'आर्किड' फूल से बना यह ख़ास डिश

  • 2 दिसंबर 2016
इमेज कॉपीरइट Tony Phelps/naturepl.com

खाना ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है. हरेक देश, समाज और समुदाय के लोगों का अपना कोई ना कोई खाना होता है. बहुत बार व्यंजन किसी देश, समाज या समुदाय की पहचान से जुड़ जाते हैं. जैसे पिज़्ज़ा, बर्गर, पास्ता इटली के व्यंजन हैं. ये वहां की पहचान हैं.

इसी तरह कश्मीर की एक ख़ास डिश है गोश्ताबा. ये वहां की पहचान है. पंजाब चले जाइए, वहां आपको मक्के की रोटी सरसों का साग और लस्सी मिलेगी. ये पंजाब की पहचान है.

इमेज कॉपीरइट Barbara Gravendeel/Naturalis Biodiversity Center

कुछ व्यंजन बड़े अजीबो ग़रीब होते हैं. लेकिन लोग उन्हें पसंद करते हैं और खाते हैं. ऐसी ही एक डिश है 'चिकांदा'. आपने शायद ही इसका नाम सुना हो, मगर ये अफ्रीका के देश ज़ैम्बिया की बेहद मशहूर डिश है. चलिए आज आपको सुनाते हैं चिकांदा की कहानी.

चिकांदा को ज़ैम्बिया में 'किनाका' या 'किकांदा' के नाम से भी जाना जाता है. इसे बनाने के लिए 'आर्किड' फूल के कंद और ज़मीन से खोद कर निकाली गई एक ख़ास तरह की मूंगफली और मिर्चों के साथ मिलाकर पकाया जाता है.

चलिए आपको पहले आर्किड के बारे में बता दें कि आखिर ये क्या बला है.

'आर्किड' एक ख़ास तरह का दिलकश फूल होता है. लोग इसे बहुत पसंद करते हैं.

इमेज कॉपीरइट Barbara Gravendeel/Naturalis Biodiversity Center

शायरी में इस फूल की दिलकशी का ख़ूब ज़िक्र किया गया है. लेकिन इसकी दिलकशी ज़रा फ़ीकी पड़ जाती है जब ये पता चले कि इस फूल का पौधा पकने के बाद एक मोटे आलू जैसा हो जाता है. इसे खेतों से खोद कर निकाला जाता है और फिर मिर्च मसाला लगाकर, मूंगफली के साथ पकाया जाता है. लेकिन ज़ाम्बिया के लोगों का तो ये नाश्ता है.

एक अंदाज़े के मुताबिक़ हर साल 44 लाख ऑर्किड के कंद तंजानिया, अंगोला, कांगो और मलावी से ज़ैम्बिया भेजे जाते हैं.

चिकांदा की बढ़ती हुई मांग आर्किड के लिए ख़तरा बनती जाती रही है. आर्किड का कंद पाने लिए इसकी ख़ूब पैदावार की जा रही है.

इमेज कॉपीरइट Felicity Lanchester/naturepl.com

कंद की ज़रूरत तो व्यापारियों को होती है, लेकिन ऑर्किड के फूलों की नहीं होती. लिहाज़ा ऐसे तरीक़ों पर ज़ोर दिया जा रहा है जिससे चिकांदा के लिए ऑर्किड कंद की मांग भी पूरी होती रहे और ऑर्किड का शबाब भी बरक़रार रहे.

दरअसल ऑर्किड के कंद में कुछ जड़ें होती हैं, जो फूली रहती हैं. इन जड़ों में भरपूर मात्रा में कार्बोहाईड्रेट होता है जो ऑर्किड को ऊर्जा देने का काम करता है.

ज़मीन के ऊपरी हिस्से पर जो तना होता है वो बड़ी पत्तियों से ढका रहता है. और जब माक़ूल माहौल तैयार होता है तो ऑर्किड का फूल खिल जाता है. आर्किड की जड़े ना सिर्फ़ ख़ुद उसके लिए भोजन मुहैया कराती हैं, बल्कि इंसान का पेट भरने के काम भी आती हैं.

मूल रूप से चिकांदा का इस्तेमाल उत्तर-पश्चिमी ज़ैम्बिया के 'बेम्बा' क़बीले के लोग करते थे. लेकिन उसके बाद तंज़ानिया के फिपा, लुंगू, नदाली, न्यीहा आदि क़बाईली जातियों ने भी इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया.

इमेज कॉपीरइट Friedrich von Hoersten/Alamy

शुरुआत में ये स्थानीय लोगों का ही खाना होता था. लिहाज़ा उसकी खेती भी बहुत छोटे पैमाने पर होती थी. लेकिन अब इसका कारोबार शुरू हो गया है. क़बाइली लोगों ने दूरदराज़ के इलाक़ों में इसकी खेती शुरू कर दी है. वो इस डिश को शहरों में होटल और रेस्टोरेंट के मालिकों को बेचने लगे हैं. जानकारों का कहना है कि आर्किड आज बहुत से लोगों की रोज़ी का बड़ा ज़रिया बन गया है.

जंगलों में जब तक ऑर्किड का पौधा है, तब तक इसके हरेक हिस्से को अलग से पहचानना आसान होता है. लेकिन अगर एक बार इसकी जड़ों को खोद दिया जाता है तो फिर हर हिस्से को पहचानना मुश्किल होता है. बड़े-बड़े सुपर मार्केट में इसकी बार कोडिंग की जाती है. जिसे मशीन के ज़िए पढ़ा जा सकता है. जहां दूसरे पौधों के साथ आर्किड का मेल होता है वहां डीएनए बारकोडिंग की मदद ली जाती है.

स्वीडन की प्रोफेसर वेल्डम उन आर्किड का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं जिनका कारोबार चिकांदा के तौर पर होता है. प्रोफेसर सरीना का कहना है कि ऑर्किड की 81 किस्में चिकांदा बनाने में इस्तेमाल हो रही हैं.

इमेज कॉपीरइट Tim Shepherd/naturepl.com

डीएनए बारकोडिंग के ज़रिए ये पता लगाना आसन हो जाता है कि कौन सी क़िस्म का इस्तेमाल चिकांदा बनाने के लिए किया जा रहा है. इससे ये भी पता चल जाता है कि चिकांदा बनाने में ऑर्किड का ज़मीन के भीतर वाला हिस्सा किसी और चीज़ के साथ मिलाया गया है या नहीं.

चिकांदा की बढ़ी मांग को देखते हुए ही आर्किड की खेती बढ़ाने पर ज़ोर दिया जाने लगा है. इसकी खेती के लिए अफ़्रीका के तंजानिया में किटुलो नेशनल पार्क में बड़ा इलाक़ा तैयार किया गया है. जहांरंग बिरंगे आर्किड देखने को मिलते हैं. चिकांदा के लिए जिस पैमाने पर ऑर्किड की कंद का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे जंगली ऑर्किड की पैदावार घट गई है.

व्यापारियों का कहना है एक वक्त था जब ज़ैम्बिया में ऑर्किड की पैदावार इतनी थी कि देश की ज़रूरत पूरी हो जाती. लेकिन अब दूसरे देशों से मंगवाने की नौबत आ गई है.

इमेज कॉपीरइट Steve O. Taylor (GHF)/naturepl.com

हालात ये हो गए हैं कि अगर एक जगह पर ऑर्किड की पैदावार कम हो जाती है तो इसकी खेती में लगे लोग दूसरे ठिकाने तलाशने लगते हैं. हाल के दिनों में ऑर्किड की पैदावार में बहुत ज़्यादा कमी आई है. साथ ही इसकी गुणवत्ता में भी कमी आई है.

प्रोफेसर सरीना का कहना है ऑर्किड की खेती और कारोबार का स्थायी ज़रिया बनाने के कई तरीक़े हो सकते हैं. लेकिन कौन सा तरीक़ा इसकी तमाम नस्लें बचाने के लिए ठीक होगा ये कहना मुश्किल है.

इमेज कॉपीरइट Tim Shepherd/naturepl.com

एक तरीक़ा ये हो सकता है कि ऑर्किड के बीजों का वितरण एक जगह से हो. इन्हें सस्ती दरों पर लोगों को मुहैया कराया जाये. लोगों को इसी खेती के आधुनिक तरीक़ों से वाकिफ कराया जाये. इसके अलावा लोगों को ये समझाना ज़रूरी है कि वो ऑर्किड की पैदावार के लिए कुछ ऐसे पौधे ज़रूर छोड़ें जिनसे और पैदावार के लिए बीज निकाले जा सकें.

जुलाई 2016 में स्योलजोंग किम नाम के एक छात्र ने प्रोफ़ेसर सरीना वेल्डमैन की निगरानी में एक सर्वे किया. सर्वे में पाया गया कि ऑर्किड की पैदावार कम हो रही है. लेकिन चिकंदा के लिए लोगों का जुनून कम नहीं हो रहा है.

ज़ाम्बिया में इस वक़्त जगह जगह चिकंदा खरीदा-बेचा जा रहा है. बड़े होटलों से लेकर गली-मुहल्लों तक लोग इसे बेचते नज़र आ रहे हैं. जब चिकांदा के लिए दीवानगी इतना ज़्यादा है तो यक़ीनन व्यापारी, किसान और वैज्ञानिक इसकी पैदावार बढ़ाने पर भी ज़रूर ध्यान देंगे.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी अर्थ पर ही उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए