लड़ाई जीतने के लिए प्रोपेगैंडा भी ज़रूरी!

  • फिओना मैकडोनाल्ड
  • बीबीसी कल्चर
नाज़ी सेना के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा सामग्री

ब्रिटेन में दूसरे विश्व युद्ध की सबसे चर्चित तस्वीरों में से एक तस्वीर है, उस वक़्त के ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की. जिसमें चर्चिल अपनी दो उंगलियों से विक्ट्री साइन (V) बना रहे थे.

इस तस्वीर को देखकर यही लगता है कि चर्चिल अपनी जनता में जीत का हौसला बढ़ाने के लिए ये विक्ट्री साइन बना रहे थे. इसके अलावा भी इसके पीछे एक मक़सद था. ये था हिटलर की सरकार के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा करना. यानी प्रचार करना.

हाल ही में एक किताब ब्रिटेन में आई है. इसका नाम है, 'पर्सुएडिंग द पीपुल: ब्रिटिश प्रोपेगैंडा इन वर्ल्ड वॉर 2'. इसके लेखक हैं, ब्रितानी इतिहासकार डेविड वेल्च.

पहले विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने प्रचार के लिए सूचना मंत्रालय या मिनिस्ट्री ऑफ इन्फ़ॉर्मेशन बनाया था. मगर विश्व युद्ध ख़त्म होते ही, मंत्रालय ख़त्म कर दिया गया. वजह ये थी कि जनता को लगता था कि सरकार उनसे झूठ बोलती है.

लेकिन, दूसरा विश्व युद्ध शुरू होते ही ब्रिटिश सरकार को फिर से सूचना मंत्रालय की ज़रूरत महसूस हुई. इसका मक़सद था नाज़ी प्रचार तंत्र का मुक़ाबला करना. ब्रिटिश जनता को युद्ध के लिए ज़हनी तौर पर तैयार करना. और बाक़ी यूरोप में हिटलर के ख़िलाफ़ प्रचार करना.

ब्रिटिश सूचना मंत्रालय ने इसके लिए कई हथकंडे अपनाए. डेविड वेल्च की क़िताब में इस बारे में तफ़्सील से लिखा गया है. पिछली बार की बदनामी से सबक़ लेते हुए सरकार ने ये तय किया कि इस बार जनता से कम से कम झूठ बोला जाए. ये बात और है कि हर बार सच ही नहीं बोला गया.

1940 में बीबीसी के पूर्व महानिदेशक जॉन रीथ को सूचना मंत्री बनाया गया था. रीथ ने तय किया कि सैनिकों की तरह ही जानकारी भी ब्रिटिश सेना का हिस्सा है. इसके ज़रिए भी युद्ध लड़ा जा रहा है. दूसरा, ये कि जनता को सच ही बताया जाए. हालांकि दूसरी बात पर अमल करना अधिकारियों के लिए बहुत मुश्किल साबित हुआ.

ब्रिटिश सूचना मंत्रालय ने प्रचार के लिए 86 नियम बनाए. ये वो लोग थे जिन्हें हिटलर के प्रचार तंत्र का बख़ूबी अंदाज़ा था. हिटलर ने अपनी आत्मकथा, 'मीन कैम्फ' में प्रोपेगैंडा के कई नियम बताए थे. ब्रिटिश सूचना मंत्रालय के कई अधिकारी हिटलर की बहुत सी बातों से सहमत थे. उन्होंने हिटलर के ख़िलाफ़ प्रचार में उसी के कई हथकंडे ख़ुद ही आज़माए.

जैसे कि किसी भी बात को बार-बार दोहराना. ब्रिटिश सूचना मंत्रालय ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हिटलर के इस नुस्खे पर कई बार अमल किया. जैसे कि 'वी' फॉर विक्ट्री अभियान. ये अभियान बीबीसी ने जुलाई 1941 में शुरू किया था.

इसे पूर्व बेल्जियन मंत्री विक्टर डे लेवेले के भाषण के साथ शुरू किया गया था. विक्टर ने जर्मनी के क़ब्ज़े वाले इलाक़े में रहने वाले लोगों से एक ख़ास अपील की. उन्होंने कहा कि जनता को जब भी, जहां भी मौक़ा मिले वो V अक्षर लिखे. क्योंकि ये फ्रेंच, डच, फ्लेमिश और अंग्रेज़ी भाषा में जीत के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द का पहला अक्षर है. इससे कई देशों की जनता जीत के लिए अपनी बात रखेगी.

वी फ़ॉर विक्ट्री अभियान के लिए जो मोर्स कोड इस्तेमाल किया गया, वो मशहूर यूरोपीय संगीतकार बीथोवन की एक धुन जैसा था. इसलिए इस धुन को ही ब्रिटिश सूचना मंत्रालय ने वी फ़ॉर विक्ट्री अभियान का हिस्सा बना लिया. इस रेडियो प्रोग्राम को नाज़ी जर्मनी के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में बहुत से लोग सुनते थे. इसी प्रचार अभियान के तहत ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अपना मशहूर विक्ट्री साइन बनाया था.

इसी तरह, 1940 में जर्मनी के हाथों कई झटके खाने के बाद ब्रिटिश सरकार ने 'एंगर कैंपेन' या गुस्से का अभियान शुरू किया. जिसमें हिटलर के ज़ुल्मों, नाज़ी सेनाओं की ज़्यादतियों के बारे में लोगों को बताकर उनका ग़ुस्सा भड़काया गया, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा जनता युद्ध का समर्थन करे.

सरकार को उस वक़्त लग रहा था कि ब्रितानी नागरिक युद्ध को लेकर उत्साहित नहीं हैं. उनमें जोश की साफ़ कमी है. इसीलिए उनके ग़ुस्से को भड़काने और जोश भरने के लिए ये 'एंगर कैंपेन' शुरू किया गया.

इसमें जनता को बताया गया कि जर्मनी की कला, संस्कृति लुभाने वाली है. मगर नाज़ी अगर ब्रिटेन तक आ गए, तो उनका बुरा हाल होना है. अंग्रेज़ों की जो जीवन शैली है, नाज़ी उस पर हमला करेंगे. फिर हिटलर की बदनाम ख़ुफिया एजेंसी गेस्टापो के कारनामे जनता को बताए गए. ताकि लोग डरें और सरकार का समर्थन करें.

जनता के बीच बहुत से संदिग्ध लोग भी थे. उनके बीच ख़ुफ़िया, शक़ के दायरे में आने वाले लोगों की मौजूदगी के ख़िलाफ़ भी ब्रिटिश प्रचार तंत्र ने ज़ोर-शोर से काम शुरू किया. फ्रांस की हार और डनकिर्क से लोगों को सुरक्षित निकालने के अभियान के बाद ख़ौफ़ की ये मुहिम काफ़ी असरदार रही. सूचना मंत्रालय ने लोगों को समझाया कि वो बहुत सोच-समझकर ही कुछ बोलें. किसी को नहीं पता कि सामने वाला, शायद नाज़ी जासूस हो.

नाज़ी जर्मनी के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में लोगों के बुरे हाल के क़िस्से जनता को सुनाए जाते थे. इसके लिए मज़ाक़ और व्यंग को भी ज़रिया बनाया गया. हिटलर, उसकी सरकार, उसकी सेनाओं पर तमाम तरह के कार्टून बनाकर लोगों के बीच परोसे गए. इसी तरह हिटलर की सरकार अपने प्रचार के लिए जो फ़िल्में बनाती थी, उसे काट-छांटकर ब्रिटिश प्रचार मंत्रालय ऐसा रंग-रूप दे देता था कि नाज़ी सरकार का मज़ाक़ बनता था.

दूसरे विश्व युद्ध के शुरू मे सोवियत संघ, जर्मनी के साथ था. इसलिए ब्रिटिश सरकार ने उसके ख़िलाफ़ भी जमकर प्रचार किया था. मगर जब सोवियत संघ ने भी हिटलर के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी. तो, ब्रिटिश सरकार ने दुश्मन के दुश्मन को अपना दोस्त बताना शुरू कर दिया.

जब सोवियत सेनाओं ने 1943 में स्टालिनग्राड पर दोबारा क़ब्ज़ा किया तो, ब्रिटिश सरकार ने इसका जमकर जश्न मनाया. ब्रिटिश सरकार ने इसे रेड आर्मी डे के तौर पर मनाया. लंदन के रॉयल अलबर्ट हॉल में इस जीत पर शानदार पार्टी दी गई.

सोवियत नेता जोसेफ़ स्टालिन को अंकल जो के तौर पर पेश किया गया. रूसी सेना के साहस और हौसले की मिसालें दी गईं. इस तरह सोवियत संघ की बुराई के अपने पुराने एजेंडे से ब्रिटिश सरकार हट गई.

डेविड वेल्च की क़िताब से ये बात साफ़ ज़ाहिर होती है कि युद्ध के दौरान प्रचार की बड़ी अहमियत होती है. ये वाक़ई, सेना की एक बटालियन की तरह अपने देश की मदद करती है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी क्लचर पर उपलब्ध है.)

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