गुलाबी रंग से महिलाओं का क्या है नाता

  • 25 अप्रैल 2018
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हर रंग कुछ कहता है. हर रंग का कोई ना कोई मतलब होता है. ज्योतिष के मुताबिक़ तो रंगों का हमारी कुंडली से भी गहरा रिश्ता होता है. यही नहीं रंग हमारे मूड पर भी असर डालते हैं.

मिसाल के लिए सफ़ेद रंग सुकून और शांति का रंग माना जाता है. तभी तो ग़म के माहौल में सफ़ेद रंग का इस्तेमाल होता है. इसी तरह हरा रंग खुशहाली का प्रतीक माना जाता है. तो, लाल रंग क्रांति, ऊर्जा और बदलाव का रंग माना जाता है.

लेकिन सभी रंगों के अर्थ में सबसे ख़ूबसूरत अर्थ गुलाबी रंग से जुड़ा है. इसे शर्मो-हया का रंग माना जाता है. गुलाबी रंग का महिलाओं से गहरा नाता रहा है.

यही वजह है कि किसी के शरमा जाने पर उसके गालों के गुलाबी होने की मिसाल दी जाती थी. गुलाबी रंगत या गुलाबी रंग के लिबास को हमेशा जनाना माना जाता था. लेकिन, गुलाबी रंग का ये मतलब हमेशा से ऐसा नहीं था. वक़्त के साथ इसके मायने बदले हैं.

कभी था दोधारी तलवार

एक वक़्त था जब गुलाबी रंग को दो-धारी तलवार कहते थे. लंदन के अंडरवर्ल्ड में गुलाबी शब्द का ख़ूब इस्तेमाल होता था. इसका मतलब था किसी को तेज़ धारदार हथियार से लहूलुहान कर देना. ये शब्द सत्रहवीं सदी में डिक्शनरी में शामिल किया गया. जिसका मतलब लिखा गया चोर-उचक्कों, उठाईगीरों और डाकू-लुटेरों द्वारा इस्तेमाल होने वाला शब्द.

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आखिर गुलाबी रंग की छवि कब और कैसे बदली कह पाना मुश्किल है. लेकिन अठारहवीं सदी में इसे ख़ूबसूरती बयां करने वाले रंगों की फेहरिस्त में शामिल किया जा चुका था. प्राचीन काल में जब कला के क्षेत्र में इस रंग का इस्तेमाल शुरू हुआ तो कला का रूप ही बदल गया. अगर चित्रकारी के रंगों की लिस्ट से इस रंग को हटा दिया जाए, तो आर्ट का इतिहास ख़त्म हो जाएगा. जिस वक़्त आर्ट अपने शबाब पर पहुंचा, उस वक़्त गलाबी रंग ने उसे अलग पहचान दिलाई. अगर गुलाबी रंग नहीं होता तो पाब्लो पिकासो की चित्रकारी को शायद वो मक़ाम नहीं मिला होता जो उसे आज नसीब है.

चित्रकारी में गुलाबी रंग की अहमियत मध्यकालीन यूरोप में पुनर्जागरण काल में बढ़ी. यही वो दौर था जब यूरोपीय देशों ने ज़िंदगी में नए आयाम जोड़ने वाली चीज़ों की तरफ़ ध्यान देना शुरू किया था. इसमें चित्रकारी, साहित्य और संगीत अहम हैं. पंद्रहवीं सदी के मध्य में इटली के महान चित्रकार फ़्रा एंग्लिको ने अपने मशहूर फ़्रेस्को में गुलाबी रंग को नए अंदाज़ और मायने में इस्तेमाल किया है. इसमें दिखाया गया है कि ईसा मसीह की मां मरियम के पास स्वर्ग दूत जिबरील ख़ुदा का पैग़ाम लेकर आते हैं कि वो ईसामसीह को जन्म देंगी. तस्वीर में जिबरील बहुरंगी पंखों के साथ हैं और उन्हें गुलाबी रंग में दिखाया है.

उसी दौर के एक चित्रकार की किताब में गुलाबी रंग का ज़िक्र करते हुए लिखा गया है कि इस रंग का इस्तेमाल शरीर की रंगत बताने के लिए किया जाता रहा है. चूंकि शरीर मांस से बनता है और मांस गुलाबी रंग का होता है, इसीलिए हाथ, चेहरा और नंगा बदन दिखाने के लिए इसी रंग का इस्तेमाल किया जाता था.

परंपरा को तोड़ा

फ़्रा एंग्लिको ने जिबरील को गुलाबी रंग में दर्शा कर एक बंधी बधाई परंपरा को तोड़ा. जिबरील एक फ़रिश्ता और पाक रूह हैं. रूहें कभी नहीं मरतीं जबकि शरीर एक उम्र के बाद ख़त्म हो जाता है. इस तस्वीर में जिबरील को गुलाबी रंग में दिखाने का मक़सद भी यही है.

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दरअसल यूरोप में रिनेसां यानी पुनर्जागरण, अंधकार काल के बाद आया. और इसकी शुरूआत उन देशों से हुई जहां ईसाई धर्म फैला था. इसीलिए इस दौर की ज़्यातर पेंटिंग्स में ईसा मसीह, उनकी मां मरियम और जन्नत का नज़ारा ज़्यादा दिखाया गया है.

पुनर्जागरण काल का ही एक और मास्टर पीस है, चित्रकार राफेल का 'मडोना ऑफ़ द पिंक'. ये मास्टरपीस 1506 के आसपास बना था. इसमें ईसा अपनी मां की गोद में हैं, और वो उन्हें गहरे गुलाबी रंग की कोई चीज़ दे रहे हैं. बताया जाता है कि ये डियाथस नाम का पौधा है. इसका ये नाम ग्रीक भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है ख़ुदा का फूल. ईसाईयों की धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ मरियम को ये फूल ईसा मसीह के सूली पर लटकने के समय नज़र आया था.

इस पेंटिंग में ये संदेश देने की कोशिश की गई है कि एक ज़िंदगी ख़त्म होने के बाद वो दूसरे रूप में फिर धरती पर आती है. इसी तरह पूरी दुनिया का निज़ाम चलता है.

गुलाबी रंग को प्रमुखता

इसी तरह जॉर्ज रोमनी ने अपनी प्रेयसी लेडी हैमिल्टन की जो तस्वीर बनाई, उसमें गुलाबी रंग को प्रमुखता दी. इसमें बैकस नाम का एक यूनानी देवता है जो शराब का देवता माना जाता है. इसे भी गहरे गुलाबी रंग में ही दर्शाया गया है.

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बीसवीं सदी के आते-आते गुलाबी रंग के बहुत से मायने बदले और आर्थिक तौर पर ये रंग मोटी कमाई का ज़रिया बन गया. अमरिकी आर्टिस्ट फ़िलिप गस्टन ने तो इस रंग को बाज़ार में ख़ूब भुनाया. गुलाबी रंगत वाली बार्बी डॉल ने तो दुनिया भर के घरों में अपनी जगह बना ली.

गस्टन ने उग्रवादी संगठन कू क्लक्स क्लान के सदस्यों के कार्टून बनाने में इस रंग का इस्तेमाल किया. असल में अमरीका में पचास के दशक में गुलाबी रंग को मर्दाना और ताक़त की नुमाइश वाला रंग माना जाने लगा था. लेकिन साठ का दशक आते-आते बार्बी डॉल की वजह से एक बार फिर से इसे नज़ाकत वाला रंग समझा जाने लगा.

गुलाबी रंग का दिमाग़ पर असर

साठ के ही दशक में अमरीकी सामाजिक वैज्ञानिक अलेक्ज़ेंडर शॉस ने गुलाबी रंग के दिमाग पर असर पर रिसर्च किया. नतीजे में पता चला कि गुलाबी रंग बहुत से गुस्से वाले लोगों के मिज़ाज को शांत बना देता है.

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हाल ही में जब ब्रिटिश कलाकार अनीष कपूर ने वांटाब्लैक नाम के बेहद काले रंग का कॉपीराइट हासिल किया, तो इस पर उनके साथी स्टुअर्ट सेंपल ही बिफ़र उठे.

उन्होंने कपूर के इस क़दम के ख़िलाफ़ दुनिया का सबसे गुलाबी रंग बनाने की ठानी. अनीष कपूर ने तो गहरे काले रंग का कॉपीराइट कर लिया. मगर स्टुअर्ट सेंपल अपने सबसे गुलाबी रंग को बेहद सस्ते दाम पर लोगों को बेचने लगे. शर्त बस ये थी कि वो अनीष कपूर न हो न ही उनके दोस्त हों कि उन्हें ये सबसे गुलाबी रंग दे सकें.

तो, अब गुलाबी रंग तो नज़ाकत के साथ-साथ बग़ावत का भी प्रतीक बन गया है.

कुल मिलाकर रंगों का हम क्या इस्तेमाल करेंगे क्या संदेश देंगे, ये अलग दौर में अलग-अलग सोच रही है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.

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