महिला ख़तना- समझिए इस असहनीय पीड़ा के असर को

  • 6 फरवरी 2019
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Image caption कीनिया के मोम्बासा में इस महिला को 'कटर' नाम से जाना जाता है जो एक ब्लेड दिखा रही हैं. इसका इस्तेमाल कई लड़कियों की योनि पर किया गया है.

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, 20 महिलाओं या लड़कियों में से कम से कम एक शख़्स के साथ किसी न किसी प्रकार के फ़ीमेल जेनिटल म्युटिलेशन (एफ़जीएम) यानी महिला ख़तना हुआ होता है.

दुनिया में इस समय 20 करोड़ ऐसी महिलाएं हैं जिनके गुप्तांग को किसी न किसी प्रकार काटा गया है या हटाया गया है.

महिलाओं में ख़तने (एफ़जीएम) को पूरी तरह रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय दिवस की घोषणा की है जो हर साल छह फ़रवरी को होता है.

महिलाओं और लड़कियों के गुप्तांगों को बचपन में या फिर किशोर अवस्था में ही काट दिया जाता है.

ख़तने के कारण शारीरिक और मानसिक दिक़्क़तें होती हैं जो अक्सर पूरी ज़िंदगी भर चलती है.

कीनिया की इसियोलो काउंटी के बोराना समुदाय से आने वालीं बिशारा शेख हामो कहती हैं, "जब मैं 11 साल की थी तब मेरा ख़तना हुआ था."

"मेरी दादी ने बताया कि यह ख़तना हर लड़की की ज़रूरत है जो उसे पवित्र करता है."

लेकिन बिशारा को यह नहीं बताया गया कि इससे उन्हें अनियमित माहवारी, जीवन भर मूत्राशय की समस्याएं, कई प्रकार के संक्रमण होंगे. इसके अलावा वह केवल ऑपरेशन के ज़रिए ही बच्चे को जन्म दे पाएंगी.

अब बिशारा ख़तने के ख़िलाफ़ जागरुकता अभियान चलाती हैं.

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Image caption यूनिसेफ़ का अनुमान है कि 20 करोड़ महिलाएं और लड़कियां एफ़जीएम से पीड़ित हैं

एफ़जीएम क्या है?

फ़ीमेल जेनिटल म्युटिलेशन या एफ़जीएम यानी ख़तना ऐसी एक प्रक्रिया है जिसमें जानबूझकर महिला के बाहरी गुप्तांग को काट दिया दिया जाता है या उसे हटा दिया जाता है.

इसमें अक्सर महिला गुप्तांग की मुड़ी हुई त्वचा (लेबिया) और क्लाइटोरिस को हटाया या काट दिया जाता है और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया जो बिना मेडिकल कारणों के महिला गुप्तांग को नुकसान पहुंचाती है वह इस श्रेणी में आती है.

एफ़जीएम महिलाओं और लड़कियों को शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से नुक़सान पहुंचाता है और इस प्रथा के कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं हैं.

यह बहुत ही विचलित करने वाला है और महिलाओं के संबंधों को नुकसान पहुंचाता है. यह अक्सर महिलाओं की इच्छा के ख़िलाफ़ होता है या उन पर थोपा जाता है.

मिस्र की फ़िल्म निर्माता और ब्लॉगर ओमनिया इब्राहीम कहती हैं, "आप एक बर्फ़ के टुकड़े की तरह हैं. आप कुछ नहीं महसूस करती हैं, आप प्रेम नहीं करती हैं और आपकी कोई इच्छा नहीं होती है."

ओमनिया अपने पूरे व्यस्क जीवन में ख़तने के मनोवैज्ञानिक प्रभावों से जूझती आईं.

वह कहती हैं, "मैं अपनी यौन इच्छा की सोच से जूझती रही हूं, मुझे यह कैसे पता चलेगी? मैं हमेशा ख़ुद से पूछती थी, क्या मैं सेक्स से नफ़रत करती हूं क्योंकि मुझे इससे डरना सिखाया गया था या क्या मुझे वास्तव में इसकी कोई परवाह नहीं है?"

Image caption बिशारा एफ़जीएम विरोधी कार्यकर्ता हैं

कीनिया में बिशारा का चार अन्य लड़कियों के साथ किस तरह ख़तना किया गया इसके बारे में वह बीबीसी को बताती हैं, "मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी गई थी. इसके बाद उन्होंने मेरे हाथ पीछे की ओर बांध दिए. मेरी टांगें खोल दी गईं और इसके बाद उन्होंने मेरे जननांग की बाहरी परत को नीचे की ओर खींच दिया."

"कुछ मिनटों बाद मैंने तेज़ दर्द महसूस किया. मैं चीखी-चिल्लाई लेकिन किसी ने मुझे नहीं सुना. मैंने ख़ुद को छुड़ाने के लिए लात मारी लेकिन मेरी टांगें मज़बूती से पकड़ी गई थीं."

वह कहती हैं कि यह बहुत 'दर्दनाक' थी. उन्होंने इसी तरह से सभी लड़कियों के साथ ऐसा किया.

वह कहती हैं कि दर्द रोकने के लिए केवल कुछ पारंपरिक देसी दवाएं थीं.

"ज़मीन पर एक गड्ढा था जिसमें एक प्रकार की जड़ी-बूटी होती थी. उन्होंने बकरियों की तरह मेरे पैर बांधे और वह जड़ी-बूटी रगड़ दी. इसके बाद उन्होंने कहा, अगली लड़की फिर वह एक के बाद अन्य लड़कियों के साथ यह करते गए."

एफ़जीएम कई देशों में ग़ैर-क़ानूनी है. हालांकि, अफ़्रीका, एशिया और मध्य पूर्व के कई हिस्सों में यह प्रथा जारी है और साथ ही उन देशों में भी जहां एफ़जीएम अपनाने वाले देशों के लोग रहते हैं."

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अगर कोई आपके शरीर का एक हिस्सा जबरन काट दे तो?

ख़तने के प्रकार

पहला: क्लिटोरिडेक्टमी. इस प्रकिया में क्लाइटोरिस और उसके आस-पास की त्वचा को पूरी तरह या आंशिक तौर पर हटा दिया जाता है.

दूसरा: काटना. इसमें क्लाइटोरिया के साथ-साथ लेबिया या योनि के इर्द-गिर्द मौजूद त्वचा को पूरी तरह हटा दिया जाता है या उसे काट दिया जाता है.

तीसरा: इन्फ़िब्युलेशन. योनि के इर्द-गिर्द मौजूद बाहरी त्वचा यानि लेबिया माइनोर और लेबिया मेजोरा को काट दिया जाता है या उसको बिगाड़ दिया जाता है. कभी-कभी इसमें थोड़ी सी जगह छोड़कर टांके तक लगा दिए जाते हैं.

यह प्रक्रिया न केवल बेहद दर्दनाक और दहला देने वाली होती है बल्कि इससे संक्रमण होने का ख़तरा भी रहता है. योनि और मूत्रमार्ग को छोटा कर देने से माहवारी और पेशाब में भी खासी दिक़्क़तें होती हैं.

वास्तव में यह इतना छोटा हो जाता है जिसके बाद सेक्स या बच्चे के जन्म के लिए इसे काटकर खोलना पड़ता है. यह महिला और शिशु दोनों के लिए नुकसानदायक होता है

चौथा: इसमें क्लाइटोरिस या गुप्तांग के हिस्से को किसी भी तरीक़े से कांटा-छांटा या फिर सिल दिया जाता है.

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Image caption कीनिया की कुछ मासाई महिलाएं एफ़जीएम पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ हैं उनका कहना है कि ख़तना न होने से लड़कियों की शादी नहीं हो पाएगी या उनमें कोई गड़बड़ होगी.

महिलाओं पर एफ़जीएम थोपे जाने के कई कारण हैं. इनमें सामाजिक, धार्मिक, सफ़ाई, कौमार्य बनाए रखना, महिलाओं को 'शादी के लायक़ बनाना' और पुरुषों के यौन सुख में वृद्धि जैसी ग़लतफ़हमियां शामिल हैं.

कई समुदायों में एफ़जीएम को व्यस्क होने के एक संस्कार और शादी से पहले की एक ज़रूरी चीज़ समझा जाता है.

हालांकि, एफ़जीएम से होने वाले स्वास्थ्य के फ़ायदे या सफ़ाई के कोई सबूत नहीं मिलते हैं.

यह प्रथा महिलाओं की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अपनाई जाती है और दुनिया भर के स्वास्थ्यकर्मियों का मानना है कि यह महिलाओं के ख़िलाफ़ एक प्रकार की हिंसा है और उनके मानवाधिकारों का हनन है, जिन बच्चों पर यह अपनाई जाती है उसे बाल शोषण के रूप में देखा जाता है.

एफ़जीएम कहां-कहां होता है?

ऐसा अनुमान है कि एफ़जीएम प्रथा वर्तमान में अफ़्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के कई इलाक़ों में जारी है, साथ ही यूरोप, उत्तरी और दक्षिणी अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में प्रवासी समुदाय भी यह प्रथा अपनाते हैं.

यूनिसेफ़ की रिपोर्ट के अनुसार, अफ़्रीका और मध्य पूर्व के 29 देशों में यह प्रथा अपनाई जाती है. हालांकि, इनमें से 24 देशों में एफ़जीएम के ख़िलाफ़ क़ानून भी हैं.

ब्रिटेन जैसे देशों में एफ़जीएम ग़ैर-क़ानूनी है लेकिन यह बच्चों और शिशुओं में तेज़ी से अपनाई जा रही है.

एफ़जीएम विशेषज्ञ और बैरिस्टर डॉक्टर शार्लेट प्राउडमैन कहती हैं कि इसका पता लगाना पूरी तरह से असंभव है क्योंकि जिस उम्र में यह होता है उस समय लड़कियां स्कूल में नहीं पढ़ रही होती हैं या वह इसके बारे में बताने में बहुत छोटी होती हैं.

यूगांडा मूल की एक महिला को हाल ही में ब्रिटेन में एफ़जीएम का दोषी पाया गया है. वह ब्रिटेन में इस मामले में दोषी पाई जाने वाली पहली शख़्स हैं.

37 वर्षीय ये महिला लंदन में रहती हैं और उन्होंने अपनी तीन वर्षीय बच्ची का ख़तना किया था. आठ मार्च को उनको सज़ा दी जाएगी.

जहां पर एफ़जीएम प्रथा अपनाई जाती है वहां इस विषय पर बात करने को वर्जित माना जाता है. वहीं, दूसरी ओर जहां यह क़ानूनन अपराध है वहां परिवार या समुदाय के सदस्यों को सज़ा होने के डर के कारण भी यह मामले बाहर नहीं आते हैं.

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