अफ़ग़ानी शायराओं की वो अनसुनी दास्तां

अफ़ग़ानी युवती की आंखें

शायरी जज़्बात को ज़ुबान देती हैं. ये ख़ुद में ज़िंदगी का फ़लसफ़ा छुपाए होती हैं. दिमाग़ में पनप रही सोच और दिल में दहक रहे जज़्बात को ईंधन देने का काम करती है. ग़ज़ल, नज़्म, कविता, रुबाई, चौपाई, दोहा. हरेक दौर, भाषा और संस्कृति में दिल की बात कहने का एक अलग अंदाज़ रहा है.

इस कला को विकसित करने में सिर्फ़ मर्द ही आगे नहीं रहे बल्कि महिलाओं ने भी इसमें ख़ूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. सभी ने अपने अपने अंदाज़ में इस कला को विकसित किया. लेकिन कुछ रचनाओं पर वक़्त की इतनी गहरी गर्द जम गई कि उनका वजूद या तो ख़त्म हो गया या फिर वो धूमिल पड़ गई. लेकिन कहते हैं ना कि मोहब्बत अपनी मंज़िल हासिल कर ही लेती है. तो, कला के शैदाइयों ने भी गुम हो चुकी ऐसी बहुत सी रचनाओं को ढ़ूंढ़ निकाला है.

ऐसी ही एक कला प्रेमी हैं एलिज़ा ग्रीसवल्ड. कुछ साल पहले एलिज़ा को एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में अफ़ग़ानिस्तान जाने का मौक़ा मिला. इस प्रोजेक्ट के तहत उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में गुम हो चुकी शायरी के बारे में छान बीन करनी थी. अपनी रिसर्च के सिलसिले में वो शरणार्थियों के कैंप और दूर दराज़ के गांवों में गईं. वहां की लोक कविताएं जमा कीं. इसी दौरान उन्हें अफ़ग़ानिस्तान के लोक दोहों के बारे में पता चला जिन्हें लैनडे कहा जाता है.

क़रीब एक हज़ार साल पहले पश्तो समुदाय के लोगों ने इसे लिखना शुरू किया था. इससे पहले इन्हें ये ज़बानी याद होते थे. लैनडे की शुरूआत कैसे हुई थी इस बारे में साफ़ तौर पर कोई कुछ नहीं कह सकता. लेकिन एक थ्योरी काफ़ी प्रचालित है. सदियों पहले जब इंडो- आर्यन मूल के लोग अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे तो उन्होंने इसकी शुरूआत की. ये बात इस्लाम के फैलने से बहुत पहले की है. माना जाता है कि ऐसे मुंहबोले दोहों को ही बाद में श्लोक के तौर पर लिखने का चलन शुरू हुआ.

जिस तरह दोहा, छंद या चौपाई लिखने का एक पैमाना होता है, उसी तरह लैनडे लिखने का भी पैमाना है. लैनडे दो लाइन में लिखे जाते है. एक लैनडे लिखने के लिए 22 अक्षर होने चाहिए. इसकी पहली लाइन में नौ और दूसरी में तेरह अक्षर होने चाहिए. हर लाइन का अंत 'मा' या 'ना' पर होना ज़रूरी है. 'लैनडे' बुनियादी तौर पर पांच विषयों पर लिखे जाते हैं.

1. मीना यानि, प्यार-मोहब्बत. 2. जंग यानि युद्ध 3 .वतन यानि मातृभूमि 4. बिलतून यानि जुदाई, विच्छेद, वियोग. और 5. ग़म. यहां गम से मुराद सिर्फ़ पश्तून महिलाओं के दुखों से है.

एलिज़ा ग्रीसवल्ड कहती हैं कि महिलाओं के दुख की कहानी ने ही उन्हें अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं में छुपी कला और दर्द को समझने के लिए विवश किया. अपनी रिसर्च में उन्हें एक ऐसी लड़की की कहानी जानने को मिली, जिसे कविताएं लिखने का शौक़ था. लेकिन उसके परिवार ने उसे कभी अपना हुनर निखारने का मौक़ा नहीं दिया. मजबूर हो कर उसने अपनी हस्ती मिटा दी. इस लड़की की लिखी कविताएं अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के हालात का सबसे बड़ा सबूत हैं. ये अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं का दुख समझने के लिए एक झरोखे जैसी हैं.

उस लड़की का नाम राहिला मुस्का था. पश्तून भाषा में इसका मतलब है दिलकश मुस्कुराहट. किशोरावस्था से ही उसने अपने एहसास और जज़्बात को क़लम की ज़बान देना शुरू कर दिया था. वो हेलमंद के जंगज़दा इलाक़े गेरेश्क नाम के एक गांव में रहती थी. जहां उस दौर में किसी लड़की के लिए ऐसी जुर्रत करना भी कल्पना से परे था.

अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएं शायरी गा सकती थीं, लिख नहीं सकती थीं. क्योंकि तालीम से उनका कोई वास्ता नहीं था. वो मर्दों से जो शायरी सुनती थीं, या जो जज़्बात शब्द बन कर उनकी ज़बान से निकलते थे वही याद करके गा लिया करती थीं. मुजरों में भी शायरी का ख़ूब इस्तेमाल होता था.

एलिज़ा ने 2015 में एक किताब लिखी थी I am the begger of the world. इस किताब में उन्होंने पश्तो समाज के नदी किनारे जमा होकर शायरी करने के रिवाज को बताया है. इसे 'गोदर' कहा जाता था. यहां महिलाएं पानी भरने आती थीं और एक साथ बैठ कर शायरी करती थी. मर्द हालांकि इस इलाक़े में नहीं आ सकते थे। लेकिन जब महिलाएं वापस जाती थीं, तब कुछ आशिक़ अपनी माशूक़ा का दीदार कर लिया करते थे.

मुसका एक दिन घर पर रेडियो सुन रही थी. जहां उसने 'मिरामन बहिर' के बारे में सुना. काबुल में साहित्य का ये एक ऐसा मंच था, जहां पढ़ी-लिखी महिलाएं और छात्र हर हफ़्ते आकर अपनी लिखी कविताएं और कहानियां पढ़ सकते थे.

श्रोताओं के लिए फ़ोन लाइन भी खुली रहती थी जिस पर कोई भी महिला कॉल करके अपनी कविता या कहानी सुना सकती थी. इस मंच की स्थापना अफ़ग़ानी नेता साहिरा शरीफ़ ने की थी जो अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं के लिए एक दमदार आवाज़ थीं.

साहिरा और उनकी दूसरी साथी महिलाएं भी अपने तजुर्बे रेडियो पर सुनाती थी. इसी मंच से मुसका ने भी अपनी कविताएं सुनानी शुरू कर दीं. एक दिन जब मुसका अपनी कविताएं सुना रही थी उसके भाई ने उसे सुना. भाई को लगा मुसका अपने आशिक़ से मुख़ातिब है ना कि कमरे में बैठी औरतों से. उसके परिवार वालों ने उसे बहुत मारा-पीटा और शायरी नहीं लिखने की धमकी भी दी. लेकिन मुसका नहीं मानी. उसने लिखना नहीं छोड़ा जब परिवार ने उसे दोबारा पीटा तो उसने ख़ुद को आग लगा ली. मुसका की तमाम डायरियां उसके पिता ने जला कर ख़त्म कर दीं.

'लैनडे' के रचनाकार अज्ञात हैं, लेकिन इनमें तीखा तंज़ भी है जो इन्हें एक ख़ास तरह की पहचान देते हैं. ये कविताएं मर्द और औरत दोनों मिलकर शादियों में आग के चारों तरफ़ बैठ कर गाते हैं. ये परंपरा सदियों पुरानी है.

लैनडे में चुग़ल भी है और ये एक ख़ास तरह की बंधी-बंधाई लीक पर चलने वाली सोच को तोड़ने का काम भी करती हैं. जैसे सेक्स ऐसा विषय है जिस पर महिलाओं को खुलकर बोलने की आज़ादी नहीं थी. लेकिन लैनडे के ज़रिए वो इस पर अपनी राय रख सकती थी. लिहाज़ा कहा जा सकता है लैनडे महिलाओं को एक तरह से सशक्त भी बनाती थी.

वक़्त के साथ लैनडे और कहानियों का मिज़ाज भी बदला है. जैसे अफ़ग़ानिस्तान में जब ब्रिटिश फ़ौजें थी तो उनका असर यहां की रचनाओं पर पड़ा, जब रशियन फ़ौजें आईं तो उनका असर पड़ा और आज अमरीकी फ़ौजें वहां मौजूद हैं तो उनका असर साफ़ नज़र आता है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्ल्कि करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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