लेडी चैटर्ली की कहानी जिसके करोड़ों दीवाने रहे

  • 4 जनवरी 2019
लेडी चैटर्ली की वो अनकही कहानी... इमेज कॉपीरइट Alamy

कॉलेज के दिनों में बहुत से युवाओं ने लेडी चैटरली का क़िस्सा पढ़ा होगा. ज़मींदार परिवार की महिला के एक कामगार से जिस्मानी ताल्लुक़ात को डी एच लॉरेंस ने अपने उपन्यास 'लेडी चैटरलीज़ लवर' में विस्तार से बयां किया था.

लेडी चैटरली की कामुकता के बहुत से युवा दीवाने बन गए थे. उन्हें लगता था कि लॉरेंस के उपन्यास का ये किरदार हक़ीक़त में उनकी ज़िंदगी में आ जाए तो क्या लुत्फ़ हो.

अल्हड़, मदमस्त, कामुक लेडी चैटरली ने दुनिया भर में करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बना लिया था.

पर, लेडी चैटरली के क़िस्से के रसिक करोड़ों लोगों में बहुत कम ही लोगों को मालूम होगा कि डीएच लॉरेंस के उपन्यास का वो किरदार कोई गढ़ा हुआ नहीं था. वो किरदार एक कल्पना भर नहीं, जीती-जागती महिला थी, जो लॉरेंस की ज़िंदगी पर गहरा असर छोड़ गई थी.

उस महिला का नाम था फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन. हाल ही में मशहूर ब्रिटिश लेखिका एनाबेल एब्स ने फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन की ज़िंदगी पर नई रोशनी डालने वाली किताब लिखी है, जिसका नाम है फ्रीदा.

फ्रीदा की ज़िंदगी के बारे में बहुत कम लोगों को पता है. वो डीएच लॉरेंस की प्रेमिका थी, प्रेरणा थी और हमराज़ भी थी.

अंग्रेज़ी का शब्द म्यूज़ (muse) उस शख़्स के लिए इस्तेमाल होता है, जो किसी कलाकार को कुछ नया रचने-गढ़ने के लिए प्रेरित करे. दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हुए हैं, जिन्होंने कलाकारों को एक से एक कृतियां रचने की प्रेरणा दी है.

डीएच लॉरेंस की ज़िंदगी में आई फ्रीदा ने भी लॉरेंस को लेडी चैटरली जैसा किरदार गढ़ने की प्रेरणा दी और लॉरेंस को अमर बना दिया.

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फ्रीदा की ज़िंदगी

पर, ख़ुद फ्रीदा की ज़िंदगी कैसी थी? क्या वो वाक़ई लेडी चैटरली जैसी कामुक और उन्मुक्त महिला थी?

फ्रीदा की ज़िंदगी पर नज़र डालें, तो आप को कहानी एकदम अलग ही नज़र आएगी. वो ख़ुद भले ही लॉरेंस की साहित्यिक कृतियों में दर्ज बहुत सी महिला किरदारों की प्रेरणा रही. पर, फ्रीदा की अपनी ज़िंदगी की हक़ीक़त एकदम अलग थी.

फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन, डीएच लॉरेंस की प्रेमिका थी, हमराज़ थी, मॉडल थी और 'पंचिंग बैग' भी.

फ्रीदा, गुरबत के शिकार हो चुके एक जर्मन सामंत की बेटी थी. घुमक्कड़ मिज़ाज की फ्रीदा को जोखिम भरे काम करने में लुत्फ़ आता था. वो बौद्धिक प्रेरणा के लिए कसमसाती थी. पर, उस वक़्त के यूरोपीय समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा हासिल नहीं था.

ग़रीब बाप के घर की पाबंदियों से आज़ादी का एक ही रास्ता फ्रीदा के पास था और वो था शादी. 1899 में फ्रीदा ने केवल बीस बरस की उम्र में ब्रिटिश भाषा वैज्ञानिक अर्नेस्ट वीकले से ब्याह रचा लिया. शादी के बाद फ्रीदा जर्मनी से इंग्लैंड के नॉटिंघम शहर रहने के लिए आ गई. उस वक़्त नॉटिंघम एक औद्योगिक शहर हुआ करता था, जहां कारखानों का शोर भी था और प्रदूषण भी.

फ्रीदा ने जिस उम्मीद से शादी की थी, वो जल्द ही टूट गई. पति अर्नेस्ट वीकली को जवां बीवी से ज़्यादा काल्पनिक शब्दों में दिलचस्पी थी. फ्रीदा एक बार फिर से तन्हा थी. उसके साथ थी उसकी ख़्वाहिशें और खीझ. एक तरफ़ पति अर्नेस्ट अपनी किताब लिखने में व्यस्त, तो दूसरी तरफ़ फ्रीदा अपने तीन बच्चों को पालने में मसरूफ़.

जब पहला बच्चा सात बरस का हो गया, तो एक बार फिर फ्रीदा को अपने भीतर अजीब सी कुलबुलाहट, एक सख़्त क़िस्म की बेचैनी महसूस हुई. उसे लगा कि वो जाने क्या-क्या हो सकती थी, कर सकती थी. मगर, वो तो घरेलू ज़िम्मेदारियों की क़ैदी बन गई थी.

फ्रीदा की इस उलझन को उसकी शोख बहन एल्स वॉन रिचथोफ़ेन ने दूर किया. बहन ने फ्रीदा को नाजायज़ ताल्लुक़ात बनाने की सलाह दे डाली. फ्रीदा के मनोवैज्ञानिक ओटो ग्रॉस से अवैध संबंध बन गए. ग्रॉस, फ्रीदा का आशिक़ बन गया. पर, इस रिश्ते से भी फ्रीदा की बेचैनी दूर नहीं हुई.

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नया रिश्ता

एक रोज़ अचानक फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन की ज़िंदगी में डीएच लॉरेंस की एंट्री हुई. लॉरेंस, जो फ्रीदा के पति के शागिर्द थे, एक दिन लंच पर आए. एक खदान मज़दूर के मरियल बेटे लॉरेंस उम्र में फ्रीदा से छह साल छोटे थे. दोनों के बीच बस एक गर्मागर्म बहस ने नए रिश्ते को जन्म दे दिया.

फ्रीदा और लॉरेंस का रिश्ता अजीब था. दोनों एक-दूसरे से मुहब्बत भी करते थे और झगड़ते भी ख़ूब थे. फ्रीदा ताक़तवर थी, लेकिन फिर भी लॉरेंस उसे पीटने में कामयाब हो जाते थे. लॉरेंस की जीवनी लिखने वाले जॉन वर्थेन ने इस बात का ज़िक्र अपनी किताब में किया है. डीएच लॉरेंस की एक और जीवनी लिखने वाली ब्रेंडा मैडॉक्स ने लिखा है कि फ्रीदा और लॉरेंस के बीच ज़बानी जंग भी ख़ूब होती थी.

एनाबेल एब्स ने फ्रीदा की जीवनी की शुरुआत लॉरेंस से दूसरी मुलाक़ात से की है. उस रोज़ फ्रीदा की नौकरानी नहीं आई थी. फ्रीदा को चाय बनानी भी नहीं आती थी. तो, लॉरेंस ने पानी गर्म कर के दोनों के लिए चाय बनायी. बाद में लॉरेंस ने घर के जूठे बर्तन भी धोए. एनाबेल लिखती हैं कि लॉरेंस ने फ्रीदा से पूछा कि, 'क्या तुम हमेशा ऐसी आलसी रहती हो?' फ्रीदा ने जवाब दिया था कि, 'तुम जिस तरह मुझसे बात करते हो, तुम्हारा वो अंदाज़ मुझे पसंद है.'

भले ही लॉरेंस को फ्रीदा का हर नाज़ उठाते दिखाया गया हो, मगर लॉरेंस ने फ्रीदा को तकलीफ़ भी बहुत दी. लॉरंस ने फ्रीदा के लिए कपड़े सिले. मगर, उसकी ज़िंदगी तार-तार कर दी. लॉरंस ने फ्रीदा के पति अर्नेस्ट वीकले को ख़त लिख कर फ्रीदा से अपने नाजायज़ ताल्लुक़ के बारे में बता दिया. नतीजा ये हुआ कि फ्रीदा के अपने बच्चों से मिलने तक पर रोक लगा दी गई.

एक तरफ़ फ्रीदा परेशान, तो दूसरी तरफ़ डीएच लॉरेंस भी. मगर इस हाल में भी लॉरेंस ने फ्रीदा से कई बार मार-पीट की. हालांकि वो बार-बार ये भी कहते थे कि उनकी कृतियों को फ्रीदा की ज़रूरत है.

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लॉरेंस की कृतियों के नाम की अपनी ज़िंदगी

एनाबेल लिखती हैं कि फ्रीदा को लॉरेंस के ग़ुस्से में भी लुत्फ़ आता था. नतीजा ये कि वो अपने अपमान का ख़ुद एक ज़रिया बन गई. हालांकि दोनों के दोस्तों को कई बार लगा कि उनका रिश्ता ख़त्म हो गया. पर, फ्रीदा 1930 में डीएच लॉरेंस की मौत तक उनके साथ रही.

इस ज़हरीले रिश्ते को निभाने की फ्रीदा ने भारी क़ीमत चुकाई. उन्हें अपने बच्चों से दूर होना पड़ा. फ्रीदा ने अपनी ज़िंदगी, लॉरेंस की कृतियों के नाम कर दी. एनाबेल एब्स के शब्दों में फ्रीदा को लगता था कि, 'वो चीर-फाड़ कर फेंक दिए गए खरगोश की तरह महसूस करती थी.'

फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन की जीवनी को जिस तरह से एनाबेल एब्स ने लिखा है, उससे लगता है कि फ्रीदा के भीतर क्रिएटिविटी का ज्वार उमड़ रहा था. वो अपने साथी के साथ मिलकर नई रचनाएं गढ़ना चाहती थी. लेकिन, वो ग़लत वक़्त पर पैदा हुई थी. वो प्रेमिका और प्रेरणा तो थी, मगर रचनाकार ने इसका श्रेय उसे नहीं दिया. शायद प्रेरणा बनने वालों का यही अंजाम होता है.

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प्रेरणास्रोत

आज तरक़्क़ीपसंद औरतें, किसी की प्रेरणास्रोत बनना अपनी तौहीन समझती हैं. मगर, मर्दवादी समाज में लंबे वक़्त तक औरतों को ऐसे ही किरदारों के दायरे में रखा गया है.

मसलन, चार्ल्स डिकेंस और उनकी नाकाम अभिनेत्री प्रेयसी नेल्ली टर्नन को ही लीजिए. दोनों की उम्र में लंबा फ़ासला था. मगर, डिकेंस के बहुत से किरदारों की प्रेरणा बनी नेल्ली ने अपने-आप को मिटाकर डिकेंस को कामयाब बनाया.

वैसे कोई प्रेरणास्रोत हमेशा प्रेमी ही हो, ये ज़रूरी नहीं. ब्रिटिश कवि विलियम बटलर येट्स ने कई बार मॉड गोन से प्रणय निवेदन किया, मगर हर बार उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया गया.

वहीं दांते का बीट्रिस के प्रति प्यार केवल मजाज़ी था. दोनों की मुलाक़ात तब हुई थी, जब दांते आठ बरस और बीट्रिस नौ साल की थीं. इसके बाद पूरी ज़िंदगी में वो केवल एक बार और मिले थे. 25 साल की उम्र में बीट्रिस ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. फिर भी दांते को बीट्रिस अपनी तमाम कृतियों की प्रेरणा मिली.

म्यू़ज़ यानी प्रेरणास्रोत को हमेशा किसी कलाकार को नई कृतियां रचने की प्रेरणा देने वाले के तौर पर ही याद किया जाता है.

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फ़ेहरिस्त लंबी है. सैमुअल जॉनसन की क़रीबी दोस्त हेस्टर थ्राल हों, या फिर बॉडेलेयर की प्रेयसी ज्यां डुवाल. डुवाल का तो अपना नाम तक गुम हो गया था. बॉडेलेयर उसे ब्लैक वीनस कहकर बुलाते थे.

और ऐसा सिर्फ़ महिलाओं के साथ हुआ हो, ये भी नहीं. जो मर्द, कलाकारों के प्रेरणास्रोत बने, उनका हश्र भी यही हुआ.

म्यूज़ की कल्पना यूनान से शुरू हुई थी, जिसका एक ही मक़सद था, मर्दों की नज़रों को तसल्ली देने वाले वो लोग जो ख़ुद को मिटा दें. पर, कलाकारों को नई रचनाओं की प्रेरणा दें.

आज इक्कीसवीं सदी में ऐसी परिभाषा के खांचे में बंधना तो शायद ही किसी को मंज़ूर हो. आज तो लेखकों के पास ऐसे प्रेरणास्रोतों के लिए ही वक़्त नहीं है. आज ये आउट ऑफ़ फ़ैशन हो चुका है.

ऐसे में फ्रीदा वॉन रिचथोफ़ेन जैसों का क्या होगा? उस दौर में फ्रीदा की रचनात्मक बेचैनी दूर करने का ये इकलौता विकल्प ही खुला था. जिस ने लेडी चैटरली जैसे अमर किरदार को जन्म दिया. मगर, इस रोल ने फ्रीदा की ज़िंदगी तबाह कर दी. वो ख़ुद रचनाएं गढ़ना चाहती थी. लेकिन, आख़िर में वो एक कामुक किरदार का प्रेरणास्रोत मात्र रह गई.

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