मार-धाड़ वाली टीवी सिरीज़ के दीवानें क्यों होते हैं लोग?

  • 7 जनवरी 2019
मारधाड़ वाले कार्यक्रम

अपराध गुनाह है और इसकी सज़ा भी तय है. फिर भी इंसान गुनाह करता है. कई बार अपराध के बाद इंसान ख़ुद ही पशेमान हो जाता है और जुर्म क़ुबूल कर लेता है.

लेकिन बहुत मर्तबा वो इतनी सफ़ाई से गुनाह करता है कि उसके निशान तक बाक़ी नहीं रहते. अपराध पर लगाम कसने वाली और अपराधी को पकड़ने वाली एजेंसियां भी घनचक्कर बनकर रह जाती हैं.

मिसाल के लिए भारत की मशहूर मर्डर मिस्ट्री आरूषि के केस को ही लीजिए. पुलिस इस केस में पर्याप्त सबूत तक नहीं जुटा पाई.

हालांकि, मौक़े पर मौजूद सबूतों के आधार पर आरूषि के माता-पिता को मुजरिम माना गया और उन्हें जेल में रहना पड़ा. लेकिन बाद में कोर्ट ने ये कहते हुए उन्हें बरी कर दिया कि सिर्फ़ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उन्हें मुजरिम नहीं माना जा सकता.

इस मर्डर मिस्ट्री पर किताब लिखी गई, फ़िल्म बनी. लेकिन ये क़त्ल एक राज़ ही बना रहा.

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इसी तरह गुरुग्राम के नामी स्कूल में बच्चे का क़त्ल या हाल ही में दिल्ली में एक परिवार के 11 लोगों के एक साथ ख़ुदकुशी करने की घटनाएं.

अपराध के ये ऐसे राज़ हैं, जो सुलझ नहीं सके हैं.

क्राइम ड्रामा क्यों पसंद करते हैं लोग?

इंसान की अपराध में दिलचस्पी शुरुआत से रही है. तभी तो साहित्य में भी इसे जगह मिली. अंग्रेजी में शरलॉक होम्स हों या उर्दू के इब्ने सफ़ी. इनकी लिखी कहानियों में ख़ालिस जुर्म का बखान होता था. लेकिन फिर भी लोग उसे ख़ूब चाव से पढ़ते थे.

इनकी किताबों के मुख्य किरदार आम लोगों के लिए हीरो बन जाते थे. लोगों की इसी रुचि को बाज़ार ने भी ख़ूब भुनाया. यही वजह है कि आज एंटरटेनमेंट चैनल हों या न्यूज़ चैनल सभी जगह क्राइम का एक शो देखने को मिल ही जाता है.

यहां तक की एंटरटेनमेंट के नए प्लेटफॉर्म जैसे नेटफ्लिक्स और प्राइम वीडियो पर भी द सेक्रेड गेम्स और मिर्ज़ापुर या अपहरण जैसे सीरियल धूम मचाए हुए हैं. ये वही सीरियल हैं जो जुर्म की दुनिया को आम लोगों तक पहुंचाते हैं.

दरअसल जुर्म पर आधारित साहित्य, फ़िल्म या सीरियल में दिखाई जाने वाली कहानियां कहीं ना कहीं असल ज़िंदगी में घटी घटनाओं से प्रभावित होती हैं. दुनिया भर में ऐसी अनगिनत मर्डर मिस्ट्री, डकैती और अपहरण की घटनाएं हैं जो अनसुलझी हैं. आज जुर्म की ऐसी ही अनसुलझी पहेलियों की बात हम आपसे करेंगे.

दुनिया की बड़ी मर्डर मिस्ट्री पर बीबीसी ने डेथ इन आइस वेली नाम का एक पॉडकास्ट किया था जिसमें द इस्डाल वुमेन की मर्डर मिस्ट्री सुलझाने की कोशिश की गई थी. ये घटना साल 1970 की थी.

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नॉर्वे में इस्डालिन वैली के पास एक महिला की जली हुई लाश मिली थी. उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे और अजीब सी चीजें उसके पास पड़ी थीं. बाद में पुलिस को एक जाली पासपोर्ट मिला लेकिन ये महिला कौन थी ये किसी को आज तक पता नहीं चल पाया.

मीडिया ने इसे द इस्डाल वुमेन का नाम दिया. ये क़त्ल था या ख़ुदकुशी, ये भी आज तक पता नहीं चला. 2018 में नॉर्वे के खोजी पत्रकार मैरियट हिगराफ़ और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म मेकर नाइल मैक्कार्थी ने भी इस केस को सुलझाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली.

रिकॉर्ड तोड़ पॉपुलैरिटी

इसी तरह 2017 की ब्लॉकबस्टर पॉडकास्ट सीरीज़ है एस-टाउन. ये सीरीज़ जॉन बी.मैक्लेमोर नाम के घड़ीसाज़ का दिलजस्प प्रोफ़ाइल है जिसका ताल्लुक़ अमरीका के अलाबामा से है.

हालांकि इस सीरीज़ में मुख्य किरदार की बहुत सी निजी बातों को उसकी मर्ज़ी के बग़ैर लोगों तक पहुंचा दिया गया था.जिसके ख़िलाफ़ मैक्लेमोर ने कोर्ट में केस दाख़िल कर दिया था.

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एस-टाउन ने एक कथित क़त्ल की छानबीन की थी और इस पॉडकास्ट की कामयाबी ने साबित कर दिया कि लोगों में जुर्म के क़िस्सों को सुनने की कितनी ललक है. इस पॉडकास्ट की कामयाबी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2017 से अब तक इसे 80 लाख बार डाउनलोड किया जा चुका है.

इसी तरह, इन द डार्क नाम के खोजी पत्रकारिता के पॉडकास्ट के पहले सीज़न में 11 साल के एक बच्चे के अपहरण की कहानी को बताया गया था जो मिनेसोटा में घर के बाहर साइकिल चलाते समय अग़वा कर लिया गया था.

दूसरे सीज़न में मिसिसिपी के कर्टिस फ्लावर्स नाम के एक शख़्स की कहानी बताई गई थी जिसने 1996 में एक फ़र्नीचर शॉप में चार मज़दूरों को मार डाला था. ये वही फ़र्नीचर शॉप थी जहां वो ख़ुद पहले काम कर चुका था.

सच्ची घटनाओं पर आधारित शो

अमरीकी टेलीविज़न में द पीपल वी ओ.जे सिम्पसन नाम का क्राइम शो इतना पसंद किया गया कि वो प्राइम टाइम का सबसे ज़्यादा टीआरपी वाला शो बन गया. नेटफ्लिक्स की मशहूर सीरीज़ मेकिंग अ मर्डरर का ज़िक्र हम कैसे भूल सकते हैं, जिसे क्राइम थ्रिलर का बेमिसाल शाहकार कहा जाता है.

ये एक सच्ची घटना पर आधारित है जिसे फ़िल्म मेकर लॉरा रिकॉर्डी और मोइरा डेमोस ने बनाया था. कहानी में मुख्य किरदार स्टीवन अवेरी है जिसने एक ऐसे गुनाह के लिए 18 साल जेल में गुज़ारे जो उसने किया ही नहीं था.

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उस पर 25 साल की एक फ़ोटोग्राफ़र के क़त्ल का आरोप था. पहले सीज़न में अवेरी पर जुर्म साबित होने और डीएनए सबूतों की बुनियाद पर रिहा होने की कहानी है.

अवेरी के साथ उसके भतीजे ब्रेंडन डेज़ी को भी सज़ा होती है जो कोर्ट में उसकी पैरवी कर रहा था. जबकि दूसरे सीज़न में दोनों के परिवारों के उस दर्द को दिखाया गया है जिससे वो क़ानूनी प्रक्रिया के दौरान गुज़रे.

अमेज़न प्राइम और नेटफ़िल्क्स भी एक वजह

टीवी समीक्षक जैक सील का कहना है कि जब हम सच्ची घटना पर आधारित कोई क्राइम डॉक्यूमेंट्री देखते हैं तो उसकी एक-एक डीटेल हमारे ज़हन में बैठती चली जाती है जो कि दिलचस्पी में इज़ाफ़ा करती है.

इसके अलावा टीवी में दिखाई जाने वाली कहानियों को अक्सर ऐसे मोड़ पर छोड़ा जाता है जहां से कहानी का कोई दूसरा और बहुत दिलचस्प पहलू आने वाला होता है.

कहानी का यही मोड़ दर्शक में दिलचस्पी बनाए रहता है. इसके अलावा नई तकनीक ने भी इस तरह के कार्यक्रमों में लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने में मदद की है.

एमेज़न प्राइम वीडियो और नेटफ़्लिक्स जैसे ऑनलाइन माध्यमों की वजह से अब अगले एपिसोड के लिए हफ़्ते भर इंतज़ार नहीं करना पड़ता. अगर वक़्त हो तो पूरी सीरीज़ एक ही वक़्त में देखी जा सकती है.

मेकिंग ऑफ़ मर्डरर की पहली पॉपुलर पॉडकास्ट सीरीज़ थी दिस अमेरिकन लाइफ़. 2014 में इस सीरीज़ को इतना डाउनलोड किया गया कि इसने सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिए.

इस सीरीज़ में 1999 में बाल्टिमोर की एक छात्रा हे मीन ली के क़त्ल की कहानी को दिखा गया था. ली को उसके ही बॉयफ़्रेंड अदनान सैय्यद ने मौत के घाट उतारा था. इस सीरीज़ के बाद अदनान क़ानूनी शिकंजे में फंसा.

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Image caption बाल्टिमोर की एक छात्रा हे मीन ली के क़त्ल के मामले में दोषी अदनान सैयद

स्कॉटलैंड की एडिनबरा यूनिवर्सिटी में अपराध विज्ञान की प्रोफ़ेसर गेमा फ़लिन का कहना है कि फ़िक्शन सच्ची अपराधिक घटनाओं को सही तरीक़े से पेश करने का एक अच्छा तरीक़ा है. इस तरह के फ़िक्शनल प्रोग्राम एक अलग ही पहलू पेश करते हैं, जिससे इंसाफ़ करने में भी मदद मिलती है.

प्रोफ़ेसर फलिन का कहना है कि क्राइम सीरीज़ का बड़ा फैन क्लब महिलाएं हैं. ये ज़रूरी नहीं कि अपराध का शिकार ज़्यादातर महिलाएं ही हों. लेकिन इस तरह के सीरियल या पॉडकास्ट के ज़रिए वो ख़ुद को मज़बूत करने की कोशिश करती हैं.

वो ये जानने की कोशिश करती हैं कि महिलाओं के साथ कौन-कौन से और किस तरह के क्राइम हो रहे हैं. अपराध किसने किया ये जानने में उनकी शायद उतनी रुचि नहीं होती जितना कि ये जानने में होती है कि आख़िर अपराध हुआ कैसे. और यही सवाल हमारी दिलचस्पी को बनाए रखता है.

तो, जब तक इंसानियत है, तब तक जुर्म होते रहेंगे और इनके क़िस्सों को तरह-तरह से बयां किया जाता रहेगा. कभी उपन्यासों में, तो कभी वेब सिरीज़ में.

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