बॉलीवुड कैसे बदल रहा हॉलीवुड का अंदाज?

  • 24 अक्तूबर 2017
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क्या आप को पता है कि हॉलीवुड फ़िल्म लिंकन में भारत का भी पैसा लगा था? हॉलीवुड में बॉलीवुड और भारत की नुमाइंदगी अब प्रियंका चोपड़ा से काफ़ी आगे निकल चुकी है.

आज की तारीख़ में हॉलीवुड में कई भारतीय कलाकार काम कर रहे हैं. कुछ भारतीय कंपनियां भी हॉलीवुड में अपने पैसे लगा रही हैं. वैसे, भारत की बात करें तो यहां अक्सर फ़िल्में रिलीज़ से पहले मुश्किलें झेलती हैं. विवादों की शिकार होती हैं.

भारत का सेंसर बोर्ड किसी भी सीन को लेकर ऐतराज़ जता सकता है. कुछ संगठन ही किसी फ़िल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर रिलीज़ को रोक सकते हैं. कई बार कोई सियासी दल भी विरोध कर के फ़िल्म की रिलीज़ पर ब्रेक लगा देता है.

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Image caption चोरी-चोरी, चुपके-चुपके में प्रीति जिंटा

चोरी-चोरी, चुपके-चुपके पर विवाद क्यों?

या तो कोई दल किसी फ़िल्म निर्माता को रिलीज़ के एवज में सेना के जवानों की मदद के लिए दान करने को मजबूर करता है, क्योंकि फ़िल्म में पाकिस्तानी कलाकार है. तमाम तरह के विवादों से घिरे रहे बॉलीवुड में चोरी-चोरी, चुपके-चुपके फ़िल्म का ज़िक्र भी ज़रूरी है. इस फ़िल्म को लेकर उठा विवाद एकदम अलग था.

चोरी-चोरी, चुपके-चुपके फ़िल्म रिलीज़ होने से ठीक पहले सीबीआई ने इस के दो निर्माताओं को गिरफ़्तार कर लिया था. इस फ़िल्म के प्रिंट भी ज़ब्त कर लिए गए थे. आरोप था कि इसमें मुंबई के बदनाम अंडरवर्ल्ड का पैसा लगा है. इस फ़िल्म में सलमान ख़ान, प्रीति ज़िंटा और रानी मुखर्जी ने अहम रोल निभाए थे.

भारत की फ़िल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा लगने का आरोप कोई नया नहीं. दुनिया में भारत की पहचान बन चुकी बॉलीवुड फिल्मों से जुड़े कई लोगों के अंडवर्ल्ड से कनेक्शन की बातें सामने आ चुकी हैं. अक्सर अंडरवर्ल्ड के लोग अपनी काली कमाई को फ़िल्मों में लगाकर काला धन सफ़ेद करते थे.

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अंडरवर्ल्ड का बॉलीवुड कनेक्शन

कई बार वो धमकियां देकर फ़िल्म निर्माताओं को मजबूर किया करते थे. वो कई बार डर दिखाकर निर्माताओं को अपनी फ़िल्में बनाने, निर्देशकों को अपनी फ़िल्म निर्देशित करने को मजबूर करते थे. कई बार उनकी धमकी की वजह से दूसरों की फ़िल्मों की रिलीज़ की तारीख़ बदल जाती थी.

बात न मानने पर अंडरवर्ल्ड ने फ़िल्मी हस्तियों पर हमले भी कराए. बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड के इतने दखल की बड़ी वजह, इसे उद्योग का दर्जा हासिल न होना भी थी. इस वजह से वित्तीय संस्थान जैसे बैंक, फ़िल्में बनाने के लिए क़र्ज़ नहीं देते थे.

यही कारण था कि बॉलीवुड का धंधा, अंडवर्ल्ड के दबाव में और माफ़िया के साथ सौदेबाज़ी से चलता था. ख़ुद सरकार की ख़ुफ़िया रिपोर्ट के मुताबिक़ एक वक़्त था कि बॉलीवुड की 60 फ़ीसदी फ़िल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा लगा होता था.

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बॉलीवुड की बढ़ती कामयाबी

ये तस्वीर 2001 से बदली. उस साल सरकार ने बॉलीवु़ड को उद्योग का दर्जा दे दिया. इसके बाद बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थान, फ़िल्में बनाने के लिए क़र्ज़ देने लगे. आज बॉलीवुड में हॉलीवुड फ़िल्मों से ज़्यादा टिकटें बिकती हैं.

बॉलीवुड फ़िल्मों की लोकप्रियता पर हॉलीवुड की हमेशा से नज़र थी. बॉलीवुड हमेशा से ही गाने-बजाने वाली फ़िल्मों के लिए मशहूर रहा है. ये इंडस्ट्री नक़ल के लिए भी बदनाम रही है. लेकिन बॉलीवुड की दिनों-दिन बढ़ती कामयाबी ने हॉलीवुड का ध्यान अपनी तरफ़ खींचना शुरू किया था.

एक दौर ऐसा भी आया कि बॉलीवुड में टिकट की फ़रोख़्त हॉलीवुड फ़िल्मों से ज़्यादा होने लगी थी. ज़ाहिर है, कारोबार के लिहाज़ से बॉलीवुड दुनिया भर में मशहूर हो रहा था. हॉलीवुड के मशहूर स्टूडियोज़ ने भी बॉलीवुड में अपने लिए मौक़ा देखा. कई हॉलीवुड कंपनियों ने भारत की कंपनियों के साथ मिलकर प्रोजेक्ट शुरू किए.

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बदला बॉलीवुड का चलन

2008 तक डिज़्नी, वायाकॉम, 20th सेंचुरी फॉक्स और सोनी पिक्चर्स ने बॉलीवुड की कंपनियों के साथ मिलकर फ़िल्में बनाने पर काम शुरू कर दिया था. हॉलीवुड स्टूडियो के आने से भारतीय फ़िल्म उद्योग में इंक़िलाब सा आ गया. उनके विश्व स्तरीय तजुर्बे की मदद से बॉलीवुड में फ़िल्में बनाने का चलन भी बदला.

फ़िल्में बनाने के बजट बढ़ गए. प्रचार पर ज़ोर दिया जाने लगा. हॉलीवुड फ़िल्मों का रीमेक, चोरी से कॉपी करके के बजाय क़ानूनी तौर पर होने लगा. हॉलीवुड ने बड़ी उम्मीदों के साथ बॉलीवुड से नाता जोड़ा था. लेकिन शुरुआत अच्छी नहीं रही. 2007 में सोनी ने संजय लीला भंसाली के साथ मिलकर सांवरिया फ़िल्म बनाई थी.

ये रोमान्टिक फ़िल्म थी, जो फियोडोर दोस्तोवस्की के उपन्यास व्हाइट नाइट्स पर आधारित थी. भंसाली अपनी शानदार, भव्य फ़िल्मों के लिए जाने जाते हैं. जिनकी फ़िल्मों में सीन भव्य होते हैं. सेट विशाल होते हैं. लेकिन उनकी फ़िल्मों को बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी मिलने का रिकॉर्ड मिला-जुला ही रहा है.

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Image caption सोनम कपूर की पहली फ़िल्म थी सांवरिया

औंधे मुंह गिरी सांवरिया

सांवरिया फ़िल्म को दीवाली पर रिलीज़ करने की तैयारी थी. ठीक उसी वक़्त सुपरस्टार शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म ओम शांति ओम भी रिलीज़ होनी थी. वो उस वक़्त नंबर वन स्टार थे. सांवरिया का सीधा मुक़ाबला, शाहरुख़ की फ़िल्म से होना था. ये सरासर ग़लत दांव था. तिस पर एक और ग़लती सोनी ने कर दी.

फ़िल्म को रिलीज़ से ठीक पहले किसी ने देखा तक नहीं था. जब सोनी पिक्चर्स के अधिकारियों ने सांवरिया फ़िल्म को देखा, तो ही उन्हें समझ में आ गया कि फ़िल्म का फ्लॉप होना तो तय है. सांवरिया फ़िल्म बुरी तरह फ्लॉप रही. इसके बाद सोनी पिक्चर्स ने भारत में अपनी दुकान बंद कर दी.

इसी तरह डिज़्नी की पहली भारतीय फ़िल्म रोडसाइड रोमियो भी बुरी तरह फ्लॉप रही थी. ये एक एनिमेटेड कॉमेडी फ़िल्म थी. इसे डिज़्नी ने यशराज फ़िल्म्स के साथ मिलकर बनाया था. यशराज फ़िल्म्स बॉलीवुड के सबसे बड़े बैनर में से एक है.

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Image caption चांदनी चौक टू चाइना में अक्षय कुमार

हॉलीवुड स्टूडियो भारत में नाकाम क्यों?

डिज़्नी और सोनी की तरह वार्नर ब्रदर्स की पहली हिंदी फ़िल्म चांदनी चौक टू चाइना बॉक्स ऑफ़िस पर लुढ़क गई. ये एक एक्शन कॉमेडी फ़िल्म थी, जो 2009 में रिलीज़ हुई थी. सवाल ये है कि हॉलीवुड के बड़े स्टूडियो भारत में क्यों नाकाम हो रहे थे? इसकी कई वजहें थीं.

हमें याद रखना चाहिए कि कला कोई विज्ञान नहीं, जिसमें बड़ा है तो बेहतर है का नियम लागू किया जा सके. फ़िल्में बनाना मौज का काम है. बॉलीवुड में कामयाबी भारत के मिडिल क्लास की पसंद तय करती है.

हॉलीवुड की बड़ी कंपनियों के पास अच्छे बिज़नेस मॉडल ज़रूर थे. लेकिन ये ज़रूरी नहीं था कि वो यहां की ज़मीन पर भी कामयाब होते. हॉलीवुड के निर्माताओं ने ऊंचे ओहदों पर ऐसे लोगों को बैठाया जो क्रिएटिव लोग नहीं थे.

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बड़े बिज़नेस मॉडल

फिर उन्होंने भारतीय बाज़ार में फंड का अपना वो फॉर्मूला लागू किया, जो हॉलीवुड में उनकी कामयाबी की वजह था. भारत में इतने बड़े पैमाने पर पैसे प्रमोशन और फ़िल्में बनाने पर ख़र्च नहीं होता. इतने पैसे आप कैसे लागत में लुटा सकते हैं, जब यहां एक फ़िल्म का टिकट औसतन दो सौ रुपये से भी कम हो!

ऐसा नहीं था कि जब हॉलीवुड की बड़ी कंपनियां नाकाम हो रही थीं, तो बॉलीवुड के बड़े निर्माता कामयाबी की नई इबारतें लिख रहे थे. बॉलीवुड में भी कई ऐसी महंगी फ़िल्में बनीं, जो बॉक्स ऑफ़िस पर लुढ़क गईं. हां, यशराज फ़िल्म्स और धर्मा प्रोडक्शन्स जैसी कंपनियों ने कई बेहद कामयाब फ़िल्में बनाईं.

इन लोगों ने फ़िल्म उद्योग को नए कलाकार दिए. मल्टीप्लेक्स और सिनेमाघरों से समझौते करके छोटे निर्देशकों की फ़िल्मों को भी कामयाबी की सीढ़ियां चढ़वाईं. हां, बॉलीवुड में कामयाबी का शर्तिया फॉर्मूला भी कई बार बॉक्स ऑफिस पर चला.

दंगल ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

आज की तारीख में वार्नर ब्रदर्स ने अपनी भारतीय शाखा को बंद कर दिया है. डिज़्नी ने भी भारत में फ़िल्में बनाने का काम छोड़ दिया है. दिलचस्प बात ये है कि तमाम नाकाम फ़िल्मों के बाद 2016 में कंपनी ने दंगल जैसी बेहद कामयाब फ़िल्म भी बनाई थी.

दंगल ने 30 करोड़ डॉलर से भी ज़्यादा का कारोबार करके कमाई का नया रिकॉर्ड बनाया था. ये अब तक की सबसे ज़्यादा कमाई वाली भारतीय फ़िल्म है. दंगल ने भारत से दोगुनी कमाई तो चीन में की थी. शायद ये पहली बॉलीवुड फ़िल्म थी जिसने विदेश में इतनी कमाई की.

फॉक्स स्टूडियो अभी भी बॉलीवुड में डटा हुआ है. इसने हाल ही में धर्मा प्रोडक्शन्स के साथ दस फ़िल्में बनाने का करार किया है. कला की किसी भी विधा में सहयोग इकतरफ़ा नहीं होता. आज की तारीख़ में भारत के कई कारोबारी उपमहाद्वीप के बाहर फ़िल्म उदयोग में पैसे लगा रहे हैं.

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Image caption स्टीवन स्पीलबर्ग

डटा रहा फॉक्स स्टूडियो

इसकी सबसे बड़ी मिसाल तो रिलायंस एंटरटेनमेंट ग्रुप है. रिलायंस ने स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ मिलकर एंबलिन पार्टनर्स नाम की कंपनी बनाई है. इसमें रिलायंस की हिस्सेदारी 20 फ़ीसदी है. एंबलिन पिक्चर्स में ड्रीमवर्क्स पिक्चर्स की भी हिस्सेदारी है.

पिछले आठ सालों में रिलायंस और स्पीलबर्ग ने मिलकर कई ऐसी फ़िल्में बनाई हैं जिन्हें अकादेमी अवार्ड मिले हैं. इनमें एक नाम लिंकन फ़िल्म का भी है, तो दूसरा नाम बुरी तरह नाकाम रही बीएफजी का भी है. इसके अलावा भी कई भारतीय निवेशक, अमरीकी और ब्रिटिश फ़िल्मों में पैसे लगा रहे हैं.

हालांकि अभी भी पश्चिमी मनोरंजन उद्योग में भारतीय निवेशकों की हिस्सेदारी मामूली ही है. भारत के मुक़ाबले चीन के निवेशकों ने हॉलीवुड में बहुत रक़म लगाई हुई है. चीन की कई प्रोडक्शन कंपनियां अमरीका में काम करती हैं.

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Image caption दीपिका पादुकोण

हॉलीवुड-बॉलीवुड का मेल

आज की तारीख़ में हॉलीवुड के साथ-साथ बॉलीवुड में भी चीन के कारोबारी काफ़ी दिलचस्पी ले रहे हैं. पैसे और प्रतिभा के अलावा भी एक चीज़ है. हॉलीवुड में हर वर्ग की नुमाइंदगी नहीं दिखती. पिछले कुछ सालों में हॉलीवुड ने इस दिशा में तरक़्क़ी तो की है, मगर वो उतनी असरदार नही दिखती.

आज की तारीख़ में हॉलीवुड में भारतीय कलाकारों की मौजूदगी काफ़ी बढ़ गई है. जैसे दीपिका पादुकोण ने हॉलीवुड फिल्म XXX की नई पेशकश में काम किया है. इसी तरह इरफ़ान ख़ान ने ए माइटी हार्ट, द दार्जिलिंग लिमिटेड जैसी कई फ़िल्मों में काम किया है.

इसकी सबसे ताज़ा मिसाल है विक्टोरिया और अब्दुल. इसमें भारत के अलीफज़ल ने काम किया है. यानी पहले के मुक़ाबले हॉलीवुड में भारतीय कलाकारों की मौजूदगी बढ़ी है. और प्रियंका चोपड़ा तो लगातार हॉलीवुड में काम कर ही रही हैं. उन्होंने बेवॉच फ़िल्म में काम किया ही था. इसके अलावा वो क्वांटिको सिरीज़ में काम कर ही रही हैं.

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Image caption विक्टोरिया एंड अब्दुल में जूडी डेंच और अली फज़ल

हॉलीवुड में भारतीय दखल बढ़ा

साथ ही प्रियंका चोपड़ा, एबीसी नेटवर्क के लिए एक सीरियल भी बना रही हैं. ये सीरियल माधुरी दीक्षित की ज़िंदगी पर आधारित है.

आज की तारीख़ में बॉलीवुड का हॉलीवुड में दखल काफ़ी बढ़ गया है. यानी हम बेंड इट लाइक बेकहम के दौर से काफ़ी आगे निकल आए हैं.

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