एक बार में एक ही चीज देखने की बीमारी

  • हेलेन थॉमसन
  • बीबीसी फ़्यूचर
आंख

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अच्छी सेहत, अच्छी याददाश्त और आंखों में अच्छी रोशनी, नेमत हैं. लेकिन कुछ लोग इससे महरूम हैं.

हम एक ही नज़र में बहुत सी चीजें देख लेते हैं. मिसाल के तौर पर हम अगर किसी कमरे को देखते हैं तो वहां मौजूद हरेक चीज़ की तस्वीर हमारे ज़ेहन में बन जाती है और वो सब हमें याद रहता है.

मान लीजिए हमने किसी का चेहरा देखा तो उसकी आंखें, नाक, होंठ, बाल सबकी तस्वीर हमारे दिमाग़ में बन जाती है. फिर हमारा दिमाग़ इन सभी अंगों को एक साथ एक शक्ल देता है और ज़ेहन में चेहरे की तस्वीर बन जाती है.

लेकिन, दुनिया में ऐसे कई इंसान हैं, जिनका दिमाग़ तमाम चीज़ों को जोड़कर एक मुकम्मल तस्वीर नहीं बना पाता. उनका दिमाग़ एक वक्त में एक ही बात और एक ही चीज़ को याद रखता हैं. इस बीमारी को साइमलटेनेग्नोसिया कहते हैं. यह बीमारी क्या है इसके लिए आपको मिलवाते हैं एग्नेस से.

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एक छोटी सी बीमारी के बाद एग्नेस का न्यूरोलॉजिकल टेस्ट कराया गया. इसमें पता चला कि उनको एक छोटी सी परेशानी है. वो अपने आस-पास जो भी चीज़ें देखती हैं, उन सबको मिलाकर एक मुकम्मल तस्वीर उनका दिमाग़ नहीं गढ़ पाता है.

एग्नेस के डॉक्टर जोएल शैंकर ने उन्हें एक तस्वीर दिखाई, जिसमें एक बच्चा रसोई से बिस्कुट चुरा रहा है, जबकि उसकी मां बर्तन धोने में मसरूफ़ है. पूछने पर एग्नेस ने इस फोटो में नज़र आने वाले पर्दे और खिड़कियों के बारे में तो बताया. लेकिन, और किसी चीज़ को वो याद नहीं रख पाई.

कुछ देर बाद उसे यही फोटो फिर से दिखाया गया. इस बार उसने चोरी करते बच्चे को याद रखा लेकिन कुछ और उसे याद नहीं रहा. जिन पर्दों और खिड़कियों का ज़िक्र एग्नेस ने पहले किया था अब उसे वो भी याद नहीं थे. वो अलग अलग चीज़ों को तो याद रख पा रही थी लेकिन सब चीज़ों को मिलाकर एक कमरे की पूरी तस्वीर अपने ज़ेहन में नहीं बना पा रही थी.

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एग्नेस के दिमाग में किसी कमी के चलते उसे यह परेशानी थी. उनकी बीमारी का पता चलने पर जोएल और उनके साथियों ने कुछ नए तजुर्बे किए.

इनसे यह पता चला कि कई बार हमारा दिमाग़ एकदम अजब तरह का बर्ताव करता है. कंशस माइंड यानी दिमाग़ का वो हिस्सा जो सक्रिय रहता है, वो कुछ काम करता है. तो वो फौरन ज़ाहिर होता है.

मग़र दिमाग़ का वो हिस्सा जिसे अनकंशस माइंड या बेख़याली वाला हिस्सा कहेंगे, वो बहुत सी चीज़ें जो हमारी आंखें देखती हैं, वो जमा तो कर लेता है, मगर ज़ाहिर नहीं करता. एग्नेस के मामले में ऐसा ही हो रहा है.

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स्ट्रूप टेस्ट

मसलन, एग्नेस अकेली रहती हैं. अपने रोज़मर्रा के काम वो बख़ूबी निपटा लेती हैं. अब उनका दिमाग़ तमाम चीज़ों को मिलाकर एक घर की तस्वीर तो बना नहीं पाता. फिर भी वो किसी दीवार से नहीं टकरातीं. अपना खाना भी आराम से बना लेती हैं.

डॉक्टर शैंकर के मुताबिक़ इसका एक ही तार्किक नतीजा निकलता है कि एग्नेस का दिमाग़ अनजाने में उसके आसपास की दुनिया की जानकारी को एक जगह जमा करके उसे एक शक्ल देता रहता है. जिसका इस्तेमाल उनका होशमंद दिमाग़ नहीं कर पाता.

डॉक्टर शेंकर के मुताबिक़ ऐसा इसलिए होता है कि कई बार हमारा दिमाग़ कुछ जानकारिया इकट्ठी तो कर लेता है. मगर उनका इस्तेमाल नहीं करता. या फिर उस जानकारी के आधार पर हमें बर्ताव करने का निर्देश नहीं देता.

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हां, किसी मुसीबत की सूरत में वो जानकारी ज़रूर इस्तेमाल होती है. अगर हमें ख़तरा होगा तो दिमाग़ उस जानकारी के आधार पर हमें एलर्ट करेगा. मगर आम तौर पर ऐसा नहीं होता. ऐसा ही एग्नेस के साथ भी हो रहा था. ये बात जोएल शेंकर के स्ट्रूप टेस्ट से भी साबित हुई.

स्ट्रूप टेस्ट में कई तरह के तजुर्बे किए जाते हैं, इंसान के रंगों को पहचाने की कूवत का अंदाज़ा हो सके. अब एग्नेस जैसे लोग, जिनका दिमाग़ आंख से देखी गई जानकारी को प्रोसेस ही नहीं कर पाता, उन्हें तो ये रंग दिखने नहीं चाहिए. मगर ऐसा होता नहीं.

वे बारीक चीज़ें तो देख पाते हैं. मगर उन बारीक चीज़ों से मिलाकर कोई बड़ी शक्ल जो बनती है, उसे समझ पाने में नाकाम रहते हैं.

डॉक्टर जोएल शेंकर के स्ट्रूप टेस्ट में एग्नेस के साथ यही हुआ. वो छोटे रंग से बने अक्षर तो पढ़ लेती थीं. मगर उन छोटे अक्षरों से बनने वाले बड़े शब्द को नहीं पहचान पाती थीं.

जब एग्नेस रौशनाई का रंग बता रही थी तो वो बड़े अक्षर को ही याद रख पा रही थीं. उसे देख कर ही रंग की पहचान कर रही थीं. जिससे पता चलता है कि एग्नेस के दिमाग का कुछ हिस्सा ही उस बड़े हिस्से की तस्वीर उसके दिमाग में उकेर रहा था.

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ये इंसानी ज़ेहन की खूबी है कि वो अपने आस पास हो रही हर बात और हरेक घटना को स्टोर करता रहता है. जब उसे इस जानकारी की ज़रूरत होती है तो ज़रूरत के मुताबिक उस का इस्तेमाल कर लेता है.

अचेतन में हमारा दिमाग़ कैसे जानकारियों को जमा करता है ये समझने के लिए और भी बहुत सी मिसालें हैं.

रिसर्चर किर्सटन डेलरिम्पल का कहना है जो नेत्रहीन होते हैं चीज़ों को छूकर पहचान लेते हैं क्योंकि उस वस्तु की तस्वीर अपने दिमाग़ में आंख से देखर कर नहीं बनाते हैं बल्कि उसे छूकर बनाते हैं.

रिसर्चर डेलरिम्पल का कहना है साइमलटेनेग्नोसिया के मरीज़ अपने आसपास हो रही सारी घटनाओं को देखते और समझते हैं. लेकिन उसका बहुत छोटा हिस्सा ही वो याद रख पाते हैं. इसे वो इन मरीज़ों की अटेंश्नल विंडो कहते हैं.

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हम सभी का अटेंश्नल विंडो अलग अलग समय पर एक दूसरे से अलग होता है. मिसाल के तौर पर अगर आप किसी भीड़ भाड़ वाली जगह पर चल रहे हैं, तो, आपका अटेंश्नल विंडो ज्यादा बड़ी होता है. आप अपने आस पास होने वाली हर चीज़ को ज़्यादा ध्यान से देखते हैं.

वहीं अगर आपके सामने चलते चलते अगर कोई गिलहरी आ जाए तो आपका ये विंडो छोटा हो जाता है. आपका सारा ध्यान उस गिलहरी की तरफ़ लग जाता है.

बहरहाल दिमाग का कौन सा हिस्सा इस अटेंश्नल विंडो को कंट्रोल करता है, कहना मुश्किल है. डॉ डेलरिम्पल की एक मरीज़ दिमाग के इसी हिस्से में परेशानी की वजह से साइमलटेनेग्नोसिया से पीड़ित थी. लेकिन जैसे जैसे दिमाग की चोट में बेहतरी आती गई उनकी ये बीमारी भी ठीक होने लगी.

लिहाज़ा कहा जा सकता है कि ये कोई ऐसी बीमारी नहीं है कि कभी ठीक ही ना हो पाए. अगर सही समय पर बीमारी पकड़ में आ जाए तो इसका इलाज भी संभव है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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