ग्लोबल वॉर्मिंग का असर समंदर की आवाज़ पर देखा जा रहा है

  • क्लेअर अशर
  • बीबीसी अर्थ
पिघलता हुआ बर्फ़

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दुनिया की आबो-हवा बदल रही है. समंदर का दायरा बढ़ रहा है. इस तरह के जुमले आपको अक्सर सुनने को मिलते हैं. मगर आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि ग्लोबल वॉर्मिंग से समंदर की आवाज़ भी बदल रही है.

अमरीका में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम ने साल 2015 में एक रिपोर्ट तैयार की. इसके मुताबिक़, समंदर से पानी की जो आवाज़ आती है, वो पहले वाली आवाज़ से जुदा है.

आज जो आवाज़ हम सुनते हैं, वो समंदर में लाखों बुलबुलों से निकलती है. ये बुलबुले बड़े-बड़े ग्लेशियर पिघलने से बन रहे हैं. और आवाज़ बदलने की वजह है इंसानी ज़िंदगी का बदलता मिजाज़.

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बढ़ती आबादी की ख़पत के लिए तेज़ी से जंगल काटे जा रहे हैं. यहां रहने वाले जानवरों के घर छिन रहे है. इसलिए बहुत से जानवरों की प्रजातियां खत्म भी हो गई हैं. ट्रैफ़िक और मशीनों का शोर पूरे माहौल में नई तरह की आवाज़ को पनाह दे रहा है. इसके चलते क़ुदरती आवाज़ें कहीं दबती जा रही हैं.

आज समुंदर की आवाज़ वैसी सुनाई नहीं देती, जैसी सदियों पहले थी, जब आबादी बहुत ज़्यादा नहीं थी. आज चिड़ियों की चहचहाहट, शोर में कहीं गुम हो जाती है. वैज्ञानिक इस बदलाव को अच्छा नहीं मानते.

समुद्र के अंदर जीवों की एक दुनिया आबाद है. अगर कहा जाए कि इंसानी वजूद को बनाए रखने के लिए इनका होना बेहद ज़रूरी है तो ग़लत नहीं होगा. लेकिन हालात बदल रहे हैं और वैज्ञानिक इस बदलाव पर गहराई से रिसर्च कर रहे हैं.

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समुद्र के अंदर अलग तरह की दुनिया आबाद है. यहां हज़ारों तरह के पौधे हैं. चट्टानें हैं और जानवरों की हज़ारों नस्लें आबाद हैं. समुद्र के अंदर मैंग्रूव, मूंगे की चट्टानें भी होती हैं. समुद्र के पानी में सैकड़ों तरह के झींगे और केकड़े होते हैं. ये झींगे पानी के साथ-साथ कई मील तक चले जाते हैं.

ये ख़ास तरह की आवाज़ें निकालते हैं, जो समुद्र के माहौल की खासियत हैं. 2016 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ समुद्र में झींगुरों की आवाज़ कमज़ोर पड़ती जा रही है.

जीव वैज्ञानिकों का कहना है समुद्र के पानी के भीतर एक ख़ास गहराई पर जाने के बाद क़ुदरती तौर पर कार्बन डाई ऑक्साइड निकलती है. जब यह पानी के साथ मिलती है तो एक ख़ास तरह का केमिकल बनता है. इसे 'ओशन एसिडीफिकेशन' कहते हैं.

धरती की आबो-हवा में बढ़ती कार्बन डाई ऑक्साइड की वजह से ये एसिडीफिकेशन तेज़ी से पूरे समुद्र में फैलता जा रहा है. इसका समंदर में रहने वाले जीव-जंतुओं पर बुरा असर पड़ रहा है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि समंदर के पानी की बनावट में आ रहे बदलाव का बुरा असर दिखने लगा है. इसी वजह से झींगुरों का शोर कमज़ोर पड़ता जा रहा है. समुद्र में बहुत से जानवर यहां पैदा होने वाली आवाज़ों के ज़रिए ही एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं.

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वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इसी तरह धरती की आबो-हवा बदलती रही, तो वो दिन दूर नहीं जब समुद्र में बहुत से जानवरों की आवाज़ें हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाएंगी.

क़ुदरत में हमें दो तरह की आवाज़ें सुनने को मिलती हैं. पहली वह जो चट्टानों के खिसकने, नदियों के बहने, झरनों के गिरने, ज़लज़ले, हवा के बहने और लहरों से पैदा होती है. दूसरी आवाज़ें वो, जो जानवर निकालते हैं.

लेकिन अब इन सब पर तीसरे तरह का शोर हावी होता जा रहा है. ये शोर धरती पर इंसान की वजह से पैदा हो रहा है. अपनी ज़रूरतों के लिए इंसान धरती पर तमाम तरह से शोर पैदा कर रहा है.

फ्रीबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल शरर लॉरेंज़ेन ने 2015 में जर्मनी के ग्रामीण इलाक़ों में 300 माइक्रोफोन लगाए. इन माइक्रोफोन के ज़रिए उन जगहों पर रहने वाले सभी तरह के जानवरों की आवाज़ें रिकॉर्ड की जा रही हैं. इसमें चिड़िया, मेंढक और दूसरे छोटे-मोटे जीव शामिल हैं.

प्रोफ़ेसर माइकल को उम्मीद है कि इंसान की गतिविधियों की वजह से क़ुदरती आवाज़ में आ रहे बदलाव को वे इसके ज़रिए अच्छे से समझ सकेंगे. प्रोफ़ेसर माइकल को उम्मीद है कि वो इन आवाज़ों के ज़रिए ही दूसरे जीवों पर ग्लोबल वॉर्मिंग के असर की चेतावनी जारी कर सकेंगे.

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वैसे भी दुनिया में कई जगह यह बात पाई गई है कि इंसानी गतिविधियों, जैसे खनन और फैक्ट्रियों की वजह से क़ुदरत में आने वाली आवाज़ पर बहुत फ़र्क़ पड़ा है. पर्यावरण में इंसान ने इतना ज़्यादा शोर बढ़ा दिया है, जिससे दूसरे जीवों को परेशानी होती है.

इंसान के मुक़ाबले जानवरों के सुनने की ताक़त ज़्यादा होती है. इसलिए जब माहौल में शोर होता है, तो वो उनसे बर्दाश्त नहीं होता.

जून 2016 में छपे एक और अध्ययन के मुताबिक़, पिछले कुछ सालों में परिंदों ने भी एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े में जाने का समय बदल दिया है. इसी तरह फूलों के खिलने का समय भी बदलने लगा है. ग्लोबल वॉर्मिंग के ये असर वाक़ई डराने वाले हैं.

अमरीका के संगीतकार बर्नी क्रॉस ने आवाज़ की दुनिया में बहुत काम किया है. वे कहते हैं कि उन्होंने अपने 50 साल के करियर में 25 देशों में जाकर बहुत तरह की आवाज़ का जायज़ा लिया. लेकिन सभी जगह उन्होंने पाया कि हर साल ये आवाज़ें बदल रही हैं.

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बर्नी ने उत्तरी अमरीका के जंगलों से लेकर अलास्का, टुंडरा, ब्राज़ील और फिजी में मूंगे की चट्टानों तक तजुर्बा किया है. पिछले पचास सालों में धरती की आवाज़ बहुत हद तक बदल गई है.

ध्वनि प्रदूषण का असर इंसानों पर भी पड़ रहा है. वैज्ञानिकों को डर है कि आने वाले वक़्त में इसके असर से इंसान की सुनने की ताक़त पर बुरा असर पड़ेगा. उसका मिजाज़ चिड़चिड़ा होने लगेगा. नींद न आने की दिक़्क़त बढ़ जाएगी.

वैज्ञानिकों का कहना है कुदरती माहौल के बीच रहने, परिंदों की आवाज़ सुनने, झरनों की आवाज़ सुनने से इंसान के मिजाज़ पर भी अच्छा असर पड़ता है. उसकी सोचने-समझने की सलाहियत बेहतर होती है.

इसमें शक नहीं की इंसान ने तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढ़ते में पर्यावरण को जो नुक़सान पहुंचाया है, वो इतनी आसानी से ठीक होने वाला नहीं. अलबत्ता एक उम्मीद फिर भी बरक़रार है.

साल 2016 में सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़, पानी में रहने वाली बहुत सी प्रजातियों के लिए मैंग्रूव का होना बहुत ज़रूरी है. इसीलिए इन्हें बचाना भी ज़रूरी है. लिहाज़ा इस दिशा में काम करने की ज़रूरत है.

अभी बहुत देर नहीं हुई है. लेकिन अगर पर्यावरण को बचाने के बारे में नहीं सोचा गया, तो बहुत जल्द इंसान ख़ुद अपने ख़ात्मे की वजह बन जाएगा.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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