वो तूफ़ान जिसने समलैंगिकता को जुर्म बना दिया

  • 5 नवंबर 2017
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Image caption दक्षिण डकोटा पर बादलों की गर्जना

समलैंगिकता को लेकर आज सारी दुनिया में तरह तरह की बातें हो रही हैं. कहीं इसे क़ानूनी अधिकार देने की बात हो रही है और कई जगहों पर इसे क़ानूनी दर्जा दिया भी जा चुका है.

फिर भी बहुत सी जगहों पर समलैंगिकता को जुर्म माना जाता है. लेकिन क्या आपको पता है इसकी शुरुआत कहां और कैसे हुई थी. नहीं ना!

चलिए हम आपको बताते हैं. समलैंगिक संबंध को जुर्म मानने की शुरुआत सत्रहवीं सदी में हुई थी. वो भी एक क़ुदरती आपदा यानी तूफ़ान की वजह से.

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Image caption जैन वैन गोयल की "द आइस स्केटर्स"

350 साल पहले का वो तूफ़ान

बात साल 1674 की है. एक तूफ़ान आया और पल भर में सब कुछ तहस-नहस करके चला गया. ये भयानक तूफ़ान अपने पीछे छोड़ गया बर्बादी की लंबी दास्तां जिसके निशान आज भी बाक़ी हैं.

क़रीब 350 साल पहले उत्तर-पश्चिम यूरोप में एक ज़बरदस्त तूफ़ान ने तबाही मचाई थी. उस तूफ़ान की वजह से यूट्रेक्ट पूरी तरह से तबाह हो गया.

क़ुदरती आपदाएं अक्सर ही आती हैं. लेकिन ये तूफ़ान इतना शक्तिशाली कैसे था, इस पर आज भी रिसर्च की जा रही है. हाल ही में इस तूफ़ान की ताक़त से जुड़ी कई नई बातें सामने आई हैं. जो चौंकाने वाली हैं.

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Image caption नीदरलैंड का यूट्रेक्ट शहर

1672 डच इतिहास का 'डिज़ास्टर इयर'

सत्रहवीं सदी में नीदरलैंड पहले ही कई चुनौतियों से जूझ रहा था. फ्रेंच और अंग्रेज़ ताक़तों ने कई डच उपनिवेश हथिया लिए थे.

साल 1672 में फ़्रांस, इंग्लैंड और जर्मनी ने मिलकर डच रिपब्लिक का ख़ात्मा कर दिया. डच इतिहास में इस साल को 'डिज़ास्टर इयर' के नाम से जाना जाता है.

रॉयल नीदरलैंड्स मेट्रोलॉजिकल इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर जेरार्ड शिरायर के मुताबिक़ फ्रांस ने डच गणराज्य की सारी संपत्ति हथिया ली थी.

नीदरलैंड की बर्बादी के उस दौर में यूट्रेक्ट के पास पैसा नहीं था. वो किसी भी क़ुदरती आफ़त से ख़ुद की हिफ़ाज़त के लिए तैयार नहीं था. ठीक दो साल बाद जब तूफ़ान ने यहां तांडव किया तो यूट्रेक्ट कुछ नहीं कर पाया.

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Image caption यूट्रेक्ट में सेंट मार्टिन कैथेड्रल

खंडहरों में मिलते थे समलैंगिक जोड़े

कई दशक तक टूटी इमारतों का मलबा ऐसी ही पड़ा रहा. क्योंकि इस मलबे को साफ़ कराने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं था. बड़ी-बड़ी इमारतें खंडहर बन गई थीं.

कहा जाता है कि इन खंडहरों में ही समलैंगिक जोड़े आकर मिला करते थे. ये सिलसिला कई बरस तक चलता रहा.

क़रीब 50 साल बाद ईसाई पादरियों ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई. फिर छुप-छुपकर मिलने वाले समलैंगिकों को सज़ा दी जाने लगी.

हालांकि बहुत से लोग इस बात पर यक़ीन नहीं करते, लेकिन उस दौर के दस्तावेज़ इस बात पर मुहर लगाते हैं.

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Image caption आसमान में तूफ़ानी बादलों की गर्जना

बच्चों के सिर जितने बड़े ओले गिरे

एक अगस्त 1674 को बुधवार का दिन था. दिन की शुरुआत ही उमस भरी गर्मी से हुई थी. चढ़ते दिन के साथ तेज़ हवाओं ने तूफ़ान की शक्ल अख़्तियार कर ली.

शाम छह बजते-बजते तूफ़ान ने रौद्र रूप धारण कर लिया. प्रत्यक्षदर्शियों ने इसे अपने-अपने तरीक़े से लिखा है. उस दौर के एक अख़बार में छपा था कि तेज़ हवाओं के साथ ओलों की बरसात हुई थी.

बच्चों के सिर के बराबर के ओले पड़े थे. लोगों के घरों के छज्जे उड़ गए थे.

एक डच व्यापारी गेरिट यान्स कुक ने तबाही के इस मंज़र पर एक कविता लिखी थी. उन्हें ज़िक्र किया है कि कैसे एम्सटर्डम के पास नौकाएं उछल कर मैदानों में आ गिरी थीं.

एक किसान तो तूफ़ान के बाद अपने ही खेत को पहचान ही नहीं पाया था. हदबंदी के लिए जो पेड़ लगाए गए थे, वो अपनी जगह से उखड़ चुके थे. चर्चों के टावर गिर कर ख़त्म हो गए.

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Image caption तूफ़ान के बाद द डूम कैथेड्रल

चर्च पर पड़ी थी इस तूफ़ान की मार

मशहूर द डूम कैथेड्रल ने तो इस तूफ़ान की मार को सबसे ज़्यादा झेला था. इस चर्च के बीच का हिस्सा पूरी तरह से गिर कर ज़मीन में मिल गया था. चर्च के टावर और गिरजाघर के दूसरे हिस्से के बीच एक गहरी खाई जैसी बन गई. कुछ चर्च तो ऐसे भी थे जिनके सभी टावर गिर कर ख़त्म हो गए.

चश्मदीदों के दस्तावेज़ों से इस तूफ़ान के बारे में दो अहम जानकारियां मिलती हैं. एक तो ये कि इस तूफ़ान ने बड़े पैमाने पर नहीं बल्कि स्थानीय स्तर पर तबाही ज़्यादा मचाई थी.

दूसरा ये कि ये तूफ़ान बहुत कम वक़्त के लिए आया था.इन्हीं दस्तावेज़ों के आधार पर 1980 में मौसम वैज्ञानिकों ने इस तूफ़ान को टॉरनेडो बताया था.

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Image caption दक्षिण डकोटा पर बादलों की गर्जना

तूफ़ान का नाम दिया गया 'बो-इको'

हाल में जो नई रिसर्च सामने आई हैं उसकी बुनियाद पर इसे 'बो-इको' का नाम दिया गया है. तूफ़ानों के नाम की फ़ेहरिस्त में ये नाम मौसम वैज्ञानिकों के लिए भी नया है.

पहली बार 40 साल पहले इस शब्द का इस्तेमाल हुआ था. टॉरनेडो तूफ़ान एक ख़ास इलाक़े में आता है और कुछ ही देर के लिए होता है. उसका दायरा भी बहुत बड़ा नहीं होता.

लेकिन 'बो-इको' का दायरा काफ़ी बड़ा होता है और ये तूफ़ान तीर-कमान की शक्ल में उठता है.

ये दस किलो मीटर से हज़ार किलो मीटर तक के रक़बे को ख़ुद में समेट लेता है. ये चलता भी बहुत रफ़्तार से है. कुछ ही घंटों में काफ़ी बड़े इलाक़े में फैल जाता है.

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350 साल पुराने इस तूफ़ान के रिकॉर्ड मौजूद

इस तूफ़ान में जो इमारतें तबाह हुई थीं उन्हें एक बार फिर से उनके मूल रूप में लाने की कोशिश की जा रही है. इस काम में उस दौर की पेंटिंग और चश्मदीदों के दस्तावेज़ों की मदद ली जा रही है.

उस दौर की पेंटिंग के आधार पर इस तूफ़ान को 'बो-इको' का नाम दिया गया है. क्योंकि जिस दिशा में ये तूफ़ान बढ़ता है, उसी दिशा में ये इमारतें तबाह हुई हैं.

जानकारों का कहना है कि आम तौर से इस तरह कि घटनाओं का बहुत पुराना रिकॉर्ड मौजूद नहीं होता.

लेकिन इस तूफ़ान ने ऐसी तबाही मचाई थी कि इसके लगभग सभी गवाहों ने इसके बारे में लिखा. इन्हीं की बुनियाद पर इस तूफ़ान की ताक़त को समझने में मदद मिली है.

ये तूफ़ान आज यूट्रेक्ट की तारीख़ का एक अटूट हिस्सा बन चुका है, जिसके निशान 350 साल बाद भी मिलते हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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