मल-मूत्र से लग सकता है आमदनी का अंदाज़ा?

  • 30 अक्तूबर 2019
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क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी की एक प्रयोगशाला कुछ असामान्य नमूनों को इकट्ठा कर रही है. ये नमूने ऑस्ट्रेलिया की 20 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी के मानव अपशिष्टों यानी मल-मूत्र के हैं.

देश भर के अपशिष्ट जल शोधन संयंत्रों से नमूने लेकर, उन्हें ठंडा करके यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं को भेजा गया है.

इन नमूनों को ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न समुदायों के आहार और दवा की आदतों के बारे में जानकारियों का खजाना माना जा रहा है.

ये नमूने 2016 में हुई ऑस्ट्रेलिया की आख़िरी राष्ट्रीय जनगणना के समय जमा किए गए थे.

रिसर्च फेलो जेक ओ'ब्रायन और पीएचडी कैंडिडेट फिल चोई ने ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न समुदायों के आहार और जीवनशैली संबंधी आदतों को मापने के लिए इन नमूनों का विश्लेषण किया.

उन्होंने पाया कि सामाजिक-आर्थिक रूप से संपन्न इलाकों में फाइबर (रेशेदार भोजन), सिट्रस (खट्टे फल) और कैफ़ीन (चाय-कॉफी) की खपत अधिक थी. कम संपन्न इलाकों में डॉक्टरी दवाइयों की खपत ज़्यादा थी.

संक्षेप में कहें तो शोधकर्ताओं ने पाया कि अमीर समुदाय का आहार अधिक सेहतमंद था. ये सारी सूचनाएं उस समुदाय के मल-मूत्र में छिपी हुई थीं.

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खपत की जानकारी

पहले के शोधकर्ताओं ने सैद्धांतिक रूप से माना था कि ऐसी जांच संभव है. गटर के पानी की जांच करके किसी समुदाय के भोजन और दवाइयों की खपत के बारे में भरोसेमंद जानकारी हासिल की जा सकती है.

इस अध्ययन में पहली बार उसे अमल में लाने की कोशिश की गई.

चोई और ओ'ब्रायन का कहना है कि इस तरीके से शोधकर्ताओं को जीवनशैली में हो रहे बदलावों के वास्तविक संकेत मिल सकते हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति बनाने में मदद मिल सकती है.

गटर के पानी की जांच करके किसी समुदाय के बारे में सूचनाएं निकालने के विज्ञान को अपशिष्ट जल महामारी विज्ञान कहा जाता है. यह करीब दो दशकों से प्रयोग में है.

यूरोप, उत्तर अमरीका और दूसरी जगहों पर इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से नशीली दवाइयों के इस्तेमाल पर निगरानी रखने में किया जाता है.

निकोटिन जैसी वैध दवाइयों के इस्तेमाल की निगरानी के लिए भी ऐसे अध्ययन किए गए हैं.

कुछ शोध टीमें बीमारियां फैलने से पहले उसका पता लगाने में इसके इस्तेमाल के बारे में सोच रही हैं. लेकिन आहार के बारे में पता लगाने के लिए इस तरह की जांच अब तक सैद्धांतिक ही थी.

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सटीक आंकड़े

आहार और वैध दवाइओं की खपत का पता लगाने के लिए सर्वेक्षणों का इस्तेमाल होता है, लेकिन गटर के पानी का विश्लेषण करके किसी ख़ास जलग्रहण क्षेत्र में उनके औसत उपयोग को मापा जा सकता है.

चोई का कहना है कि सर्वेक्षणों में दवा के इस्तेमाल या भोजन के बारे में पूछने पर लोग कभी-कभी अपनी आदतों को हक़ीक़त से अधिक सेहतमंद बताते हैं.

लोग स्वस्थ भोजन की खपत के बारे में ज़्यादा और स्नैक्स जैसी चीजों की खपत को कम करके बताते हैं.

ओ'ब्रायन का कहना है कि अपशिष्ट जल का विश्लेषण दो प्रमुख तरीकों से उपयोगी हो सकता है.

पहला समुदायों के बीच गैर-बराबरी की पहचान करने में और दूसरा, समय के साथ उन समुदायों में आने वाले बदलावों पर नज़र रखने में.

"यदि आप सकारात्मक बदलाव के लिए कुछ लागू करने जा रहे हैं तो आपको उन उपायों की सफलता को मापने में सक्षम होने की ज़रूरत है."

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Image caption क्वींसलैंड

कॉफी की आदत

शोधकर्ताओं के सामने शुरुआती चुनौती यह थी कि वे क्या परीक्षण कर सकते हैं.

गटर के पानी में सिर्फ़ मल-मूत्र नहीं होता, उसमें पर्सनल केयर उत्पाद, भोजन के टुकड़े, औद्योगिक और व्यावसायिक कचरा भी होता है.

शोधकर्ताओं को भोजन के उन जैव संकेतकों को खोजना था जो सिर्फ़ या प्रमुखता से मानव मल-मूत्र में होते हैं.

अध्ययन में फाइबर की खपत से जुड़े दो जैव संकेतकों का उपयोग किया गया- पहला, पौधों और अनाजों से मिलने वाला और दूसरा खट्टे फलों से मिलने वाला.

फाइबर और खट्टे फल, दोनों का सेवन स्वस्थ आहार में शुमार किया जाता है. सामाजिक और आर्थिक तरक्की के पैमानों पर ऊंचे समुदायों में इन दोनों की खपत ज़्यादा थी.

मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि अमीर इलाकों में फाइबर और खट्टे फलों से समृद्ध भोजन की खपत ज़्यादा थी.

उच्च सामाजिक-आर्थिक समूहों में कैफीन का सेवन भी अधिक था, ख़ास तौर पर महंगे किराये वाले इलाकों में.

दूसरे अध्ययनों में भी पुष्टि हुई है कि स्नातक या उससे बड़ी डिग्री वाले लोग एस्प्रेसो और ग्राउंड कॉफी का बार-बार सेवन करते हैं.

रिपोर्ट के लेखकों का सुझाव है कि यह रोजाना कॉफी पर ख़र्च करने की क्षमता और अमीर ऑस्ट्रेलियाइयों में कॉफी पीने की संस्कृति, दोनों वजह से है.

दवाइयों के अवशेष

सामाजिक-आर्थिक पैमाने के दूसरे छोर पर खड़े गरीब समुदायों में ट्रामाडोल (दर्दनिवारक), एटेनोलोल (हाई ब्लड प्रेशर की दवा) और प्रेगैबलिन (एंटी-सीज़र दवा) जैसी दवाइयों की खपत अधिक थी.

इनमें से आख़िरी दो दवाइयों की मौजूदगी बूढ़े लोगों में भी ज़्यादा होती है, लेकिन ये कम आय से भी जुड़ी हैं.

ग़रीब इलाकों के गटर के पानी में अन्य दर्द निवारक और अवसाद निवारक दवाइयां भी मिलीं, लेकिन उतनी बड़ी मात्रा में नहीं.

चोई का कहना है कि अमीर और ग़रीब जलग्रहण क्षेत्रों की तुलना चौंकाने वाली हो सकती है.

"हमने जो देखा, सिर्फ़ उन आंकड़ों को देखिए- एक समुदाय से दूसरे समुदाय की तुलना देखिए- फाइबर के जैव संकेतकों में कई गुणा के अंतर हैं."

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि अगली जनगणना में वो ये सर्वेक्षण दोबारा करेंगे. इससे यह पता चल सकेगा कि इस दौरान क्या बदलाव हुए हैं जो दूसरे शोध तरीकों की पकड़ में नहीं आए या जिनकी और जांच की ज़रूरत है.

मिसाल के लिए, इस अध्ययन में एंटीबायोटिक दवाइयों का इस्तेमाल सभी सामाजिक-आर्थिक हैसियत वाले समूहों में एक जैसा मिला.

यह इस बात का संकेत था कि सरकारी सब्सिडी से चल रहा हेल्थकेयर सिस्टम अपना काम कर रहा है.

भविष्य के सर्वेक्षणों में क्या यह वितरण बदलेगा- तब यह अलग शोध का विषय होगा कि किसी समूह में किसी एक दवा की पहुंच कैसे और क्यों कम हो गई.

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नब्ज़ पर उंगली

यह अध्ययन सेहत के बारे में एक वैश्विक परिघटना को पुष्ट करता है, जिसे सेहत के सामाजिक अनुपात के रूप में जाना जाता है.

यह अच्छी सेहत से जुड़े कारकों को प्रतिबिंबित करता है. जैसे सामाजिक-आर्थिक हैसियत बढ़ने पर धूम्रपान की दर और मोटापे का स्तर बढ़ता है.

हालांकि ऑस्ट्रेलियाई अपने देश को समतावादी मानते हैं, लेकिन गटर के पानी की रिपोर्ट में जिस सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी का संकेत मिला है, वह गंभीर है.

2018 की एक रिपोर्ट में पाया गया था कि ऑस्ट्रेलिया में OECD देशों के औसत से ज़्यादा गैरबराबरी थी, हालांकि इसकी रैंकिंग ब्रिटेन और अमरीका से अधिक बराबरी वाले समाज के रूप में है.

ऑस्ट्रेलिया में 20 फ़ीसदी शीर्ष आय समूह के व्यक्तियों की आय गरीब समूह के सदस्यों की आमदनी से पांच गुना है.

अधिक पैसे का मतलब है फल और सब्जियां खरीदने की ज़्यादा क्षमता, जबकि अधिक शिक्षा का मतलब है कि पोषण के बारे में अधिक समझ.

इस अध्ययन में वर्ग और आहार संबंध में एक महत्वपूर्ण अपवाद पाया गया.

सामाजिक-आर्थिक पैमानों पर नीचे होने के बावजूद जिन इलाकों में गैर-अंग्रेजी भाषियों की तादाद ज़्यादा थी वहां फाइबर और खट्टे फलों की खपत अधिक थी.

इससे आप्रवासी लोगों के पारंपरिक खाने में सब्जियों की प्रचुरता का पता चलता है.

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भविष्य की तकनीक

विक्टोरिया की डीकिन यूनिवर्सिटी में महामारी विज्ञान की प्रोफेसर कैथरीन बेनेट का कहना है कि क्वींसलैंड का अध्ययन इस तकनीक को अगले स्तर पर ले जाएगा.

जनगणना में इसे शामिल करना भी बड़ा कदम है. शोधकर्ताओं को इसकी सीमाओं का पता है.

बेनेट कहती हैं, "महामारी विज्ञान में हम इसे पारिस्थितिकी अध्ययन कहते हैं. हम व्यक्तिगत आंकड़ों का नहीं, सामूहिक आंकड़ों का अध्ययन करते हैं."

इस तरह के अध्ययनों का इस्तेमाल ऑस्ट्रेलिया में सिगरेट की प्लेन पैकेजिंग शुरू होने के बाद गटर के पानी में निकोटिन की मात्रा कम होने का पता लगाने में किया गया था.

"आप नहीं जानते कि धूम्रपान करने वालों ने सिगरेट पीनी कम कर दी या समाज में धूम्रपान करने वालों की तादाद घट गई."

"इस तरह के पारिस्थितिकी अध्ययन करने में हमें थोड़ी अतिरिक्त सावधानी रखनी होती है क्योंकि यह व्यापक समझ से जुड़ी होती है."

हाल के आहार और दवा अध्ययन की तरह निकोटिन शोध को दूसरे शोधों से तुलना करके मान्यता दी गई थी.

इससे यह संकेत मिलता है कि अपशिष्ट जल महामारी विज्ञान व्यापक रूप से सटीक है और यह समुदाय की सेहत और उनकी आदतों पर निगरानी का एक तरीका है.

बेनेट कहती हैं, "यदि हम आंकड़ों की अत्यधिक व्याख्या की कोशिश न करें तो वास्तव में यह एक दिलचस्प अवसर है."

आंकड़े मान्य हो जाने के बाद, वह कहती हैं, "सामाजिक स्तर पर क्या हो रहा है उसकी नब्ज़ पर उंगली रखने का यह एक उपयोगी तरीका है."

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