समय पर काम पूरा करना इतना मुश्किल क्यों है

  • 4 दिसंबर 2019
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"मुझे डेडलाइन पसंद है. डेडलाइन जब दिमाग़ में सीटी बजाते हुए गुज़रती हैं तो मुझे अच्छा लगता है." ये दिवंगत ब्रिटिश लेखक डगलस एडम्स के शब्द हैं.

हममें से ज़्यादातर लोग जब समय पर किसी काम को पूरा करने के लिए जूझ रहे होते हैं, तब अपनी आंखों के सामने से भागते हुए समय को देखकर ऐसा ही महसूस करते हैं.

हो सकता है कि हमारी देरी राष्ट्रीय शर्म की वजह न हो, लेकिन कई मौक़ों पर समयसीमा का गुज़र जाना राजनीतिक रूप से अपमानजनक होता है.

ऑस्ट्रेलिया सरकार ने सिडनी ओपेरा हाउस का निर्माण 1958 में शुरू किया था. इसे 1963 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य था.

लेकिन ओपेरा हाउस 1973 तक नहीं खुल सका. 10 साल की देरी और ख़र्च में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई.

आज के प्रमुख उदाहरणों में हांगकांग-झुहाई-मकाओ पुल और बर्लिन के विली ब्रांट एयरपोर्ट के साथ ब्रिटेन का बहुप्रतीक्षित एचएस2 हाई स्पीड रेल भी शामिल है, जो लक्ष्य से 7 साल पीछे चल रही है.

हम तय वक़्त पर काम पूरे क्यों नहीं कर पाते? सिर्फ़ आलस या ढिलाई इसकी वजह नहीं हो सकती क्योंकि इनमें से कई मामलों में कर्मचारी पूरी क्षमता से काम कर रहे थे.

योजना दोष

मनोवैज्ञानिक इसके लिए काम को अंजाम देने के लिए बनाई गई योजना में व्यवहारिकता की कमी जैसे दोषों को ज़िम्मेदार मानते हैं. पश्चिमी देशों में इसे योजना दोष के रूप में जाना जाता है.

किसी परियोजना को पूरा करने में कितना समय लगेगा, उसे हम कम करके आंकते हैं. नतीजन शुरुआत से ही हमारी डेडलाइन ग़लत हो जाती है.

आप किसी जटिल व्यावसायिक परियोजना पर काम कर रहे हों या अपने घर की मरम्मत करा रहे हों, योजना दोष की समझ हो तो आपका हर लक्ष्य समय पर पूरा होगा.

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योजना दोष की अवधारणा सबसे पहले नोबेल पुरस्कार विजेता मनोवैज्ञानिक और अर्थशास्त्री डैनियल काह्नमैन और उनके सहयोगी अमोस टावस्की ने 1970 के दशक में दी थी.

उनके मन में यह विचार अपने सहयोगियों की आदतों को देखकर आया था.

उनके सहयोगी कई बार समयसीमा आंकने में चूक कर चुके थे, फिर भी वे किसी परियोजना पर लगने वाले समय को कम करके आंकते थे. वे अपनी ग़लतियों से सबक सीखने को तैयार नहीं थे.

योजना दोष बहुत ही आम हैं. स्कूलों और विश्वविद्यालयों में कर्मचारी और छात्र दोनों ऐसा करते हैं.

आईटी में एक तिहाई से भी कम प्रोजेक्ट शुरुआती डेडलाइन पर पूरे हो पाते हैं.

औद्योगिक अनुसंधान और डिजाइन में परियोजनाएं अनुमान से साढ़े तीन गुना तक ज़्यादा समय लेती हैं.

एडम्स ने इसे लेखकों के लिए अभिशाप कहा है.

अनौपचारिक अनुमानों के मुताबिक़ 90 प्रतिशत पेशेवर लेखक अपनी पांडुलिपि देने में देरी करते हैं.

योजना दोष हमें यह समझने में मदद कर सकता है कि लोग समय पर टैक्स रिटर्न क्यों दाखिल नहीं कर पाते और क्रिसमस की खरीदारी में भी क्यों देर करते हैं.

पिछली नाकामियों के सबक

पिछली नाकामियों से वे कोई सबक नहीं सीखते और काम को समय से पूरा करने की संभावनाओं में कोई सुधार नहीं होता.

योजना दोष बड़ा परिदृश्य देखने की जगह बारीक जानकारियों पर ध्यान केंद्रित करने की प्रवृत्ति के कारण होता है.

काह्नमैन इसे "अंदर का परिदृश्य देखना" कहते हैं.

मिसाल के लिए, फ्रीलांस लेखक के तौर पर मैं किसी असाइनमेंट के लिए कार्यक्रम बनाता हूं.

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मुझे जिनसे बात करने की ज़रूरत है उनको फ़ोन करके, जो चीज़ें पढ़नी हैं उनको पढ़कर और जिस जगह जाने की ज़रूरत है वहां जाकर मैं इसकी शुरुआत कर सकता हूं.

ये काम हर असाइनमेंट के लिए अलग हो सकते हैं, इसलिए मेरे पिछले तजुर्बे किसी विशेष परियोजना के लिए पूरी तरह प्रासंगिक नहीं हो सकते.

समस्या यह है कि समयसीमा पर काम पूरे करने में हमारी नाकामियां अक्सर सामान्य वजहों से होती हैं जिनका अनुमान हम नहीं लगा पाते, जैसे- दूसरे काम में ध्यान भटकना, यात्रा में परेशानियां या सप्लाई में बाधाएं या बीमारियां.

हो सकता है कि इन समस्याओं के कारण हम पहले भी डेडलाइन से चूक गए हों. इस तथ्य को स्वीकार करके भविष्य में इनके लिए तैयारी करने में हमें मदद मिल सकती है.

लेकिन मौजूदा काम की बारीकियों पर ध्यान लगाकर और पिछले तजुर्बों की अनदेखी करके हम इन संभावनाओं को नकार देते हैं.

हम सिर्फ़ उन सबूतों की तलाश करते हैं जो हमारे लक्ष्यों के अनुरूप हो. हमारी दिलचस्पी सिर्फ़ यह महसूस करने में होती है कि काम जल्दी और आसानी से हो जाएगा.

अनदेखी ठीक नहीं

हम उन वजहों की अनदेखी कर देते हैं जिनमें लंबा वक़्त लग सकता है.

हम मान लेते हैं कि इस बार हमारे सप्लायर पिछली बार से अधिक विश्वसनीय होंगे या परिवहन की जो समस्या पिछली बार सामने आई थी वह इस बार नहीं होगी. हम आश्वस्त रहते हैं कि इस बार काम सुचारू ढंग से होगा.

यह समस्या उन व्यवसायों में अधिक हो सकती है जहां लोगों को अवास्तविक छोटी समयसीमा के लिए इनाम मिल सकता है, जैसे आईटी क्षेत्र.

ब्रिटेन में बोर्नेमाउथ यूनिवर्सिटी के केविन थॉमस कहते हैं, "ठेका हासिल करने के लिए टेंडर डालते समय प्रतिस्पर्धी होने और लागत को कम करके आंकने की ज़रूरत होती है."

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इसमें जानबूझकर धोखा नहीं दिया जाता. इसमें लोग क्लायंट की जगह ख़ुद को बेवकूफ बनाते हैं.

योजना दोष की समझ यह बताती है कि समय प्रबंधन के हमारे सर्वोत्तम प्रयास भी कभी-कभी क्यों उलटे पड़ जाते हैं.

2003 के एक अध्ययन में, कनाडा के स्नातक के छात्रों के समूह से कहा गया कि वे क्रिसमस की ख़रीदारी जैसे काम को पूरा करने की विस्तृत योजना तैयार करें.

उम्मीदों के उलट, उनके अनुमान उन लोगों से भी अवास्तविक थे जिन्होंने कोई कार्यक्रम नहीं बनाया था.

वे ख़रीदारी पर ही ध्यान लगा रहे थे. उन बाधाओं और चुनौतियों की तरफ़ उनका कोई ध्यान नहीं था जो समय पर उनको काम पूरा करने से रोक सकते थे.

अगर आप किसी जटिल परियोजना पर काम कर रहे हों तो हर ज़रूरी क़दम का ख़याल रखना आवश्यक होगा.

पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी की कैथरीन मिल्कमैन और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की लेस्ली जॉन के शोध से पता चलता है कि कार्यान्वयन रणनीति निर्धारित करने से ढिलाई में कमी आ सकती है और समयसीमा के पालन की संभावना बढ़ती है.

तजुर्बों का फ़ायदा उठाएं

अगर आप अधिक वास्तविक योजना बनाना चाहते हैं तो आपको पहले के तजुर्बों पर अधिक ध्यान देना होगा और उनकी प्रासंगिकता को ख़ारिज करने से बचना होगा.

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अगर आपका ख़ुद का ऐसा कोई तजुर्बा नहीं है तो उसी स्थिति में दूसरे लोगों के तजुर्बों पर ध्यान दें.

हो सकता है कि हालात बिल्कुल एक जैसे न हों, फिर भी पुराने अनुभव परियोजना पूरा करने में लगने वाले समय का अनुमान लगाने में मददगार होंगे.

थॉमस ख़ुद यह रणनीति लागू करते हैं. "मैं वर्तमान काम को हूबहू पिछले काम की तरह नहीं समझता."

यह बहुत सरल लगता है, लेकिन शोध से पता चलता है कि यह वास्तव में कारगर है.

अगर आप भी इस सलाह पर चलें तो वादा टूटने के डर से दिमाग में सीटी नहीं बजेगी क्योंकि आप हर परियोजना समय से पूरी करेंगे.

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