वो भयंकर 'आंधी' जिसकी तबाही 'सोच से भी परे' थी

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मई के पहले हफ़्ते में भयंकर आंधी-तूफ़ान की वजह से भारत के कई राज्यों में सौ से ज़्यादा लोगों की जान चली गई. क़ुदरत ने अपना रौद्र रूप दिखाया और लोगों को एहसास कराया कि उसके आगे सब बौने हैं.

उस तूफ़ानी तबाही को देखते हुए मौसम विभाग ने फिर से आंधी के आसार बताए और 17 राज्यों को सावधान रहने को कहा.

ये पहला मौक़ा नहीं था, जब तूफ़ानी हवाओं का डर लोगों के सिर पर तारी था. हम सब ने ऐसे बहुत से मंज़र देखे-सुने हैं, जब अंधड़ ने तबाही मचाई है.

ऐसा ही एक भयंकर तूफ़ान ब्रिटेन में आया था, 7 दिसंबर 1703 को. इसे 'ग्रेट स्टॉर्म ऑफ़ ब्रिटेन' के नाम से याद किया जाता है.

वो भयंकर रात

7 दिसंबर 1703 की रात को आए इस तूफ़ान ने ब्रिटेन के एक बड़े हिस्से में भारी तबाही मचाई थी. इस तूफ़ान के आने से कई दिनों पहले से ही ब्रिटेन के एक बड़े हिस्से में तेज़ हवाएं चल रही थीं. जब उस रात वेल्श इलाक़े से इस चक्रवात ने क़दम रखा, तो फिर तबाही मचाता हुआ आगे बढ़ा.

इस तूफ़ान की वजह से दक्षिणी इंग्लैंड और ख़ास तौर से ब्रिस्टॉल और लंदन शहरों में बहुत नुक़सान हुआ था. यही नहीं, इस चक्रवात ने नीदरलैंड, जर्मनी और डेनमार्क के कुछ जज़ीरों तक बर्बादी का आलम दिखाया था.

उस दौर की ब्रिटेन की महारानी एन ने इस तूफ़ान के बारे में कहा था कि, 'ये ऐसी क़यामत थी जिसे इससे पहले ब्रिटिश साम्राज्य ने न देखा था और न ही सुना था'.

1703 में उस महातूफ़ान के आने से पहले ब्रिटिश उपन्यासकार डेनियल डेफ़ो ने देखा था कि बुध ग्रह काफ़ी झुक गया था. डेफ़ो ने ये समझा कि उनकी दूरबीन को बच्चों ने बिगाड़ दिया था. डेनियल डेफ़ो ने 1704 की अपनी किताब 'द स्टॉर्म' में अच्छे से बयान किया है. इसमें डेनियल डेफ़ो ने ब्रिटेन भर के लोगों के तजुर्बे के हवाले से तूफ़ान की दास्तान सुनाई है.

वैसे ब्रिटेन में 1987 में आए महातूफ़ान को 1703 के बाद का ब्रिटिश इतिहास का सबसे भयंकर तूफ़ान कहा जाता है.

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Image caption 1987 में आई आंधी के बाद का दृश्य

मगर, सवाल ये है कि क्या 1703 का महाचक्रवात, ब्रिटेन का सबसे भयंकर तूफ़ान था?

ब्रिटेन की नॉर्विच यूनिवर्सिटी में क्लाइमेट रिसर्च यूनिट की स्थापना करने वाले स्वर्गीय ह्यूबर्ट लैम्ब ने डेनमार्क के मौसम विज्ञान संस्थान के क्नड फ्राइडेनडाहल के साथ मिलकर उत्तरी सागर और उत्तरी यूरोप में आए तमाम तूफ़ानों पर रिसर्च की थी. 1991 में उन्होंने अपनी किताब में 1703 के तूफ़ान को महातूफ़ानों की लिस्ट में पांचवें नंबर पर रखा था.

लैम्ब और फ्राइडेनडाहल के मुताबिक़, ब्रिटेन का सबसे भयानक तूफ़ान 1987 में आया था. इसके बाद 1792 का महातूफ़ान, 1825 का तूफ़ान और 1694 के हरीकेन के नंबर आते हैं. लैम्ब और फ्राइडेनडाहल की नज़र में 1703 के तूफ़ान का नंबर तबाही के मामले में इन चारों के बाद आता है.

अब अगर जानकारों की नज़र में बड़े तूफ़ान दूसरे थे, तो फिर 1703 का झंझावात आज तक ब्रिटेन के लोगों के ज़हन में एक महातूफ़ान के तौर पर क्यों दर्ज है?

इसकी बड़ी वजह शायद ये है कि उपन्यासकार डेनियल डेफ़ो ने 1703 के महाचक्रवात का विस्तार से वर्णन किया, जो लोगों की ज़ुबानी सुनी हुई कहानी थी. डेफो की किताब 'द स्टॉर्म' की वजह से ये ब्रिटेन के इतिहास की मौसम की सबसे बड़ी ख़बर बन गई.

महातूफ़ान का कहर

इसकी एक वजह ये भी है कि 1703 के तूफ़ान ने भारी तबाही मचाई थी. इसका गहरा असर इसलिए भी पड़ा कि इसने दक्षिणी इंग्लैंड के आबादी वाले इलाक़े पर हमला बोला था, जहां पर इंग्लैंड के व्यस्त बंदरगाह और बड़े शहर आबाद हैं.

इस तूफ़ान ने हज़ारों पेड़ उखाड़ डाले. इमारतों की छतों को उड़ा दिया. खिड़कियां पटककर तोड़ डालीं. और टेम्स नदी में लंगर डाले खड़े जहाजों को खिलौनों की तरह उठाकर पटक दिया. केंट शहर के व्हिट्सटेबल में एक नाव को ये तूफ़ान पानी से बहाकर 250 मीटर तक दूर ले गया था.

ये तूफ़ान रात के वक़्त आया था. उस वक़्त लोग सो रहे थे, तभी इस तबाही ने दस्तक दी. इसने घरों की चिमनियों को पटक कर तोड़ डाला, जैसे कोई गदाधारी किसी छोटे जीव को खिलौनों की तरह पटक देता है. चक्रवात की वजह से लंदन के सेंट जेम्स पार्क में स्थित तालाब की मछलियां बाहर जा छिटकीं.

पेड़ों पर पनाह लिए लाखों परिंदे पल भर में प्राण पखेरू छोड़ बैठे. पालतू जानवर सैकड़ों मीटर दूर जाकर गिरे और मर गए. बड़े-बड़े दरख़्त गिरकर ताश के पत्तों की तरह बिखर गए. घरों में इस्तेमाल हुआ लोहा और शीशा सड़कों पर यूं बिखरा था, मानो किसी बच्चे ने ढेर सारे खिलौने बिखेर दिए हों.

इस तूफ़ान की हवाएं इतनी तेज़ थीं, कि एक आदमी उड़कर हाते से बाहर जा गिरा. एक गाय उड़कर एक पेड़ पर अटक गई. बिजली गिरने की वजह से व्हाइटहाल और ग्रीनविच में आग लग गई. सुबह पांच बजे से लेकर क़रीब साढ़े छह बजे तक ये तूफ़ान गरजता-बरसता रहा. माना जाता है कि 1703 के महातूफ़ान में 8 से 15 हज़ार के बीच लोग मारे गए थे.

इस तूफ़ान के आने से 14 दिन पहले से तेज़ हवाएं लगातार चल रही थीं. जिसके बाद चक्रवात ने ब्रिटेन पर धावा बोला. हवाएं इतनी तेज़ थीं कि चिमनियां, जहाज़ और घरों की छतें उड़ गईं.

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युद्ध की तैयारी के बीच आयी आंधी

ब्रिटेन की सुन्डरलैंड यूनिवर्सिटी के मौसम विज्ञान के प्रोफ़ेसर डेनिस व्हीलर कहते हैं कि नाटकीय असर की बात करें, तो ये तूफ़ान सब में अव्वल था. डेनिस व्हीलर कहते हैं कि उस वक्त ब्रिटेन, स्पेन में विरासत की जंग में शामिल होने की तैयारी कर रहा था. ऐसे जंग के माहौल में शाही ब्रिटिश नौसेना के हज़ारों नाविक इस तूफ़ान की वजह से मारे गए. व्हीलर के मुताबिक़ ये आंकड़ा 6 हज़ार के क़रीब था. युद्ध की तैयारी कर रहे किसी भी देश के लिए ये बहुत बड़ा नुक़सान था.

व्हीलर कहते हैं कि 1703 के महातूफ़ान की वजह से ब्रिटेन के सैकड़ों जहाज़ तबाह हो गए. कारोबार और संपत्ति का भारी नुक़सान भी उठाना पड़ा था.

उस दौर के रिकॉर्ड बताते हैं कि तूफ़ान की दस्तक से पहले से ही ब्रिटेन, पछुआ हवाओं के थपेड़े झेल रहा था. इसकी वजह से इंग्लिश चैनल में बहुत से जहाज़ लंगर डाले हुए थे और मौसम के बेहतर होने का इंतज़ार कर रहे थे, ताकि हवा शांत हो, तो वो सफ़र पर निकल सकें.

प्रोफ़ेसर डेनिस व्हीलर ने 2003 में इस तूफ़ान के बारे में गहराई से पड़ताल की थी. व्हीलर के मुताबिक़, उस वक़्त शाही ब्रिटिश नौसेना के बहुत से जंगी जहाज़ भी इस इलाक़े में खड़े हुए थे. ये सब स्पेन के तटवर्ती शहर कैडिज़ पर धावा बोलने वाले थे. हालांकि बाद में इन जहाज़ों ने स्पेन के जिब्राल्टर इलाक़े पर हमला बोलकर उसे ब्रिटेन के लिए जीता.

लेकिन 1703 के महातूफ़ान की वजह से शाही ब्रिटिश नौसेना के 13 जहाज़ तबाह हो गए थे. इसके अलावा बड़ी तादाद में कारोबारी जहाज़ भी इंग्लिश चैनल में बर्बाद हो गए थे. इनमें सवार सैकड़ों नाविक भी मारे गए थे.

क्यों आया था वो महातूफ़ान?

मौसम वैज्ञानिकों ने 1703 के तूफ़ान के आने की वजह की नजदीकी पड़ताल की है. 1991 की अपनी किताब में ह्यूबर्ट लैम्ब और क्नड फ्राइडेनडाहल ने तूफ़ान के 14 दिनों का ब्यौरा दिया है. लैम्ब का मानना था कि ये महाचक्रवात ब्रिटेन में छह दिनों तक असरदार रहा था. इसके बाद वो उत्तरी यूरोप की तरफ़ बढ़ गया था.

लैम्ब ने लिखा है कि लंदन के आसमान के ऊपर हवा के कम दबाव का क्षेत्र बन गया था. इसी वजह से ये तूफ़ान आया था. कम दबाव का ये इलाक़ा मध्य इंग्लैंड के एक बड़े हिस्से के ऊपर स्थित था.

डेनिस व्हीलर कहते हैं कि अटलांटिक महासागर में अक्सर हवा के कम दबाव के क्षेत्र की वजह से समुद्री तूफ़ान उठते हैं. अटलांटिक महासागर में बहने वाली गर्म धाराएं, इन तूफ़ानों का रुख़ तय करती हैं. इन तूफ़ानों की वजह से ज़मीनी इलाक़ों पर भी बादल छाते हैं और बारिश होती है.

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लेकिन, 1703 में आया तूफ़ान इतना ताक़तवर कैसे था?

प्रोफ़ेसर व्हीलर के मुताबिक़, उस वक़्त ब्रिटेन समेत पूरा उत्तरी यूरोप, छोटे बर्फ़ युग के दौर से गुज़र रहा था. यूं तो 'आइस एज' 12 हज़ार साल पहले ख़त्म हो चुका था. मगर, 1680 से 1690 के दशक में ब्रिटिश द्वीपों पर भयंकर बर्फ़बारी और ठंड पड़ रही थी. इस वजह से हवा के कम दबाव का क्षेत्र बना और तूफ़ान पैदा हुआ.

वैसे कुछ जानकार ये कहते हैं कि 1703 के इस महातूफ़ान की शुरुआत उत्तरी अमरीका के न्यू इंग्लैंड इलाक़े से हुई थी. डेनियल डेफ़ो ने भी 7 दिसबंर को आए तूफ़ान से पहले उत्तरी अमरीका में समुद्री तूफ़ान के आने का ज़िक्र किया है. दिसंबर का महीना आम तौर पर अटलांटिक महासागर में हरीकेन सीज़न यानी तूफ़ानों का मौसम कहा जाता है. लेकिन डेनिस व्हीलर को इस बात के कोई सबूत नहीं मिले, कि, 1703 का ब्रिटिश महातूफ़ान अटलांटिक महासागर में अमरीका की तरफ़ से आया था.

हालांकि ह्यूबर्ट लैम्ब ने लिखा है कि इस दौरान सबसे तेज़ हवाएं 278 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चली थीं. लेकिन, हवा की ये रफ़्तार समंदर में ही रही थी. ज़मीन पर हवा की रफ़्तार 140 से 155 किलोमीटर प्रति घंटे रही होगी.

एक सवाल ये भी है कि 1703 के इस महातूफ़ान ने मौसम विज्ञान पर कैसा असर डाला था?

उपन्यासकार डेनियल डेफो ने 1704 की अपनी किताब 'द स्टॉर्म' में एक 'टेबल ऑफ़ डिग्रीज़' यानी एक पैमाना बनाया था, जिससे हवाओं की रफ़्तार को मापा जा सके. कुछ लोग इसका ताल्लुक़ 'ब्यूफ़ोर्ट स्केल' से करते हैं, जिसे उस तूफ़ान के क़रीब एक सदी बाद इजाद किया गया था. ब्यूफ़ोर्ट स्केल की मदद से ही आज समुद्री हवाओं की रफ़्तार मापी जाती है. यूं तो दोनों पैमाने एक जैसे हैं, मगर किसी को नहीं पता कि ब्यूफ़ोर्ट स्केल बनाने वाले को डेनियल डेफ़ो के पैमाने से प्रेरणा मिली थी कि नहीं.

डेनिस व्हीलर ने उस दौर की समुद्री यात्राओं का वर्णन करने वाली किताबों और दस्तावेज़ों की गहराई से पड़ताल की थी. वो कहते हैं कि उस वक़्त तूफ़ान को बयां करने के लिए बहुत ज़्यादा आधिकारिक शब्द नहीं थे.

वैसे मौसम विज्ञान की तरक़्क़ी में 1703 के तूफ़ान ने बुनियादी रोल ज़रूर निभाया. क्योंकि उससे पहले मौसम विज्ञान जैसी कोई चीज़ ही नहीं थी. यूरोप में 18वीं सदी में तर्क और ज्ञान के युग यानी 'एज ऑफ़ एनलाइटमेंट' (Age of Enlightenment) की आमद से पहले लोग हर चीज़ के लिए ऊपरवाले को ज़िम्मेदार ठहराया करते थे.

उस वक़्त यूरोपीय समाज बेहद धार्मिक था. ख़राब मौसम से हुई तबाही को लोग भगवान की नाराज़गी और ऊपरवाले का क़हर कहकर छुट्टी पा लेते थे. धर्म गुरू और पादरी अपने उपदेशों में आम जनता को ऐसी ही बातों के ज़रिए महातूफ़ान और भयंकर मौसम वाली दूसरी घटनाओं को समझाया करते थे.

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Image caption तूफ़ान के आने से पहले सचेत करने वाला बैरोमीटर

कई भ्रांतियों को भी उड़ा ले गई वो आंधी

प्रोफ़ेसर व्हीलर कहते हैं कि उस दौर में न्यूटन जैसे कुछ वैज्ञानिक भी थे, जो चीज़ों को तार्किक तरीक़े से समझाते थे. लेकिन, आम जनता की धर्म और ईश्वर में गहरी आस्था थी. तो, तूफ़ानों को भी ईश्वर का कोप कहा जाता था.

विज्ञान की दूसरी शाखाओं के मुक़ाबले मौसम विज्ञान का विकास बहुत देर से हुआ. 19वीं सदी, यानी 1820-30 में इसकी शुरुआत हुई, जब मौसम विज्ञान ने लड़खड़ाते, अटकते और अंधेर में तीर मारते हुए बारिश, हवाओं, गर्मी-सर्दी की वजह को समझने का सफ़र शुरू किया था.

इससे पहले बड़ी मौसमी घटनाएं बयां करने के लिए शब्दावली तक नहीं थी. मौसम की भविष्यवाणी का सिलसिला तो 1860 से पहले शुरू ही नहीं हुआ था. 1703 में छपे एक अख़बार में एक शख़्स ने मौसम के तजुर्बे को दिलचस्प तरीक़े से बयां किया है. मौसम के लिए दुखी, परेशान करने वाले, सुखद, दिलकश, मुस्कुराते हुए और बेहद खुश जैसे शब्द इस्तेमाल हुए हैं. मौसम के बदलाव के अपने तजुर्बे को इस लेखक ने आध्यात्मिक तजुर्बे से लेकर यौन संबंध बनाने जैसे सुखद अनुभव के तौर पर लिखा है.

समंदर के सफ़र पर निकलने वालों को मौसम की बारीकियां दर्ज करनी होती थीं. फिर भी कई लोगों को इसके लिए शब्द ही नहीं मिलते थे. एक जहाज़ के कैप्टन ने तो बस इतना लिखा, 'बहुत ही भयंकर तूफ़ान'. इसके सिवा वो तूफ़ानी हवाओं का कोई और वर्णन नहीं कर सका.

1703 के महातूफ़ान के कुछ साल बाद अंग्रेज़ नौसेना का एक बेड़ा सिसिली द्वीपों के पास एक चट्टान से टकराकर तबाह हो गया था. इसकी वजह बेहद ख़राब मौसम थी. इस हादसे के बाद ब्रिटेन में 'बोर्ड ऑफ़ लॉन्गीट्यूड' की स्थापना की गई. इसका मक़सद समुद्री रास्तों के पैमाने तय करना था, ताकि भविष्य में ऐसे हादसे न हों. समंदर में सफ़र करने वालों को पता रहे कि वो कब, किस जगह पर हैं.

हालांकि 1703 के महातूफ़ान का इतना गहरा असर तो नहीं हुआ, मगर इसने मौसम विज्ञान के विकास की दिशा में लोगों को प्रेरित ज़रूर किया. आज जिस मौसम विज्ञान को हम जानते समझते हैं, इसकी बुनियाद उसी महातूफ़ान से पड़ी थी.

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