं. क्योंकि अवसाद एक बीमारी है और ज़रूरी नहीं कि इर्दगिर्द की परिस्थितियां उसका कारण हों. मैं ख़ुद इसका शिकार हुआ."

"वो भी तब जब मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही थी. मुझे मज़ा आ रहा था. मेरे किसी के साथ ख़ूबसूरत प्रेम संबंध भी थे. मेरे जीवन में कोई बड़ी समस्या नहीं थी. फिर भी मैं डिप्रेशन से पीड़ित हो गया."

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सामाजिक कलंक

अधिकांश मनोस्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि डिप्रेशन और व्याकुलता जैसी मानसिक समस्याओं पर खुल कर बात करने में जो झिझक थी वो अब फ़िनलैंड में ख़त्म हो रही है. आत्महत्याएं टालने के लिए चलाए गए देशव्यापी अभियान से भी इसमें सहायता मिली है. इससे कई लोगों ने डिप्रेशन के इलाज के लिए प्रयास शुरु किए.

लेकिन किर्सी मारिया मोबर्ग सहित फ़िनलैंड के कई युवाओं का मानना है कि डिप्रेशन को वहां अभी भी एक सामाजिक कलंक की तरह देखा जाता है.

किर्सी मारिया मोबर्ग कहती हैं, "यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि फ़िनलैंड में आप कहां रहते हैं, किस तबक़े में रहते हैं, वहां इस बात को लेकर कितना खुलापन है. लेकिन आम तौर पर डिप्रेशन को लेकर लोगों में झिझक अभी भी है."

"वहीं यह एक ऐसा समाज है, जहां लोगों की निजता को काफ़ी महत्व दिया जाता है और लोग दूसरों से निजी मसलों पर कम ही चर्चा करते है. वहां डिप्रेशन के शिकार लोगों के लिए अपनी बीमारी पर अन्य लोगों से बात कर पाना इतना सहज नहीं होता. अत: फ़िनलैंड में कई लोगों के लिए डिप्रेशन एक बड़ी चुनौती बन जाती है."

यॉन युंटुरा कहते हैं कि आमतौर पर एक दूसरे से बहुत कम बातें साझा करने की आदत की वजह से फ़िनलैंड के लोगों के लिए और ख़ासतौर पर वहां के युवाओं के लिए अपनी डिप्रेशन की बीमारी के बारे में खुल कर बात करना बहुत कठिन होता है.

"मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को कमज़ोरी की तरह देखा जाता है. और किसी मर्दानी संस्कृति में लोगों के लिए यह दिखाना मुश्किल होता है कि वो बुरा महसूस कर रहे हैं. इसलिए कई लोगों के लिए अपनी इस बीमारी के बारे में बात करना मुश्किल होता है."

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इलाज के प्रयास

डिप्रेशन के लिए चिकित्सा प्रदान करने कि ज़िम्मेदारी म्यूनिसिपल प्रशासन की होती है और यह सेवाएं सस्ती होती हैं, इसलिए डिप्रेशन या अन्य मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए इलाज मुश्किल नहीं होना चाहिए.

लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इस बात पर राजनीतिक चर्चा तेज़ हुई है कि मानसिक बीमारियों से प्रभावित लोगों को, ख़ास तौर पर बड़े शहरों में इलाज के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता है. फ़िनलैंड के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में भी यही समस्या है.

एमी कुसमेनेन, जो हेलसिंकी के एक हाईस्कूल के छात्रों की मदद करती हैं, वो कहती है, "जल्दी इलाज करवा पाना बहुत मुश्किल है. कई बार मदद मिलने में कई हफ़्ते या महीने तक लग जाते हैं. ज़रूरतें बढ़ गयी हैं लेकिन स्वास्थ्य सेवाए उस गति से नहीं बढी हैं."

फ़िनलैंड मेंटल हेल्थ के मनोवैज्ञानिक यहो मरटेनेन कहते हैं, "मानसिक बीमारियों के इलाज में देर होने से समस्या और कठिन हो जाती है. ख़ासतौर पर युवाओं के लिए जल्दी इलाज ना होने से उनके ठीक होने में मुश्किलें बढ़ जाती हैं."

इस क्षेत्र में एक माध्यम है, जो पिछले कुछ वर्षों में बहुत लोकप्रिय हुआ है, वो है ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म मेंटल हैल्थ हब. इसे हेलंसिकी यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में प्रोफ़ेसर ग्रिगोरी यॉफ़ और डॉक्टर मैटी होली ने शुरू किया था ताकि कम आबादी वाले दूरस्थ ग्रामीण इलाकों तक मानसिक समस्याओं के इलाज संबंधी जानकारी पहुंचाई जा सके.

इस वेबसाइट पर यह जानकारी है कि इलाज के लिए कहां जाना चाहिए, साथ ही थेरपी वीडियो भी उपलब्ध हैं, जिनसे मामूली या सामान्य डिप्रेशन से निबटने में मदद मिलती है. साथ ही मेंटल हेल्थ फ़िनलैंड टेलिफ़ोन के ज़रिए भी सहायता दे रहा है.

इसी दौरान देशभर में एक अपील जारी की गयी, जिसमें मांग की गयी थी कि मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को एक महीने के भीतर सहायता की गारंटी दी जाए. इस अपील पर अब तक 50,000 लोगों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं, जो यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है कि इस मुद्दे पर अब संसद मे चर्चा हो.

फ़िनलैंड की परिवार कल्याण मंत्री क्रिस्टा कियूरू ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है. इसके इलाज की गारंटी को लागू करने में सालाना साढ़े तीन करोड़ यूरो का खर्च आएगा. मगर इसके लिए मुहिम चलाने वालों का कहना है कि सरकार को इस खर्च का दस गुना फ़ायदा होगा क्योंकि बीमारी की वजह से ली जाने वाली छुट्टियों और बेरोज़गारी में कमी आएगी.

वैश्विक जागरुकता

डॉक्टर यॉन यूंटूरा को विश्वास है कि फ़िनलैड को मौजूदा चुनौतियों के बावजूद युवाओं में डिप्रेशन की समस्या से निबटने में स्वास्थ्य सेवाएं और बेहतर होंगी.

वो आशा करते हैं कि जिस प्रकार विश्व में डिप्रेशन के बारे में जागरूकता आ रही है, उसी तर्ज़ पर फ़िनलैड में भी एक राष्ट्रस्तरीय संवाद क़ायम होगा.

यॉन युंटुरा कहते हैं, "धीरे-धीरे लोग समझ रहे हैं कि मानसिक स्वास्थ्य कितना महत्वपूर्ण मुद्दा है और इसके लिए कितने संसाधनों की आवश्यकता है. अभी बहुत कुछ होना बाक़ी है लेकिन मुझे आशा है इसमें हमें सफलता मिलेगी."

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