गंजा होने के अपने फ़ायदे भी हैं

  • 10 अक्तूबर 2016
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इंसान की खूबसूरती में चार चांद लगाने में बाल अहम किरदार निभाते हैं. लोग बालों को बचाने के लिए और उगाने के लिए तरह-तरह के नुस्खे भी अपनाते हैं. ऐसा नहीं है कि ये नुस्खे आज के ज़माने में ही अपनाए जा रहे हैं बल्कि पुराने वक़्त में भी लोग अपने बालों को बचाने के लिए तरह-तरह की तरक़ीबें आज़माते थे.

प्राचीन ग्रीस में ये माना जाता था कि सिर पर कबूतर की बीट करा लेने से गंजापन दूर हो जाता है. इसके अलावा मिस्र में भी हज़ारों साल पहले बाल बचाने और बढ़ाने के कई नु्स्खे आज़माने के सबूत मिले हैं. ऐसा ही एक तरीक़ा है जंगली चूहे की चमड़ी पर आने वाले कांटों को शहद में मिलाकर सिर पर लगाने का. दावा था कि ऐसा करने से गंजापन दूर हो जाता है.

आपको जानकर हैरानी होगी कि रोम के राजा जूलियस सीज़र ने भी अपने गंजेपन को दूर करने के लिए ना जाने कितने जतन किए थे. कहते हैं कि जब जूलियस सीज़र मिस्र की राजकुमारी क्लियोपेट्रा से मिले तो वो पूरी तरह गंजे थे. तब क्लियोपेट्रा ने सीज़र को गंजापन दूर करने का एक घरेलू नुस्खा बताया था.

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लेकिन अफसोस कोई नुस्खा जूलियस सीज़र के काम ना आ सका. लेकिन सीज़र ने एक अच्छा काम किया कि अपने पीछे के बालों को बढ़ाना शुरू कर दिया. फिर वही उनका स्टाइल बन गया. सुक़रात, नेपोलियन, अरस्तू, गांधी, चार्ल्स डार्विन, विंस्टन चर्चिल और शेक्सपियर जैसी बड़ी हस्तियां भी बालों की खूबरसूरती से महरूम थीं. सिर पार बाल उगाने की हसरत लिए ये सभी दुनिया से रुख़सत हो गए.

सालों बीत गए, लेकिन आज भी ज़माने में बहुत से लोगों के लिए ये फिक्र बनी हुई है. फ़र्क़ इतना पड़ा है कि अब हम घरेलू नुस्खों से आग बढ़ कर महंगे शैम्पू, क्रीम, टॉनिक, दवाओं और सर्जरी पर आ गए हैं. आज तरह-तरह के हेयर क्लिनिक खुल गए हैं. इनमें आप अपने गंजेपन का इलाज करा सकते हैं. इसके प्रचार के लिए बड़े-बड़े इश्तेहार भी लगाए जाने लगे हैं.

गंजेपन को एंड्रोजेनिक अलोपेसिया नाम देकर ऐसा प्रचार किया जाने लगा है, जैसे कि आपको कोई बहुत बड़ी बीमारी हो गई है. बालों को फिर से उगाने के लिए जो दवाएं इस्तेमाल की जाती हैं, उनके बहुत से नुक़सान भी होते हैं.

एक अंदाज़े के मुताबिक़ गंजेपन के इलाज के लिए पूरी दुनिया में हर साल क़रीब साढ़े तीन अरब डॉलर तक की रक़म ख़र्च की जाती है. मैसेडोनिया जैसे देश के लिए तो ये सालाना बजट के बराबर है. बिल गेट्स का कहाना है कि ये रक़म मलेरिया जैसी बीमारी पर क़ाबू पाने के लिए खर्च की जाने वाली रक़म से भी बड़ी है.

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बहरहाल, जिन लोगों के बाल खत्म होने लगे और चमचमाता सिर नज़र आने लगा है, उनके लिए ख़ुशख़बरी है. एक रिसर्च में पाया गया है कि गंजे लोग ज़्यादा समझदार, रसूख वाले होते हैं. वो लंबे समय तक जीते हैं. यहां तक कि गंजे लोगों में महिलाओं को लुभाने की क्षमता भी ज़्यादा होती है.

दरअसल लंबे वक़्त से गंजेपन को लेकर तरह-तरह की बातें होती रही हैं. ब्रूस विलिस जैसे सुपर माचो मैन का कहना है बाल गंवा देने के बाद आप मर्द नहीं रहते. हालांकि उनके सीने, टांगों और बगल में काफी बाल होते हैं. लेकिन एक दमदार मर्द होने के लिए सिर पर बालों का होना ज़रूरी है. समाज पर ये सोच पूरी तरह हावी है.

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गंजापन क्यों होता है इसे लेकर सबकी अपनी-अपनी राय रही है. अरस्तू का मानना था कि ये सेक्स की वजह से होता है. प्राचीन रोम में ज़्यादातर फौजियों के सिर पर बाल नहीं होते थे. इसके लिए मेटल के भारी हेलमेट को ज़िम्मेदार माना जाता था.

बाद में ऐसी थ्योरी भी सामने आईं कि गलत तरह से बाल कटाने या खुश्की आने की वजह से गंजापने आ जाता है. 1897 में एक फ्रेंच डर्मेटोलॉजिस्ट ने ये एलान कर दिया कि उसने गंजेपन के असली मुजरिम को पकड़ लिया है और वो मुजरिम है कंघा. लिहाज़ा जब भी कंघा इस्तेमाल किया जाए तो उसे पानी में उबालकर साफ़ कर लिया जाए. तभी इस्तेमाल किया जाए. जिसे गंजापन हो उसके कंघे को कोई और इस्तेमाल ही ना करे.

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तब से साइंस ने काफ़ी तरक़्क़ी कर ली है. आज हम सब जानते हैं कि गंजेपन की असल वजह, हमारे हारमोन टेस्टोस्टेरॉन में बदलाव से एक नया हारमोन डीहाइड्रोस्टेरॉन बनने की वजह से होता है.

कुछ लोगों में ख़ानदानी वजह से गंजापन होता है. 30 साल की उम्र तक आते आते 25 से 30 फ़ीसद मर्दों के बाल झड़ने लगते हैं. ये किसी खास मुल्क़, ज़ात या कौम में नहीं होता है, बल्कि सारी दुनिया में ऐसा होता है. लेकिन सवाल ये उठता है कि आख़िर मर्दों में ही गंजापन ज़्यादा क्यों होता है? और मर्द अपने बालों को लेकर आखिर इतने परेशान क्यों रहते हैं?

अमरीका के फ्लोरिडा स्थित बैरी यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक फ्रैंक मुस्कारेला इसमें सेक्स की संभावना देखते हैं. उनके मुताबिक बहुत-सी रिसर्च में पाया गया है कि जिन मर्दों के बाल नहीं होते उनकी तरफ़ औरतों का झुकाव कम होता है. क्योंकि उनमें महिलाओं को सेक्स अपील कम नज़र आती है. वो उन्हें बूढ़ा समझती हैं. लेकिन हाई प्रोफ़ाइल गंजे लोगों की तरफ़ महिलाएं बहुत जल्दी आकर्षित होती हैं.

2004 में मुस्कारेला ने एक तजुर्बा किया. उन्होंने कई तरह के लोगों की फोटो खिंचवाईं. जिसमें कम गंजे, पूरी तरह से गंजे और बालों वाले मर्द शामिल थे. फिर ये तस्वीरें मनोविज्ञान के छात्रों को दिखाए गए. जिसमें 101 लड़के और 101 ही लड़कियां शामिल थीं.

हैरत की बात ये रही है गंजे लोगों की फोटो को देख कर लोगों ने उन्हें ज़्यादा समझदार, ऊंचे तबक़े का, मददगार, ईमानदार और ज़्यादा पढ़ा लिखा माना.

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मुस्कारेला कहते हैं कि अगर बालों का होना इतना ही अच्छा होता तो आदि मानव के तो पूरे शरीर पर बाल ही बाल थे. लेकिन उसे पसंद और नापसंद का मामला तब आया जब उसके शरीर से बाल कम होने शुरू हुए. आज क्लीन शेव लुक ज़्यादा पसंद किया जाता है.

सदियों से साधु संत और विचारक सभी अपने बाल कटाते रहे हैं. बौद्ध और ईसाई भिक्षु तो और दो क़दम आगे चले गए हैं. गंजे लोगों के लिए एक बात और कही जाती है कि वो ज़्यादा प्रभावशाली होते हैं.

साथ ही ये भी कहा जाता है कि गंजा सिर ज़िंदगी भी बचाता है. बच्चों में प्रोस्टेट ग्लैंड पैदा करने के लिए डीहाइड्रोटेस्टोस्टेरॉन (DHT) जिम्मेदार होता है. जिससे बच्चों के घने बाल उगते हैं. लेकिन व्यस्क लोगों में यही DHT ट्यूमर भी पैदा करता है. जिससे प्रोस्टेट कैंसर होता है और हर साल करीब तीन लाख लोग इस बीमारी से मर जाते हैं.

शरीर के लिए विटामिन डी बहुत ज़रूरी है. ये सूरज की रोशनी के संपर्क में आने से शरीर को मिलता है और DHT को प्रभावित करता है. जिन लोगों के सिर पर बाल नहीं होते, उन्हें अपने सिर को इस रोशनी से बचाना पड़ता है.

क्योंकि उनके सिर पर रोशनी सीधे पड़ती है और अल्ट्रा वायलेट किरणों की वजह से उनमें प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना ज़्यादा बढ़ जाती है. औरतों के मुक़ाबले आदमी घर से बाहर रहकर काम ज़्यादा करते हैं इसीलिए उनका धूप से साबक़ा भी ज़्यादा पड़ता है.

औरतें शायद इसी लिए गंजी नहीं होतीं क्योंकि उनके प्रोस्टेट ग्रंथि नहीं होती. ये बात प्रोस्टेट ग्रंथि और DHT के बीच सीधा ताल्लुक़ होने का संकेत देती है.

वैसे गंजेपन के फ़ायदे भी हो सकते हैं. गंजे लोगों को ज़्यादा विटामिन डी मिलता है क्योंकि उन पर धूप का ज़्यादा असर होता है. हंगरी की इस्तवान यूनिवर्सिटी के पीटर कबाई कहते हैं कि हज़ारों साल पहले यूरोप के निवासियों को ज़्यादा धूप मिलती थी क्योंकि उनके बीच गंजेपन की तादाद अच्छी ख़ासी थी.

इस बात को एक तजुर्बे ने सही साबित किया है. प्रस्टेट कैंसर से पीड़ित लोगों को विटामिन डी की डोज़ दी गई. कुछ लोगों को नक़ली तौर पर विटामिन डी दिया गया.

साठ दिनों बाद इन लोगों की प्रोस्टेट ग्रंथि हटा दी गई. जिन लोगों को विटामिन डी की गोलियां दी गई थीं, उनके कैंसर के ट्यूमर घट गए थे. जिनको नक़ली दवाएं दी गई थीं, उनके साथ ऐसा नहीं हुआ. साफ़ है कि गंजे लोगों को प्रोस्टेट कैंसर होने का ख़तरा ज़्यादा है. वैसे गंजेपन का प्रोस्टेट ग्रंथि के कैंसर से सीधा ताल्लुक़ अभी तक साबित नहीं हो सका है.

कुल मिलाकर ये कहें कि गंजे होकर मर्द विकास की राह में तेज़ी से आगे बढ़ते हैं तो ग़लत नहीं होगा. उन्हें अच्छी गर्लफ्रैंड मिलने में गंजापन मददगार हो सकता है. तो अब गंजापन दूर करने के लिए कबूतर की बीट लगाना छोड़ दीजिए. गंजे भी स्मार्ट होते हैं.

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