गांधी को प्रेरणा देने वाले जॉन रस्किन कौन थे?

  • 21 फरवरी 2019
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे कि उनकी ज़िंदगी पर कई लोगों ने गहरा असर डाला. इनमें से एक थे, ब्रिटिश विद्वान जॉन रस्किन. रस्किन की किताब-अनटू दिस लास्ट के बारे में गांधी जी ने कहा था कि इसने मेरी ज़िंदगी को बदल कर रख दिया.

इस साल जॉन रस्किन की दो सौवीं सालगिरह है. वो 8 फ़रवरी 1819 को लंदन में पैदा हुए थे. माना जाता है कि जॉन रस्किन न केवल अपने वक़्त के, बल्कि आने वाली एक सदी पर गहरा असर डालने वाले इंसान थे. उन्हें आधुनिक इतिहास का सबसे असरदार व्यक्ति माना जाता है.

उन्होंने ब्रिटिश लेखिका शार्लोट ब्रोंटे से लेकर रूसी विद्वान लेव टॉल्सटॉय और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक की ज़िंदगी पर गहरा असर डाला था. उनसे प्रेरणा लेकर ही ब्रिटेन में सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए नेशनल ट्रस्ट की स्थापना हुई थी.

जॉन रस्किन एक कलाकार थे. एक आलोचक थे और समाज सुधारक भी थे. वो ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के दौर के बेहद प्रभावशाली लोगों में से एक थे. उनका जन्म उसी साल हुआ था जब महारानी विक्टोरिया का हुआ था.

जॉन रस्किन को विरोधाभासों वाला इंसान कहें तो ग़लत नहीं होगा. वो कहा करते थे कि हमेशा धारा के विपरीत तैरना चाहिए. रस्किन ख़ुद को रुढ़िवादी और सामंतवादी कहते थे.

लेकिन, उनके बहुत से विचार समाजवादी थे. वो समाज में ऊंच-नीच के दर्जे में बहुत यक़ीन रखते थे. पर, रस्किन ये भी मानते थे कि रईसों की ये ज़िम्मेदारी है कि वो ग़रीबों का ध्यान रखें. वो अमीर ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे. मगर, रस्किन ने अपनी बहुत सी संपत्ति दान कर दी थी.

अपनी आत्मकथा में जॉन रस्किन ने लिखा है कि, 'शायद एक छोटे से घर में रहना ज़्यादा ख़ुशी देता है. ऐसा कर के हम किसी महल को चौंका सकते हैं. पर, यदि हम किसी महल में रहते हैं, तो इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं.'

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जॉन के माता-पिता की चाहत

जॉन रस्किन के पिता धनी कारोबारी थे. वहीं उनकी मां एक शराबख़ाने वाले ज़मींदार की बेटी थीं. वो अपने बेटे के बारे में बहुत शिकायती रहती थीं. जब 1836 में रस्किन पढ़ने के लिए ऑक्सफ़ोर्ड गए, तो उनकी मां ने कहा कि वो भी साथ जाएंगी और रोज़ उनके साथ चाय पिएंगी.

रस्किन ने लिखा है कि उनके पिता ने उनके भविष्य का पूरा ताना-बाना बुन रखा था. रस्किन के पिता चाहते थे कि वो देश के मशहूर संस्थान से दो फ़र्स्ट क्लास डिग्रियां हासिल करें.

पढ़ाई के दौरान हर पुरस्कार वही जीतें. किसी मशहूर युवती से ब्याह करें. लॉर्ड बायरन जैसी कविताएं लिखें, जो केवल पवित्रता से भरी हों. फिर वो लोगों को धर्म की दीक्षा दें. हमेशा प्रोटेस्टेंट ईसाई रहें. 40 बरस की उम्र में पादरी बन जाएं. पचास साल की उम्र में पूरे ब्रिटेन के धर्म गुरू बन जाएं.

यूं तो जॉन रस्किन ने कभी भी धर्म की दीक्षा नहीं ली. लेकिन, उन्होंने शास्त्रों और गणित में अव्वल दर्जे की डिग्री हासिल की. इसके अलावा जॉन रस्किन ने अपनी ज़िंदगी में पिता की उम्मीदों से कहीं ज़्यादा उपलब्धियां हासिल कीं.

लंदन में हाल ही में मशहूर नुमाइशघर टू टेंपल प्लेस में रस्किन से जुड़ी चीज़ों की प्रदर्शनी लगी थी. बाद में ये प्रदर्शनी शेफ़ील्ड शहर में भी लगी. इसमें उनकी बनाई हुई कलाकृतियां और ख़ुद का पोर्ट्रेट भी शामिल हैं.

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वो कौन सी बातें हैं जो जॉन को दूसरों से अलग करती हैं

यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने के साथ ही जॉन रस्किन ने कला की अच्छी समझ हासिल कर ली थी. उन्होंने जेएमडब्ल्यू टर्नर की पेंटिंग्स को मशहूर किया. उस वक़्त के सारे आलोचक टर्नर की पेंटिंग्स को घटिया बताते थे. लेकिन, रस्किन ने टर्नर की इतनी तारीफ़ की कि वो आज तक मशहूर हैं.

हालांकि आलोचकों ने रस्किन की तारीफ़ को उस वक़्त ख़ारिज कर दिया था. लेकिन, जनता ने उन्हें हाथों-हाथ लिया. नए कलाकारों के बारे में उनकी पांच किताबों की सिरीज़ मॉडर्न पेंटर 1843 में लिखी गई थी. उनकी लेखनी की तारीफ़ करने वालों में शार्लोट ब्रोंटे, विलियम वर्ड्सवर्थ और अल्फ्रेड, लॉर्ड टेनिसन भी शामिल थे.

अपनी तमाम किताबों के ज़रिए जॉन रस्किन ने अपने दौर की पीढ़ी ही नहीं, आने वाली कई नस्लों पर गहरा असर डाला. उन्होंने ऐसे कई कलाकारों को शोहरत दिलाई, जिन्हें इंग्लैंड के लोग नहीं जानते थे.

ये रस्किन ही थे, जिन्होंने वेनिस के कलाकार टिंटोरेटो की तारीफ़ कर के दुनिया की इटैलियन कला में दिलचस्पी दोबारा जगाई. रस्किन ने वेनिस शहर की इमारतों और कला की कई ड्रॉइंग बनाई, ताकि वो वक़्त के थपेड़ों से ख़त्म न हो जाएं.

जॉन रस्किन केवल बुद्धिमान आलोचक भर नहीं थे. वो ख़ुद भी अच्छे कलाकार थे. वो अच्छी पेंटिंग्स बनाने के लिए अंदर से प्रेरणा महसूस करते थे. करौंदे की झाड़ी, पहाड़ों, घटाओं, परिंदों और खनिजों की पेंटिंग बनाने में रस्किन को महारत हासिल थी. वो लंदन के चिड़ियाघर में जाकर वहां के जानवरों की पेंटिंग बनाया करते थे. रस्किन का मानना था कि कला को क़ुदरत का आईना होना चाहिए.

जॉन रस्किन चाहते थे कि उनका हुनर अगली पीढ़ी को जाना चाहिए. वो मानते थे कि उनके पास जो क़ाबिलियत है, उसके मालिक सिर्फ़ वो नहीं, बल्कि उस पर दूसरों का भी हक़ है.

यही बात उन्हें बाक़ी लोगों से अलग खड़ा कर देती थी. वो लंदन में कामगारों के वर्किंग मेन कॉलेज में भी उसी रौ में पढ़ाते थे, जिस अल्हड़पन के साथ वो ऑक्सफोर्ड में लेक्चर दिया करते थे. रस्किन के लेक्चर सुनने के लिए सैकड़ों की तादाद में लोग जुटा करते थे. वो अजीबो-ग़रीब पोशाकें पहनकर पढ़ाने जाया करते थे.

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महिलाओं के बारे में रस्किन की कल्पना हक़ीक़त से अलग थी

इतनी असाधारण प्रतिभा के धनी होने के बावजूद, आज जॉन रस्किन को लोग उनकी नाकाम शादी की वजह से ही याद रखते हैं. रस्किन ने 1848 में पर्थ की रहने वाली एफी ग्रे से शादी की थी.

लेकिन, शुरू से ही दोनों के बीच नहीं पटी. फिर, वो अपनी बीवी और मां के बीच भी तालमेल नहीं बिठा सके. छह साल की कड़वाहट के बाद एफी ग्रे ने शादी को ख़त्म कर दिया. ग्रे का कहना था कि वो ये शादी तोड़ रही हैं क्योंकि रस्किन ने उनसे संबंध नहीं बनाए.

1967 में ब्रिटिश लेखिका मैरी लुटिएंस ने इस बारे में एक नई कहानी बताई. लुटिएंस का कहना था कि जॉन रस्किन इस बात पर हैरान थे कि महिलाओं के यौन अंग के पास बाल भी होते हैं. हालाकि ये सच है कि रस्किन की बीवी एफी ग्रे ने कहा था कि, 'महिलाओं के बारे में रस्किन की कल्पना हक़ीक़त से काफ़ी अलग थी. वो मुझसे नफ़रत करते थे.' लेकिन, ये साफ़ नहीं है कि रस्किन के बारे में मैरी लुटिएंस के गढ़े क़िस्से में कितनी सच्चाई है.

गिल्ड ऑफ़ सेंट जॉर्ज के प्रमुख क्लाइव विल्मर कहते हैं कि, 'बेचारे जॉन रस्किन की शादी बहुत ख़राब रही थी. लेकिन किसी शादी के नाकाम रहने के लिए सिर्फ़ मियां या बीवी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसके लिए दोनों बराबर के ज़िम्मेदार होते हैं. रस्किन की अपनी बुराइयां थीं. वो बड़े सिद्धांतवादी थे. अहंकारी थे. लेकिन, रस्किन के पास अथाह ज्ञान भी था.'

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ज़माने से आगे की सोच रखते थे जॉन

गिल्ड ऑफ़ सेंट जॉर्ज की स्थापना जॉन रस्किन ने ही की थी. वो आज तक क़ायम है. ये रस्किन की महान उपलब्धियों में से एक है.

जॉन रस्किन विक्टोरिया युग में हो रहे ब्रिटेन के औद्योगीकरण के ख़िलाफ़ थे. वो मशीनों पर बढ़ती निर्भरता का विरोध करते थे.

गिल्ड के जनसंपर्क अधिकारी, साइमन सेलिग्मैन कहते हैं कि, 'रस्किन के ख़याल दूसरी ही दुनिया के थे. हक़ीक़त से परे थे. गिल्ड ऑफ़ सेंट जॉर्ज के ज़रिए रस्किन ने पूरे इंग्लैंड में ऐसे समुदाय बनाए, जहां लोग क़ुदरत से राब्ता बनाने की कोशिश करते थे. वो अपने खाने-पीने की चीज़ें ख़ुद उगाते थे. मशीनों के बजाय हाथ से काम करते थे.'

आज 21वीं सदी में भी तो यही सिखाया जाता है, क़ुदरत के जितना क़रीब रह सकें, इंसान के लिए उतना बेहतर होगा.

इस में कोई दो राय नहीं कि जॉन रस्किन अपने ज़माने से बहुत आगे की सोच रखते थे. मशहूर रूसी लेखक लेव टॉल्सटॉय ने उनके बारे में कहा था कि, 'रस्किन न केवल वो सोचते और कहते थे, जो उन्होंने देखा और महसूस किया, बल्कि वो बातें भी कहते और सोचते थे, जो आने वाली पीढ़ी देखेगी और महसूस करेगी.'

रस्किन ने शायद सबसे पहले ये महसूस किया कि तरक़्क़ी इंसान और पर्यावरण की भलाई की क़ीमत पर आती है. रस्किन ने पुराने हुनर को दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश की. वो कामगारों को शहर से बाहर निकलने, क़ुदरत से संवाद करने की सीख देते थे. रस्किन ने शेफ़ील्ड शहर के बाहरी इलाक़े में एक म्यूज़ियम स्थापित किया था.

शेफ़ील्ड के म्यूज़ियम में रस्किन से जुड़ी चीज़ों की देखभाल करने वाले लुइस पुलेन कहते हैं कि, रस्किन की चीज़ों और उनकी लिखावट को देखकर बस दो ही बातें ज़हन में आती हैं. गहरी सोच और बेहतरी.

वो चाहते थे कि तरक़्क़ी की रेस में भाग रहे लोग थोड़ा सुस्ताएं. आस-पास की चीज़ों पर नज़र डालें. संभव हो तो उन्हें उकेरें. टहलने निकल जाएं. ख़ुद को दोबारा ख़ुश करें. पुलेन कहते हैं कि, 'ये विचार रस्किन के काम तो नहीं आए, पर, उनसे बहुत से लोगों को प्रेरणा मिली.'

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अवसाद के दौरे

रस्किन को अवसाद के दौरे पड़ा करते थे. कहा जाता है कि वो बाईपोलर डिसऑर्डर के मरीज़ थे. जब हम उनकी बीमारियों के बारे में जानते हैं, तो रस्किन की उपलब्धियां और भी महान लगने लगती हैं. आख़िर बार-बार की दिमाग़ी बीमारियों के बावजूद उन्होंने इंसानियत को इतना कुछ जो दिया.

हालांकि रस्किन के कुछ विचारों की आलोचना भी हुई. जिस तरह वो मशीनों को सिरे से ख़ारिज करते और औद्योगीकरण से नफ़रत करते थे. उन्होंने ठान लिया था कि रेलवे तबाही का सबब है. वो तो साइकिलों को भी नापसंद करते थे. यानी, रस्किन को अक्सर अपने दौर की चीज़ों से परेशानी रहती थी.

लेकिन, विचारधारा से समझौता न करने की रस्किन की ज़िद ही उन्हें इतना प्रभावशाली बनाती है. जब उन्होंने अपने लेख अनटू दिस लास्ट में कामगारों के शोषण का तगड़ा विरोध किया, तो इससे कई लोगों को बुरा लगा था. लेकिन, उनके लेख से बहुत लोगों को प्रेरणा मिली थी.

महात्मा गांधी का कहना था कि रस्किन की किताब अनटू दिस लास्ट पढ़ने के बाद वो रातों-रात बदल गए थे. वो एक शहरी वकील से ग्रामीण बन गए थे. गांधी ने रस्किन की बातों से प्रेरणा लेकर दूसरे पेशों की तरह मज़दूरी को अहमियत दी. महात्मा गांधी ने रस्किन की किताब का गुजराती में अनुवाद भी किया था.

जॉन रस्किन अपने जीवन में इतना कुछ हासिल नहीं कर पाते, अगर उनके पास इतनी संपत्ति नहीं होती. रस्किन को अपने पिता से विरासत में क़रीब सवा लाख पाउंड की संपत्ति मिली थी. उन्होंने इसका एक बड़ा हिस्सा जन कल्याण के लिए दान कर दिया था. वो ढेर सारे मकान ख़रीद कर ग़रीबों को आसरा दिया करते थे. उनके कई प्रोजेक्ट नाकाम भी रहे थे. लेकिन, रस्किन इतने दयालु थे कि जब वो 80 साल की उम्र में सन् 1900 में मरे, तो उनके पास संपत्ति के नाम पर बहुत कुछ नहीं बचा था. उन्होंने ज़्यादातर संपत्ति दान कर दी थी.

आज जॉन रस्किन की दो सौवीं सालगिरह पर उनकी भविष्यवाणियों और दान करने की ख़ूबियों का सम्मान होना चाहिए. जैसा कि रस्किन की स्थापित की हुई गिल्ड के प्रमुख विल्मर कहते हैं, 'वो सबसे असाधारण इंसान थे.'

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