अमरीकी ज़बान के आगे ख़त्म होती ब्रिटिश अंग्रेज़ी

  • 1 जनवरी 2018
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एक वक़्त ऐसा था जब ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज अस्त नहीं होता था. न्यूज़ीलैंड-ऑस्ट्रेलिया से लेकर अमरीका तक अंग्रेज़ हुकूमत हुआ करती थी.

जहां अंग्रेज़ गए, वहां उनकी ज़बान अंग्रेज़ी गई. अंग्रेज़ों ने तमाम देशों पर क़ब्ज़ा किया. साथ ही साथ अंग्रेज़ी बोलने वालों की तादाद बढ़ती रही.

मगर, हुकूमते बर्तानिया अब बहुत सिमट गई है. सो, उनकी ज़बान अंग्रेज़ी भी अब हर देश के लोग अपने हिसाब से ढालकर बोलते हैं.

अंग्रेज़ अपनी भाषा को बहुत घुमा-फिरा कर बोला करते थे. अंग्रेज़ों के मिज़ाज की तरह ब्रिटिश इंग्लिश का मिज़ाज भी थोड़ा नकचढ़ा टाइप का है.

ऐसे नहीं, वैसे बोलना है. किसी बात को सीधे तौर पर कहने के बजाय थोड़ा घुमा-फिरा कर कहो तो बात बर्तानवी हो जाए. अंग्रेज़ समाज दर्जा पसंद है. सो अंग्रेज़ी का मिज़ाज भी वैसा हो गया.

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जहां से गुज़रती हैं वहीं की हो जाती है

अब इंसान का दामन वसी हो या ना हो, लेकिन ज़बान का दायरा हमेशा बड़ा रहा है. ये कभी अपने पराए में फ़र्क़ नहीं करती. बल्कि जहां से गुज़रती है वहां की बोली को अपना दोस्त बना लेती है. धीरे-धीरे ये दोस्ती कभी ना ख़त्म होने वाले मज़बूत रिश्ते में तब्दील हो जाती है.

मसलन, उर्दू एक लश्करी ज़बान है. इसे लश्करी इसीलिए कहा जाता है कि ये जहां से भी गुज़री वहां की बोलियों को इसने ख़ुद में समेट लिया. इसी तरह हिंदी ने भी संस्कृत के साथ साथ ब्रज और अवधी ज़बानों को अपने साथ मिलाकर ख़ुद को ताक़तवर बना लिया.

कुछ ऐसा ही मामला अंग्रेज़ी ज़बान का है. अंग्रेज़ी ने जब अटलांटिक महासागर को पार किया, तो अमरीका पहुंचकर इसके मिज़ाज एकदम बदल गए. अमरीकियों के अंग्रेज़ी बोलने की वजह से अंग्रेज़ी ज़बान का दायरा आज बहुत बड़ा हो चुका है. ये दुनिया की सबसे ताक़वतर और सबसे ज़्यादा क्रिया शब्दों से लबरेज़ ज़बान है.

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अमरीकन अंग्रेज़ी मिलावटी और जाहिलाना

लेकिन ख़ुद को इसका असली मालिक समझने वाले ब्रिटिश अब अमरीकन अंग्रेज़ी को मिलावटी और जाहिलाना बताते हैं. उनकी नज़र में अंग्रेज़ी की नफ़ासत को सबसे ज़्यादा अमरीका ने नुक़सान पहुंचाया है.

अंग्रेज़ों को लगता है कि अमरीका से घूमकर जब उनकी भाषा वापस ब्रिटेन आई, तो उसके नक़्श और मिज़ाज दोनों ही बदल गए हैं. न तो उसमें खालिस बर्तानवी सामंती ठसक है. न ही वो नफ़ासत जिससे शैली, शेक्सपियर, शॉ और चार्ल्स डिकेंस ने अंग्रेज़ी साहित्य की रचनाएं कीं.

आज ब्रिटेन वासियों को लगने लगा है कि इस ज़बान का अस्तित्व ख़तरे में आ चुका है. क्योंकि सारी दुनिया में आज ब्रिटिश अंग्रेज़ी कम और अमरीकी अंग्रेज़ी ज़्यादा बोली जाने लगी है. बर्तानिया के लोगों को लगने लगा है कि साल 2120 तक ख़ालिस अंग्रेज़ी ज़बान का पूरी तरह से अमरीकीकरण हो जाएगा.

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अमरीकी अंग्रेजी ब्रिटेन को जीत चुकी है

ब्रिटिश लेखक और भाषाविद् मैथ्यू ल्यूइस एंजेल ने हाल ही में एक क़िताब लिखी है. इसका नाम है-That's the Way it Crumbles: The American Conquest of English. इस

इस क़िताब में एंजेल्स लिखते हैं कि कभी अमरीका पर ब्रिटेन का राज था. मगर आज अमरीकी अंग्रेज़ी ब्रिटेन को जीत चुकी है. वो कहते हैं कि आज आम ब्रिटिश नागरिक रोज़ाना औसतन 170 अमरीकी अंग्रेज़ी वाले शब्द इस्तेमाल करता है. यही हाल रहा तो कुछ दिन में अंग्रेज़ों वाली इंग्लिश, अपने ही वतन से ज़लावतन हो जाएगी.

जब यूरोपीय नागरिकों के साथ अंग्रेज़ी अमरीका पहुंची, तो वहां के माहौल के लिए उसे कई नए शब्दों की ज़रूरत पड़ी. मसलन, बर्तानवी ज़बान में मकई के लिए कोई शब्द नहीं था, क्योंकि ये यहां की फ़सल नहीं है. लेकिन अमरीका में ये बड़े पैमाने पर पैदा होती है. लिहाज़ा यहां के लोगों ने इसके लिए अंग्रेज़ी ज़बान में शब्द जोड़ा.

फिर, अमरीकी समाज में वैसी बंदिशें नहीं थीं, जैसी ब्रिटिश सोसाइटी में देखने को मिलती हैं. जैसे-जैसे दुनिया में अमरीका की ताक़त बढ़ी, तो वहां के लोगों वाली अंग्रेज़ी भी ज़्यादा बोली जाने लगी. अमरीकी जिस देश में भी जाते हैं वहां अपनी बोलचाल की धाक जमा लेते हैं.

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अंग्रेजी ने दूसरी ज़बान को अपने में शामिल किया

ऐसा नहीं है कि अंग्रेज़ी में किसी और ज़बान के शब्द नहीं हैं. इसमें इतालवी, जर्मन, फ्रेंच और डच भाषाओं के शब्द हैं. दुनिया की दूसरी भाषाओं के लफ़्ज़ भी अंग्रेज़ी ने अपने दामन में समेटे हैं. जैसे कि, इस साल ऑक्सफोर्ड शब्दकोष में 70 हिंदुस्तानी शब्दों को शामिल किया गया है.

अब्बा, अन्ना, क़ीमा, वादा, गुलाब जामुन जैसे शब्द अब अंग्रेज़ी में बोले, सुने और लिखे जा रहे हैं. अंग्रेज़ी ज़बान के फैलते दायरे की सबसे बड़ी वजह है सभी देशों के आपस में जुड़े आर्थिक रिश्ते. ब्रिटेन ने भारत पर अपना राज क़ायम किया, तो कई स्थानीय शब्द भी अपनी ज़बान में शामिल किए. जैसे कि बंगला, बाज़ार, झोला वग़ैरह.

मगर, एंजेल कहते हैं कि बर्तानवी अंग्रेज़ी बोलने वालों में एक अलग तरह की ऐंठ है.

अकड़ किसी भी चीज़ के लिए अच्छी नहीं है. ये इंसान तक को ख़त्म कर देती है. लिहाज़ा बहुत सी बातों में लचीला रूख़ होना बहुत ज़रूरी है. एक दौर था जब भारत में संस्कृत और पाली भाषाओं का बोल-बाला था.

प्राचीन भाषा ब्राहुई भी बहुत इस्तेमाल हुआ करती थी. लेकिन आज इन्हें बोलने वाले नहीं रहे. बदलते वक़्त के साथ इस ज़बान को बदला नहीं गया. नतीजा सामने है.

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वो दीवाना कातिल और ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी

हिंदुस्तानी का चोला पहन बच गई उर्दू

कुछ ऐसा ही हाल उर्दू के साथ भी रहा. हालांकि हिंदुस्तानी का चोला पहनने के बाद ये अपना वजूद बचाने में कामयाब रही. वरना इस ज़बान के ठेकादारों ने भी इसे दफ़न करने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ी थी.

इस ज़बान के बेपनाह आशिक़ होने के बावजूद ये बहुतों की महबूबा नहीं बन पाई क्योंकि इस नस्तालीक़ यानी उर्दू लिपि में ही लिखे जाने की ज़िद ने इसे लोगों से दूर कर दिया.

हालांकि जब से उर्दू वालों को इसके ख़ात्मे का एहसास हुआ तो उन्होंने इसे देवनागरी में लिखना शुरू कर दिया. अंग्रेज़ी की तरह उर्दू में दुनिया की लगभग हर भाषा के शब्द मिलते हैं. इसीलिए इसका दायरा बढ़ा है. हर बोली बोलने वाले को इसमें कोई ना कोई जाना पहचाना शब्द मिल जाता है.

उर्दू का ज़िक्र इस लेख में इसलिए कि आज ब्रिटिश इंग्लिश का हश्र उर्दू जैसा ही हो रहा है. अमरीकी अंग्रेज़ी का सुरूर पूरी दुनिया पर तारी है. लेकिन, ब्रिटिश इंग्लिश के शैदाई इसकी शुद्धता को लेकर ज़रा भी लोच नहीं रखते.

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अगर ब्रिटेन के लोगों ने भी अपनी ज़िद नहीं छोड़ी, तो इस बात में वाक़ई कोई दो राय नहीं कि ब्रिटेन की अंग्रेज़ी पूरी तरह से अमरीकी हो जाएगी.

यानी विदेश से लौटे बेटे का जलवा अपने वतन पर क़ायम हो जाएगा. वैसे इसमें कोई बुरी बात तो नही.

क्या उर्दू ज़बान सचमुच मर रही है?

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