बता सकते हैं कि फूल आख़िर क्या होते हैं?

  • 28 सितंबर 2016
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'फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं...'ये तो सबको पता है कि फूल नाज़ुक होते हैं. मगर आपसे पूछें कि फूल क्या होते हैं? तो, आपका जवाब क्या होगा?

बीबीसी ने ये सवाल जब अपने फ़ेसबुक पेज पर लोगों से किया, तो बड़े दिलचस्प जवाब मिले.

केविन ड्रुकास ने लिखा, 'फूल क़ुदरती विकास की प्रक्रिया का वो पड़ाव हैं जिन्होंने पिछले बीस करोड़ सालों में लंबा सफ़र तय किया है. पेड़ों पर, पहाड़ों पर चढ़ाई की है. खाई में जा छुपे हैं. फफूंद और कीड़ों से जंग लड़ी है. असल में फूलों ने धरती के हर कोने पर अपना राज क़ायम किया है."

वहीं क्रिस्टी हार्डेज लॉनियस ने लिखा कि, 'फूल किसी पौधे का वैसा ही हिस्सा हैं, जैसे कि किसी इंसान के लिए आंखें. ख़ूबसूरत, कोमल, कुछ बोलती हुई सी.'

वहीं वैलेरी वेकफील्ड लिखती हैं, 'फूल जादू हैं, ख़ूबसूरत हैं, ढेर सारे हैं.'

कुछ ने तो ये भी लिखा कि फूलों को किसी परिभाषा के दायरे में बांधना मुमकिन नहीं. जैसे कि नाओमी सुनसिक ने लिखा, 'खिलते फूलों को देखकर मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं अपनी आत्मा की गिरह खोल रही हूं. अब इसे मैं कैसे बयां करूं?'

फूल आज हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं. शादी की सालगिरह हो या जन्मदिन का समारोह, तरक़्क़ी की पार्टी हो या किसी के गुज़र जाने के बाद अंतिम संस्कार का वक़्त, हर सभ्यता, हर समाज में फूलों की ज़रूरत है. उनका भरपूर इस्तेमाल होता है.

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इतने बड़े पैमाने पर हमारी ज़िंदगी में दख़ल रखने के बावजूद हम ये बता पाने में नाकाम हैं कि फूल आख़िर होते क्या हैं?

आम इंसान तो क्या, सदियों से वैज्ञानिक भी फूलों की व्याख्या नहीं कर पाए हैं. फूलों की क्या परिभाषा हो, इस पर वैज्ञानिकों में अभी भी चर्चा चल रही है.

पेरिस के म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के प्रोफ़ेसर मार्क आंद्रे सेलो कहते हैं कि फूल किसी पौधे के दिखाई पड़ने वाले यौन अंग हैं. जिनके ज़रिए वो अपनी आने वाली नस्लों को पैदा करते हैं.

किसी फूल के तीन हिस्से होते हैं. एक नर प्रजनन अंग, जिसे पुंकेसर या स्टामेन कहते हैं. फिर मादा प्रजनन अंग, जिसे कार्पेल कहते हैं. और इनकी सुरक्षा के लिए जो घेरा होता है उन्हें हम पंखुड़ी कहते हैं.

धरती के हर पौधे के फूल नहीं होते. फूलों वाले पौधों की कुल क़रीब साढ़े तीन लाख नस्लें फ़िलहाल इंसान जानता है. इनके फूल हर रूप रंग में मिलते हैं.

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सबसे पहले स्वीडिश वैज्ञानिक कार्ल लीनियस ने फूलों को परिभाषा के दायरे में बांधने की कोशिश की थी. तभी उन्होंने पौधों को एंजियोस्पर्म नाम के खांचे में बांटकर रखा. ये वो पौधे थे, जिनके फूल होते हैं.

आज दुनिया के कई वैज्ञानिक मिलकर फूलों के बारे में लंबा चौड़ा रिसर्च करने में जुटे हैं. इनका मक़सद ये पता लगाना है कि आख़िर फूल वाले पौधों में आपसी रिश्ता क्या है. फूलों वाले पौधों के अलग-अलग वंश कौन से हैं?

ख़ैर, ये सब तो वैज्ञानिकों की बाते हैं. क़ुदरत में तो फूलों का विकास आज से क़रीब बीस करोड़ साल पहले हुआ माना जाता है. उससे पहले फूल वाले पौधे नहीं होते थे. अनानास जैसे फल वाले पौधे होते थे. जिनमें नर और मादा कोन अलग-अलग होते हैं.

क़रीब बीस करोड़ साल पहले धरती पर पहला फूल उगा होगा. उसके बाद तो आज तमाम पौधों के फूलों के इतने रंग रूप मिलते हैं, जितनी इंसान कल्पना भी नहीं करता. इनका मक़सद किसी पौधे की अगली पीढ़ी को पैदा करना होता है.

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इसके लिए इन्हें ज़रूरत बाहरी दखल की होती है. जैसे कीड़े-मकोड़ों, तितलियों या फिर चमगादड़ों की. जो फूलों का रस पीने की चाहत में फूलों के पास आते हैं. और इनके ज़रिए परागण होता है. यानी नर और मादा कणों का मेल होता है. बाद में जिनके विकास से फूल से फल और फल से बीज निकलते हैं.

कीड़ों, मधुमक्खियों और तितलियों को लुभाने के लिए फूलों में तरह-तरह की ख़ूबियां देखने को मिलती हैं. किसी में ख़ुशबू होती है तो किसी का रंग चटख होता है.

वॉरने मैक्डोनाल्ड नाम के शख़्स ने फूलों के बारे में बड़ी दिलचस्प बात लिखी. वारेन ने लिखा कि, 'फूल पौधों की दुनिया के शॉर्ट स्कर्ट होते हैं. जो देखने में दिलकश लगते हैं. दिल को लुभाते हैं.'

अब किसी फूल में अगर परिंदों को, तितलियों को या फिर मधुमक्खियों को लुभाने वाली ख़ूबी नहीं होगी तो फिर उनका परागण नहीं होगा. और फूलों का जो मक़सद है वो पूरा नहीं होगा. इसीलिए क़ुदरतन, फूलों में ऐसी ख़ूबियां सदियों से पैदा होती आई हैं जिससे ये जीव उनकी तरफ़ खिंचें चले आएं. इन्हें भी कुछ मिले और फूलों का भी काम हो जाए, परागण का.

जैसे कि मधुमक्खियां सिर्फ़ नीला और हरा रंग देख सकती हैं. तो मधुमक्खियों से जिन फूलों का परागण होता है वो इसी रंग के होते हैं. या फिर पराबैंगनी क्योंकि मधुमक्खियां पराबैंगनी रंग देख सकती हैं.

इसी तरह जिन फूलों का परागण चमगादड़ से होता है, वो रात में खिलते हैं और उनकी ख़ुशबू बड़ी ज़ोरदार होती है क्योंकि चमगादड़ को रात में दिखता नहीं, तो वो फूलों की ख़ुशबू के ज़रिए उन तक पहुंचते हैं.

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तरह-तरह के रूप रंग वाले ये फूल बुनियादी तौर पर केवल तीन जीन से बनते हैं इनके नाम ए बी और सी रखे गए हैं.

जानवरों को लुभाने वाले इन फूलों के बग़ैर आज इंसान अपनी ज़िंदगी का तसव्वुर भी नहीं कर सकता. फिलोमिना चार्ट लिखती हैं, 'बिना फूलों की दुनिया बदसूरत, दुखी और अंधेरी होगी.'

फूल क़ुदरत और बिंदास तबीयत का प्रतीक माने जाते हैं. आज हम शहरी ज़िंदगी के चलते क़ुदरत से दूर होते जा रहे हैं. फूल प्रकृति से हमारी उस दूरी को कम करते हैं.

यूरोप में अठारहवीं सदी से फूलों का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा बढ़ा. जैसे जैसे शहरों में आबादी बढ़ती गई. वैसे-वैसे हर मौक़े को ख़ूबसूरत बनाने के लिए फूलों की ज़रूरत बढ़ती गई. मगर यूरोप से पहले एशिया की तमाम सभ्यताओं में फूलों ने पहले ही अहम जगह बना ली थी.

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फूलों में इंसान ने दिलचस्पी ली तो बहुतों के रूप-रंग भी बदल गए.

भूमध्यसागर में पायी जाने वाली जंगली सरसों के फूल को ही लीजिए. आज इसके इतने रूप मिलते हैं कि असल रूप से कोई रिश्ता ही नहीं मालूम होता.

इसी जंगली सरसों के फूल के रूप हम गोभी, पत्तागोभी और ब्रॉक्कली के तौर पर देखते हैं. ये सभी ब्रैसीकेसी परिवार के सदस्य हैं.

इसी तरह गुलाब के इतने रंग-रूप इंसान ने विकसित कर लिए हैं कि गिनना मुश्किल है. चटख रंगों वाले, ज़्यादा पंखुड़ियों वाले ...और न जाने कितनी तरह के गुलाब आज मिलते हैं.

फूल आज हमें प्रकृति के क़रीब होने का एहसास दिलाते हैं. सभ्यता के बदलते चाल-चलन में इनकी अहमियत और ज़रूरत और बढ़ती जा रही है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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