कैसे महज़ कुछ जुमले दिला देते हैं बड़ी कामयाबी

  • 23 अक्तूबर 2016
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हर किसी की ज़िंदगी और हरेक समाज में कुछ कमियां और बुराइयां होती हैं. लेकिन छोटी सी कोशिश के ज़रिए इनमें सुधार लाया जा सकता है. बहुत बार सुधार के लिए किए गए काम ही उल्टे पड़ जाते हैं.

अब आप सोच रहे होंग भला ये कैसे मुमकिन है. हैरान ना हों हम आपको तफ़सील से बताएंगे ये कैसे मुमकिन है. चलिए सबसे पहले आपको एक तजुर्बे के बारे में बताते हैं.

बात 1970 की है. अमरीका 'जुर्म की महामारी' से ग्रस्त था. लिहाज़ा इस माहामारी पर क़ाबू पाने के लिए न्यू जर्सी राज्य की पुलिस ने एक तजुर्बा किया, जिसके तहत ऐसे बच्चों को जो जुर्म की राह पर बढ़ रहे थे, जेल में ले जाकर क़ैदियों से मिलवाया गया.

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ये वो खूंखार क़ैदी थे जो उम्र क़ैद की सज़ा काट रहे थे. उन पर संगीन जुर्म साबित हो चुके थे. ये तजुर्बा राहवे जेल में किया गया था.

पुलिसवालों ने इस तजुर्बे को 'स्केयर्ड स्ट्रेट' नाम दिया था. मतलब सीधे डराना. इसे इतनी शोहरत मिली कि बाद में और अमरीकी सूबों में भी यही नुस्खा अपराध कम करने के लिए आज़माया गया.

इसके अलावा ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा, और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी इसी तरह के प्रयोग किए गए. अपराध पर क़ाबू पाने के लिए ये एक सस्ता और सटीक तरीक़ा माना गया.

ये प्रयोग देखने में तो अच्छा था. मगर कितना कारगर हुआ, ये किसी ने नहीं जांचा-परखा. ज्ञान बढ़ाने वाला तजुर्बा था. 1982 में 'स्केयर्ड स्ट्रेट' तजुर्बे को परखने के लिए एक स्टडी की गई. पता चला न्यू जर्सी पुलिस का ये प्रयोग बुरी तरह नाकाम रहा है.

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इससे युवाओं का झुकाव जुर्म की तरफ़ कम नहीं हुआ, बल्कि कई मामलों में तो बढ़ गया. क्योंकि क़ैदियों से मिलने के बाद उन कम उम्र क़ैदियों के हौसले में इज़ाफ़ा हुआ.

इसी तरह सीट बेल्ट के इस्तेमाल के लिए लोगों को बढ़ावा देने का फार्मूला भी बेमानी ही साबित हुआ. करीब 18 देशों में पाया गया कि सीट बेल्ट का इस्तेमाल करने के बाद एक्सिडेंट का ग्राफ ज़्यादा बढा. क्योंकि लोगों को लगा कि हमने तो सीटबेल्ट बांध ली है, हमें तो कुछ होगा नहीं. तो, उन्होंने ज़्यादा लापरवाही से ड्राइव करना शुरू कर दिया.

ब्रिटिश सरकार की 'नज यूनिट' में काम करने वाले माइकल हॉल्सवर्थ कहते हैं कि कई बार अच्छाई के लिए किए गए काम उल्टे पड़ जाते हैं. हमें लगता है कि लोग सारी जानकारियों और नफ़े-नुक़सान को ज़ेहन में रखकर हरेक विकल्प के बारे में सोचते हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है. लोगों को अगर नफ़े-नुक़सान का अंदाज़ा हो जाता है तो, वो बेअंदाज़ हो जाते हैं.

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हालांकि, माना यही जाता है कि छोटी-छोटी कोशिशों से हम बड़े बदलाव ला सकते हैं. मसलन अमरीका में छात्रों को पढ़ाई के लिए उत्साहित करने के लिए उन्हें छोटी-छोटी बातों से समझाया गया. सिर्फ़ एक घंटे का अभ्यास कराने से क़रीब तीन साल तक उनके इम्तिहान के नतीजे बेहतर आते रहे.

इसी तरह अमरीका में हुए एक और तजुर्बे में पाया गया कि केवल सवाल पूछने का तरीक़ा बदलने से क़रीब दस फ़ीसद लोग, चुनाव में वोट करने के लिए तैयार हो गए.

ये इसलिए अहम है कि इस साल के अमरीकी चुनाव में चार अरब डॉलर सिर्फ़ टीवी के विज्ञापनों पर ख़र्च किए गए हैं. लेकिन अभी ये पता चलना बाक़ी है कि जिन लोगों ने ये विज्ञापन देखे उनमें से कितने इनके असर से वोट करने जाएंगे?

इन छोटी-छोटी कोशिशों को नजेस (nudges) कहते हैं. मतलब किसी पर ज़ोर-ज़बरदस्ती करने के बजाय उसे हल्का सा इशारा करना.

अब जैसे, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने 2010 में कई 'नज यूनिट' बनाई थी. इनमें वैज्ञानिक, मनोविज्ञानिक, नीति विशेषज्ञ और अर्थशास्त्रियों को शामिल किया गया था. इनकी मदद से ब्रिटेन में शिक्षा, सेहत और सरकारी ख़ज़ाने की हालत सुधारने की कोशिश की गई.

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कहते हैं कि ज़िंदगी में दो ही बातें सच हैं, मौत और टैक्स. फिर भी लोग वक़्त पर टैक्स नहीं भरते. ब्रिटेन में देखा गया था कि आख़िरी वक़्त बीतने के बाद भी लोग अपने टैक्स जमा नहीं करते थे.

सरकार के सामने सवाल ये था कि ऐसे लोगों से कैसे, टैक्स भराया जाए?

बहुत पुराने ज़माने से लोग ऐसा करते आए हैं. कहते हैं कि रोमन साम्राज्य में लोग टैक्स देने से बचने के लिए पड़ोसी राज्य कॉन्सटैन्टीनोपल चले जाते थे. क्योंकि वहां टैक्स में रियायत मिलती थी.

बहुत से रोमन तो टैक्स भरने के डर से ही साधु हो जाते थे. ब्रिटेन में आज भी टैक्स अदा नहीं करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है. लेकिन फिर भी लोगों पर क़रीब 34 अरब पाउंड का टैक्स बकाया था.

बहरहाल ब्रिटेन ने अपने शहरियों से टैक्स वसूलने के लिए बहुत से तरीके अपनाए. लोगों को चिट्ठियां और ई-मेल भेजकर याद कराया गया कि उन्हें टैक्स भरना है. रेडियो से संदेश दिये गए. टीवी पर विज्ञापन देकर लोगों से टैक्स भरने की अपील की गई. लेकिन ये सभी तरीक़े असर छोड़ने में नाकाम रहे.

फिर, ब्रिटिश सरकार ने 2011 में एक और तरीक़ा अपनाया. भाषा में थोड़ा सा सुधार करके करीब एक लाख लोगों को एक बार फिर से खत भेजे गए. इसमें लोगों से पूछा गया कि वो ख़ुद बताएं कि उन पर कितना टैक्स बकाया है.

इसके बाद उन्हें ये समझाने की कोशिश की गई कि उनके टैक्स न भरने से सरकार विकास के काम नहीं कर पा रही है. अस्पतालों और स्कूलों का निर्माण नहीं हो पा रहा है.

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दरअसल ऐसे मक़रूज़ लोगों को अलग अलग ग्रुप में बांट लिया गया था और हरेक ग्रुप को अलग तरह का खत सौंपा गया था. किसी को एक जुमले का ख़त दिया गया तो किसी को साधारण सी चिट्ठी सौंपी गई.

मकसद एक ही था कि ज्यादा से ज़्यादा लोग टैक्स अदा करें. नतीजा ये रहा कि टैक्स अदा करने वालों की संख्या में 1.6 फीसद का इज़ाफ़ा हुआ.

ये इंसान की फ़ितरत है वो भीड़ से अलग होने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. लेकिन जब लोगों को ये एहसास दिलाया गया कि उनके आस पास के ज़्यादातर लोगों ने टैक्स अदा कर दिया है, और वो उनसे अलग नहीं हैं तो अचानक ही तेज़ी के साथ लोगों ने टैक्स खुद ही अदा करना शुरू कर दिया.

सबसे दिलचस्प बात ये रही कि जिन लोगों को सिर्फ एक जुमले वाला खत सौंपा गया था. उनके खत के मजम़ून में 26 अल्फ़ाज़ जोड़े गए थे. लेकिन सिर्फ 23 दिन में ही 15 फीसद ज़्यादा लोगों ने टैक्स अदा किया.

जब इन खतों को पूरे ब्रिटेन में सभी नागरिकों को सौंपा गया तो पहले ही साल में सरकारी ख़ज़ाने में 21 करोड़ पाउंड ज़्यादा टैक्स जमा हुआ.

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रिसर्चर की टीम ने चिट्ठियों की इस तकनीक का इस्तेमाल दूसरी और भी बहुत सी परेशानियों का हल तलाशने में किया. जैसे डॉक्टर धड़ल्ले से लोगों को एंटी-बायोटिक का इस्तेमाल करने के लिए कहते थे.

जबकि सच ये है कि अगर बहुत ज़्यादा एंटी- बायोटिक का इस्तेमाल किया जाए तो उनका असर कम हो जाता है. लोगों को ख़तों के ज़रिए ही ये बात समझाने की कोशिश की गई.

जब लोगों को जानकारी हुई तो उसी साल सर्दी के मौसम में डॉक्टर्स ने एंटी-बायोटिक का इस्तेमाल लोगों से कम करने को कहा. सरकार की कोशिश से एंटी-बायोटिक के इस्तेमाल में साढ़े तीन फ़ीसद की कमी आ गई.

बहरहाल, ब्रिटेन में हुई इस कामयाब कोशिश को अब कई और देश आज़मा रहे हैं. 2016 तक अमरीका, जर्मनी, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में भी सरकारों ने ब्रिटेन की ही तरह 'नजेस यूनिट' बनाई हैं. ताकि हल्के इशारों से लोगों की राय बदल सकें.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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