हज़ारों बच्चों को पढ़ाने वाले गधे

गधे से पढ़ाई

'गधा कहीं का'

ये जुमला हम सब ने सुना है. बहुत बार इस्तेमाल भी किया होगा. कभी किसी ने हमारे लिए कहा होगा. तो, कई बार किसी की मूर्खता या घामड़पन पर हम लोगों ने बेज़ारी से कह दिया होगा...गधा कहीं का.

कुछ सलीक़ामंद लोग, या साहित्यिक रुझान रखने वाले इसी जुमले को कुछ यूं कह देते हैं...

अरे, वैशाखनंदन!

गधों के नाम पर लगा दाग

गधा मूर्खता का पर्याय है. कानपुर से कराची तक. कासाब्लांका से कोलंबिया तक. गधे को बेवक़ूफ़ जानवर और बेवक़ूफ़ी करने वालों को गधा सदियों से कहे जाने की परंपरा रही है.

मगर, लैटिन अमरीकी देश कोलंबिया में एक शख़्स हैं, जो इस जुमले को नए अंदाज़ में गढ़ रहे हैं. वो गधों के नाम पर लगा ये दाग़ धो डालने में जुटे हैं.

इस शख़्स का नाम है, लुईस सोरियानो. वो पिछले बीस सालों से गधों की मदद से तालीम की अलख जगा रहे हैं.

लुईस, कोलंबिया के ग्रामीण इलाक़े ला ग्लोरिया में टीचर थे. वो बताते हैं कि उस इलाक़े के बच्चों के पास क़िताबें ही नहीं थीं. वो पूरे इलाक़े में इकलौते शख़्स थे, जिनके पास क़िताबें थीं. लुईस सोरियानो के पास 70 क़िताबें थीं. इनमें इतिहास, भूगोल, विज्ञान, दर्शनशास्त्र से लेकर बच्चों के लिए कहानियों की क़िताबें थीं.

एक रोज़ लुईस ने सोचा कि अगर बच्चों के पास क़िताबें नहीं हैं, तो क्यों न क़िताबों को बच्चों तक पहुंचाया जाए.

कोलंबिया तो यूं भी ड्रग माफ़िया और बरसों से चल रहे ख़ूनी गृह युद्ध के लिए बदनाम है. सड़कें नहीं हैं. बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं.

Image caption लुईस सोरियानो

वर्णमाला बनाते गधे

ऐसे में, लुईस सोरियानो की नज़र पड़ी दो गधों पर. ये दोनों गधे उनके घर में पानी ढोने का काम करते थे. लुईस ने एक का नाम रखा अल्फ़ा और दूसरे का नाम रखा बेटो. दोनों को मिलाकर स्पेनिश का शब्द बनता है अल्फाबेतो. यानी अल्फ़ाबेट, यानी वर्णमाला.

लुईस ने इन गधों की पीठ पर लदने वाली मशक में बदलाव करके उन पर क़िताबें रखने का इंतज़ाम किया. फिर वो ला ग्लोरिया इलाक़े के एक-एक गांव जाकर बच्चों को क़िताबें पढ़ाने लगे.

लुईस बताते हैं कि कोलंबिया के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं से महरूम इन बच्चों ने उनकी गधा लाइब्रेरी को हाथों-हाथ लिया. वो ख़ुद भी बच्चों के साथ बैठकर उन्हें क़िताबें पढाते. बच्चे उन्हें दूर से आता देखकर उनकी तरफ़ भागते. क़िताबों में बच्चों की दिलचस्पी हैरान कर देने वाली थी.

कहानियों की क़िताबें देखकर बच्चों के चेहरे चमक उठते. अगर कोई एक कहानी पढ़ता, तो वो उसे फिर अपने दूसरे साथियों को बताता. लुईस भी तमाम बच्चों को साथ बैठाकर उन्हें क़िताबें पढ़ाते.

गधा लाइब्रेरी की धूम

देखते ही देखते लुईस और उनके दो गधे, अल्फ़ा और बेतो, पूरे इलाक़े में मशहूर हो गए. कोलंबिया के एक जाने-माने पत्रकार ने उनकी कहानी दुनिया को सुनाई, तो उनकी शोहरत और बढ़ गई. दुनिया भर से लुईस की गधा लाइब्रेरी के लिए मदद मिलने लगी,

आज की तारीख़ में लुईस सोरियानो की गधा लाइब्रेरी में 3 हज़ार क़िताबें हो गई हैं. दो हज़ार और क़िताबें भी उसमें आने वाली हैं. इलाक़े के और लोग भी अब गधों पर क़िताबें लादकर दूर-दराज़ के बच्चों तक ले जाते हैं और शिक्षा की अलख जगा रहे हैं.

वैसे, लुईस के लिए बिबिलियोबर्रो यानी गधा लाइब्रेरी को कामयाब बनाना इतना आसान नहीं था.

इलाके में वर्चस्व की जंग लड़ रहे गुरिल्ला लड़ाके अक्सर उन्हें दुश्मनों का एजेंट समझ लेते. वो ये सोचते थे कि क़िताबों की आड़ में असल में लुईस बंदूकें उनके दुश्मनों तक ले जा रहे हैं.

एक बार दक्षिणपंथी गुट के लड़ाकों ने लुईस को अगवा कर लिया. उन्हें जंगल में क़ैद कर के रखा गया. लड़ाकों ने लुईस के गधों की तलाशी ली. जब उन्होंने देखा कि उनमें क़िताबों के सिवा कुछ और नहीं लदा, तो फिर गुरिल्लाओं ने उन्हें जाने दिया.

नकली पैर के सहारे कदम बढ़ाते लुइस

अब, ला ग्लोरिया ही नहीं, कोलंबिया के दूसरे इलाक़ों के लोग भी लुईस सोरियानो और उनके गधों अल्फ़ा और बेतो को जानने लगे हैं.

लुईस की एक शागिर्द रहीं, मारिया फर्नांडा वेगा अब टीचर बन गई हैं. वो कहती हैं कि लुईस की वजह से ही उन्हें क़िताबों से मोहब्बत हो गई. अब वो ख़ुद भी लाइब्रेरी चलाती हैं.

लुईस कहते हैं कि आप हज़ार बीज ज़मीन में बोते हैं. उनमें से कुछ सड़ जाते हैं. कुछ सूख जाते हैं. वहीं कुछ बीज नई फ़सल के तौर पर लहलहाते भी हैं. मारिया को वो वैसा ही बीज मानते हैं. जो आज तालीम का ख़ुदमुख़्तार दरख़्त बन गई हैं.

एक हादसे में लुईस सोरियानो का एक पैर टूट गया. अब वो प्रोस्थेटिक पैर की मदद से चलते हैं. इससे उनका सफ़र थोड़ा मुश्किल हो गया है. पहले जहां लुईस बड़ी आसानी से गधों पर सवार हो जाते थे. वहीं, अब उन्हें इसके लिए किसी टीले या लकड़ी के लट्ठे की तलाश करनी पड़ती है.

मगर, लुईस बिना थके, बिना हारे अपने गधों की मदद से अल्फ़ाबेट की रौशनी फैला रहे हैं. इस में उनके गधों अल्फ़ा और बेतो का बहुत बड़ा योगदान रहा है.

तो, अब आप भी किसी को यूं ही 'गधा कहीं का' न कह दीजिएगा.

कैंसर थेरेपी में मदद करते गधे

लक्ज़री कार चुरा के ले जा रहे थे गधे!

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