बॉलीवुड के लिए विदेशी का मतलब 'गोरे लोग' क्यों?

  • 10 नवंबर 2017
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2015 के गणतंत्र दिवस समारोह में बराक ओबामा चीफ गेस्ट बनकर आए थे. उस दौरे में जब बराक ओबामा को एक भाषण देना था, तो उनकी टीम रात भर जागती रही. उन्हें तलाश थी किसी सुपरहिट बॉलीवुड फ़िल्म के सुपरहिट डायलॉग की. मामला बेहद गंभीर था. तलाश बेहद दिलचस्प.

असल में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमरीका के दौरे पर गए थे, तो उन्होंने मैडिसन स्क्वॉयर गार्डेन में मशहूर हॉलीवुड फ़िल्म स्टार वार्स का मशहूर डायलॉग बोला था-मे द फ़ोर्स बी विद यू. उस दौरान हॉलीवुड के स्टार ह्यू जैकमैन भी उनके साथ थे. मोदी का ये डायलॉग बोलना काफ़ी चर्चित हुआ था.

ओबामा की टीम भी मोदी के इस मज़ाक़िया अंदाज़ का जवाब हिंदी फ़िल्म के डायलॉग से देना चाहती थी. आख़िर में ओबामा ने दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे यानी डीडीएलजे फ़िल्म का डायलॉग बोला.

ओबामा की टीम ने दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे फ़िल्म का डायलॉग क्यों चुना? क्या वजह थी इसकी?

1994 में बनी ये फ़िल्म आज तक बॉलीवुड की सबसे कामयाब फ़िल्मों में गिनी जाती है. शाहरुख़ ख़ान-काजोल की ये फ़िल्म आज भी मुंबई के मराठा मंदिर में चल रही है. पिछले 23 साल से लगातार इसे देखने के लिए भीड़ जुट रही है.

फ़िल्म की शुरुआत में अमरीश पुरी उर्फ़ बलदेव सिंह लंदन के ट्रैफलगर स्क्वॉयर पर कबूतरों को दाना खिलाते दिखते हैं. अपने ज़हन में वो ख़ुद को पंजाब के अपने गांव में खड़े होने का तसव्वुर करते हैं. चारों तरफ़ हरे और पीले रंग से रंगे हुए खेतों के बीच. पीछे से पंजाबी संगीत की धुन सुनाई देती है.

उस एक सीन से फ़िल्म के निर्देशक आदित्य चोपड़ा ने विदेश में रहने वाले हर भारतीय के दिल की बात कह दी थी. या कम से कम ऐसा लोग सोचते हैं.

कई दशकों से भारत के लोग ब्रिटेन, अमरीका, मलयेशिया और दक्षिण अफ्रीका जाकर बसते रहे हैं. इन सभी लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है, विदेशी माहौल से तालमेल बनाते हुए भी भारतीय मूल्यों को अपने अंदर बचाए रखने की.

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वहीं भारत में उन्हें जानने वाले, रिश्तेदार-दोस्त उन्हें कभी अचंभे तो कभी शक की निगाह से देखते हैं. वो ये सोचते हैं कि विदेश जाने के बाद क्या उनमें भारतीयता और अपने वतन के प्रति लगाव बचा है? पश्चिमी देशों के बारे में हिंदुस्तान का नज़रिया सदियों से यही रहा है कि वहां के लोग खुले और मिज़ाज के होते हैं. उनका कोई किरदार नहीं होता.

डीडीएलजे ने बदली सोच!

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बॉलीवुड में अप्रवासी भारतीय अक्सर विलेन के तौर पर ही पेश किए गए हैं. वो लोग, जो अपनी जड़ों से कट गए हैं. वो जो भारतीय जीवन मूल्यों को भूल गए हैं.

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे फ़िल्म में इस सोच को बदलने की कोशिश की गई थी. इस फ़िल्म में दिखाया गया था कि विदेश में बसे भारतीय मूल के लोग किस तरह अपने देश को मिस करते हैं. वहां की आबो-हवा को याद करते हैं. विदेश में बसे भारतीय मूल के लोगों को ये फ़िल्म ख़ूब पसंद आई. ब्रिटेन से लेकर फ्रांस और अमरीका तक, हर जगह अप्रवासी भारतीयों ने इसे पसंद किया.

असल में अप्रवासी भारतीयों को डीडीएलजे ने ये समझाया कि भारतीय होने का ये मतलब नहीं कि वो भारत में ही रहें. वो विदेश में रहकर, भारतीय रस्मो-रिवाज अपनाकर, भारतीय नैतिक मूल्यों का पालन करके भी ख़ुद के भारतीय होने का एहसास कर सकते हैं.

फिल्म के हीरो-हीरोइन, राज और सिमरन, ब्रिटेन में पले-बढ़े हैं. लेकिन वो मां-बाप का सम्मान करते हैं. शादी से पहले सेक्स करने से परहेज़ करते हैं. दूसरों की मदद करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं. कहने का मतलब ये कि ये जीवन मूल्य ही भारतीयता हैं. इन्हें अपनाकर विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोग ख़ुद को भारतीय समझ सकते हैं. वो भारत के प्रति अपना लगाव जब-तब देश को याद करके जता सकते हैं.

आज भी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे भारत की सबसे कामयाब फ़िल्मों में से एक है. इसकी नक़ल करके कई और भारतीय फ़िल्में बनीं, जिसमें अप्रवासी भारतीयों के कहानियां दिखाई गईं.

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एक दौर था जब भारत के लोग अक्सर ब्रिटेन जाना पसंद करते थे. हमारी फ़िल्मों में ब्रिटेन में बसे भारतीयों की कहानियां देखने को मिलती थीं. जैसे कि 2001 की फ़िल्म कभी ख़ुशी कभी ग़म.

आज का दौर अमरीका का है. विदेश जाने वाला हर भारतीय सब से पहले अमरीका जाने की सोचता है. यही वजह है कि 1997 की परदेस जैसी फ़िल्में हमें अमरीकी समाज की बुराइयां और इसके अप्रवासी भारतीयों पर असर की कहानी सुनाती हैं. ये दिखाती हैं कि अमरीकी लोग सिगरेट और शराब में डूबे रहते हैं. वो बेवफ़ा और ख़ुदग़र्ज़ होते हैं.

इस फ़िल्म में भी हीरो के तौर पर शाहरुख़ ख़ान अपने अंदर की भारतीयता को बचाकर रखते हैं. वो घर के बड़ों का सम्मान करते हैं. औरतों की इज़्ज़त करते हैं. इसी फ़िल्म में अमरीश पुरी भी आई लव माई इंडिया गाते हुए दिखाई देते हैं.

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भारत और भारतीयता

जब बॉलीवुड फिल्में भारत और भारतीयता की बात करती हैं. अप्रवासियों की कहानियां सुनाती हैं. तो वो पश्चिमी समाज को हमेशा एक ख़ास चश्मे से देखती हैं. वो ये कि पश्चिमी सभ्यता गलीच है, ख़राब है. उसके कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं.

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फिर वो चाहे 1997 की परदेस हो या 2017 की बेफिक्रे. जिसमें दो भारतीय मूल्य के युवा बिना शादी के रिश्ते में रहते हैं. हालांकि ये कहानी पेरिस की है. मगर बॉलीवुड का पश्चिमी देशों को ख़ास नज़रिए से पेश करने की आदत वही की वही है. ये बात हम कल हो न हो फ़िल्म में भी देखते हैं.

अप्रवासी भारतीय अक्सर भारत को याद करते वक़्त यहां के रंग-बिरंगे, ज़िंदादिल समाज को याद करते हैं. ऐसा करके हमारे फ़िल्मकार अक्सर विदेशी समाज को बोरियत से भरा, सादा और ज़िंदादिली से महरूम दिखाने की कोशिश करते हैं. फिर चाहे वो फ्रांस हो, अमरीका हो या फिर ब्रिटेन.

बॉलीवुड फ़िल्मों में ऐसा दिखाया जाता है कि पश्चिमी देशों में शादियां एकदम सादा समारोह होती हैं. न तो वहां का खाना अच्छा होता है और न ही पहनावा. जितने चतुर भारतीय होते हैं, उतने पश्चिमी देशों के लोग नहीं होते.

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विदेश का मतलब सिर्फ़ गोरे लोग!

विदेश में बसे भारतीयों की कहानी सुनाते वक़्त बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए विदेश का मतलब सिर्फ़ गोरे लोग होते हैं. ऐसा लगता है कि ब्रिटेन, अमरीका या फ्रांस में अश्वेत नागरिक होते ही नहीं. उनके किरदार अगर कभी दिखाए भी जाते हैं, तो बेहद भद्दे तरीक़े से. किसी भारतीय कलाकार का चेहरा काला कर के उसे अश्वेत किरदार में पेश किया जाता है.

अश्वेतों का बॉलीवुड का ये ब्लैक आउट इस तरह का है जैसे नस्लीय भेदभाव. 2014 की फ़ैशन फ़िल्म में हीरोइन जब एक रात किसी अश्वेत के साथ सेक्स कर लेती है, तो ऐसा महसूस करती है जैसे उससे बहुत बड़ा जुर्म हो गया हो.

हो सकता है कि दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे की कहानी 90 के दशक के हिसाब से ठीक रही हो. मगर अब बॉलीवुड को अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है. विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के वो लोग जो वहीं जन्मे हैं. जिनकी परवरिश वहीं हुई है, उन्हें लगता है कि उनकी कहानियां बॉलीवुड के फ़िल्मकार नहीं सुनाते. उनके बोलने का लहज़ा अक्षय कुमार या शाहरुख़ ख़ान से अलग है. वो अप्रवासी भारतीयों के हिंदी मिली अंग्रेज़ी बोलने को नहीं पसंद करते हैं. बॉलीवुड की पश्चिमी देशों के बैकग्राउंड पर आधारित फ़िल्मों में अश्वेत किरदारों को भी और जगह मिलनी चाहिए.

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बॉलीवुड को द बिग सिक, नेमसेक और मीट द पटेल्स फ़िल्मों की कामयाबियों से सीखना चाहिए. ये फ़िल्में ये नहीं दिखातीं कि अप्रवासी किस तरह से भारत को याद करते हैं. भारतीयता को बनाए रखते हैं. ये उन चुनौतियों को पेश करते हैं, जो पश्चिमी देशों में रह रहे अप्रवासी भारतीय झेलते हैं. ज़रूरत है कि बॉलीवुड अब डीडीएलजे वाली सोच से बाहर आए.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.

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