झूठे लोग सच का भ्रम कैसे पैदा करते हैं?

  • टॉम स्टैफ़र्ड
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जोसेफ़ गोयबल्स

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जोसेफ़ गोयबल्स जैसे लोगों के हाथों में सच का भ्रम ख़तरनाक साबित हो सकता है

हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ़ गोयबल्स की एक बात बड़ी मशहूर है. गोयबल्स ने कहा था कि किसी झूठ को इतनी बार कहो कि वो सच बन जाए और सब उस पर यक़ीन करने लगें.

आप ने भी अपने आस-पास ऐसे लोगों को देखा होगा, जो बहुत ही सफ़ाई से झूठ बोल लेते हैं. वे अपना झूठ इतने यक़ीन से पेश करते हैं कि वह सच लगने लगता है. हमें लगता है इंसान इतने भरोसे से कह रहा है, तो बात सच ही होगी.

हमारे इस ख़याल को मनोवैज्ञानिक सही नहीं मानते. वे इसे सच का भ्रम मानते हैं. इसे साबित करने के लिए रिसर्चर्स ने एक प्रयोग किया.

इस प्रयोग में जो लोग शामिल हुए उनमें से कुछ ने सच के समानांतर एक और बात को सही माना जो सच नहीं थी. यह कहा जाए कि बेर एक तरह के सूखे हुए आलू बुखारे हैं. यह बात कई बार सच भी हो सकती है.

लेकिन अगर यह कहा जाए कि एक खजूर सूखा हुआ आलू बुखारा है तो यह सच नहीं हो सकता. क्योंकि खजूर कभी सूखा हुआ आलू बुखारा हो ही नहीं सकता. लेकिन अगर इस बात को बार बार कहा जाए तो हो सकता है कि लोग इसे ही सच समझने लगें.

जो लोग एस प्रयोग में शामिल हुए थे, उनके साथ यही बाद बाद में फिर से दोहराया गया. लेकिन इस बार उन्हें कुछ चीज़ें नई दिखाई गईं. कुछ चीज़ें वही थीं जो पहले भी दिखाई जा चुकी थी. दिलचस्प बात यह थी कि जो चीजें पहले दिखाई गई थी, उन्हीं को इन प्रतिभागियों ने सही माना, इस बात कि परवाह किए बिना कि वो सच हैं भी या नहीं.

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वे ऐसा शायद इसीलिए कर पाए क्योंकि वे उन चीज़ों को पहले भी देख चुके थे. इसलिए उन्हें लगा यही सच है. लिहाज़ा प्रयोगशाला में किए गए इस प्रयोग से यह बात तो साबित हो जाती है कि अगर झूठ को बार बार बोला जाए, वह सच बन जाता है.

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अगर हम अपने आस-पास देखें तो विज्ञापन बनाने वालों से लेकर राजनेता तक सभी इंसान की इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाते हैं. वे एक ही बात इतनी बार कहते हैं कि लोगों को वह सच लगने लगती है.

प्रयोगशाला में किए गए इस प्रयोग पर अगर भरोसा कर भी लिया जाए तो किसी शख़्स को अपनी बात मनवाने के लिए इतने जतन करने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? क्यों अपनी बात मनवाने के लिए उसे तरह तरह के तरीक़े अपनाने पड़ते हैं?

हमारे पूर्व ज्ञान के साथ हमारे सच का भ्रम कैसे काम करता है, यह जानने के लिए हाल ही में वांडरबिल्ट यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर लिज़ा फैजियो और उनकी टीम ने एक टेस्ट किया. इस काम के लिए उन्होंने कुछ सच और कुछ झूठे बयानों का सहारा लिया.

इन सभी बयानों को प्रतिभागियों के मुताबिक़ अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया गया, जैसे प्रशांत महासागर दुनिया का सबसे बड़ा महासागर है. यह एक ऐसी बात है जिसे हर कोई सच मानता है. यह बयान कि अटलांटिक महासागर दुनिया का सबसे बड़ा महासागर है, झूठा बयान है. लेकिन हो सकता है लोग इसे ही सच मान बैठें.

इस टेस्ट के नतीजे बताते हैं कि झूठ के आगे हमारा पूर्व ज्ञान भी किसी काम नहीं आता. सच का भ्रम उस पर भी हावी हो जाता है.

लेकिन लिज़ा इस बात से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखतीं. उनका कहना है कि अगर इस बात को सच मान लिया जाए कि बार-बार झूठ बोलने से वह सच बन जाता है तो यह इंसान की तार्किक क्षमता पर सवालिया निशान लगाता है.

किसी बात का बार-बार दोहराया जाना सच पर हावी नहीं हो सकता. कुछ प्रयोगों में पाया गया है कि जो बात सच थी लोग उस पर क़ायम रहे. उनके सामने बहुत बार एक ही बात को दोहराया गया.

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ज्ञान के आधार पर 'सच के भ्रम' का सामना किया जा सकता है

झूठ हमारी पुख़्ता जानकारी पर असरअंदाज़ नहीं हो सकता. किसी झूठ के सच में तब्दील होने की गुंजाइश तभी होती है जब जानकारी में झोल होता है, या खुद अपने आप पर यक़ीन कमज़ोर होता है.

अगर किसी बात का दोहराया जाना इतना ताक़तवर है कि वह हमारे सोचने और समझने की ताक़त पर असर कर सकता है तो हमारे लिए मुश्किल बढ़ सकती है. हमें अपनी तार्किक शक्ति को मज़बूत करना होगा.

लेकिन हमें इस बात का भी ख्याल रखना होगा कि हमारे पास इसके ज़रिए बहुत कम हैं. हमारा ज़हन सच के भ्रम का शिकार है. हमारा दिमाग़ जल्दी से जल्दी किसी नतीजे पर पहुंचना चाहता है, इसलिए ज़हन को अगर लगता है कि यह बात मुमकिन हो सकती है, उसकी बुनियाद पर ही वह फ़ैसला कर लेता है. अपनी तार्किक शक्ति का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल वह नहीं करता.

कई बार हमारे अंदाज़ सही साबित हो जाते हैं, लेकिन कभी कभी ये हमें गुमराह भी कर देते हैं. इसलिए रिसर्चर इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि अगर कोई बात कही जाए तो इसके पक्ष में मज़बूत दलील भी दी जाए ताकि दावों की सच्चाई का पता लगाया जा सके.

कोई दावा इसलिए लोगों का यक़ीन ना बन जाए कि वो बार बार कहा जा रहा है. बल्कि उसकी कोई ठोस दलील हो.

हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां सच सबसे ऊपर है और होना भी चाहिए. अगर सच और झूठ का फ़र्क़ किए बिना सिर्फ़ अपनी बात मनवाने के लिए कोई बात बार-बार दोहराई जाए तो यह इंसानियत के लिए सही नहीं है.

अगर आप ऐसा करते हैं तो आप एक ऐसी दुनिया बना रहे हैं जहां झूठ और सच का फ़र्क ही मिट जाएगा. लोग गुमराह होने लगेंगें. इसलिए ज़रूरी है कि किसी भी बात पर यक़ीन करने के बजाय उसे हर तरह से जांच-परख लें.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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