समंदर पर शहर बसाने के क्या हैं खतरे?

  • बियांका नॉग्रेडी
  • बीबीसी फ्यूचर
दुबई में समंदर पर बसाया गया जजीरा

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दुबई में समंदर पर बसाया गया जजीरा.

दुनिया की तेज़ी से बढ़ती आबादी के लिए रिहाइश की जगह चाहिए. फिर, तमाम लोग शहरों की तरफ़ जा रहे हैं. शहरों का दायरा बढ़ रहा है. नई बस्तियां बस रही हैं. ऐसे में उन शहरों के लिए दिक़्क़त होती है, जो समंदर के किनारे बसे हैं. उनके बढ़ने की राह में समंदर आड़े आ जाता है.

मगर, इंसान के लिए अब ये भी कोई मुश्किल नहीं. आज बहुत से ऐसे शहर हैं जो अपना दायरा बढ़ाकर समंदर के सीने पर नई इमारतें और बस्तियां बसा कर रहे हैं. सिंगापुर ने तो पिछले 50 सालों में समंदर में अपने कुल इलाक़े का 22 फ़ीसद दायरा बढ़ा डाला है. दुबई भी समंदर पर क़ब्ज़े की दूसरी बड़ी मिसाल है.

नीदरलैंड, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी समंदर की हद के भीतर जाकर इंसान के रहने का इंतज़ाम किया जा रहा है. कुछ योजनाओं पर काम चल रहा है. वहीं, कुछ का प्लान तैयार है. चीन में समंदर किनारे बसे कमोबेश हर शहर में समंदर से ज़मीन वापस छीन लेने की कोशिश हो रही है.

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दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाने की चीन की कोशिश पर विवाद जारी है.

इंसान ने समंदर के क़ब्ज़े वाली ज़मीन छीनने का काम तब से शुरू कर दिया था, जब से उसने बंदरगाह बनाने शुरू किए. मिट्टी, रेत और कंकड़-पत्थर डालकर समंदर के सीने पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है. कई जगह नदियों का पानी रोककर, सिल्ट जमा होने दी जाती है. जिससे समंदर का पानी पीछे हट जाए और खुली ज़मीन का इंसान इस्तेमाल कर सके.

दुबई में तो नक़ली टापू बनाकर उस पर शानदार इमारतें बना दी गई हैं. जैसे दुबई का पाम जुमैरा. जहां पर बहुत रईस लोग रहते हैं. कहते हैं कि ये ज़जीरा 11 करोड़ क्यूबिक मीटर रेत और मिट्टी से तैयार किया गया है.

इसी तरह, यूरोपीय देश नीदरलैंड में बरसों से समंदर किनारे धीरे-धीरे ज़मीन का दायरा बढ़ाया जा रहा है. वजह ये कि नीदरलैंड निचली ज़मीन पर बसा है. ऐसे में दलदली इलाक़ों को पाटकर बस्तियां बसाने के लिए नई ज़मीन तैयार की जा रही है. ताकि तेज़ी से बढ़ती आबादी के लिए मकान का इंतज़ाम हो सके.

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समंदर में निर्माण कार्य से इसकी पारिस्थितिकी पर भी असर पड़ सकता है.

मगर अपनी ज़रूरतों के लिए समंदर को चुनौती देने वाला इंसान, बाक़ी जीवों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है. साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी की एमा जॉन्सटन कहती हैं कि समंदर में इंसान के दखल से उसके जीवों पर बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है. बहुत से नदियों के मुहाने पर रहने वाले जीव-जंतुओं की नस्लें खत्म होने के कगार पर पहुंच गई हैं.

एमा बताती हैं कि यूरोप, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में समंदर किनारे के कई शहर काफ़ी दूर तक लहरों के भीतर तक पहुंच गए हैं. अब तो पानी के अंदर भी रहने के इंतज़ाम किए जा रहे हैं. इनसे समंदर के जीवों को भारी नुक़सान हो रहा है. मूंगे की चट्टानों, दूसरे छोटे जीवों को इंसानी दखल का खामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है.

दूसरी परेशानी ये है कि मिट्टी और रेत डालकर, जो ज़मीन तैयार की जा रही है, उसकी बुनियाद कमज़ोर है. उसके धंसने का डर होता है. जैसे कि दुबई के पाम जुमैरा द्वीप के बारे में कहा जा रहा है कि वो धंस रहा है. दूसरा डर ये है कि समंदर के अंदर की ज़मीन हिलेगी तो उससे भूकंप आने का डर रहता है.

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दुनिया के कई हिस्सों में सागर पर कॉलनियां बसाई गई हैं. ये तस्वीर पेरु की है.

1906 में आए ऐसे ही ज़लज़ले ने अमरीका के सैन फ्रांसिस्को में भारी तबाही मचाई थी. समंदर पर क़ब़्ज़े की होड़ में सियासी रंग भी मिलने लगा है. अब जैसे कि दक्षिणी चीन सागर में चीन का रेत, मिट्टी और कंकड़-पत्थरों से दक्षिणी चीन सागर में एक बनावटी द्वीप बनाना. इस पर चीन सैनिक अड्डा बना रहा है. दूसरे देशों को इस पर ऐतराज़ है.

वो दक्षिणी चीन सागर पर चीन के दावे को ही नहीं मानते. अभी जुलाई में ही एक अंतरराष्ट्रीय पंचायत ने दक्षिणी चीन सागर पर चीन के दावे को ग़लत ठहराया था. कई जानकार सलाह देते हैं कि समंदर में मिट्टी-बालू डालकर क़ब्ज़ा करने के बजाय तैरती हुई बस्तियां बसानी चाहिए. बहुत से देशों में ऐसे तजुर्बे किए भी गए हैं.

जैसे कि कंबोडिया में तोन्ले सैप नाम की झील पर तैरती बस्तियां बसाई गई हैं. नीदरलैंड और इटली में भी ऐसे प्रयोग कामयाबी से किए गए हैं. हालांकि तैरते हुए मकान बनाने का काम बहुत ही छोटे पैमाने पर हो रहा है. ये तेज़ी से बढ़ती आबादी की ज़रूरतें पूरी करने के लिए नाकाफ़ी है.

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वेनिस इसका एक अच्छा उदाहरण है.

जेम्स बॉन्ड की फ़िल्म में तो बरसों पहले समुद्र के भीतर इंसान के रहने का इंतज़ाम दिखाया गया था. आज वो हक़ीक़त में तब्दील हो रहा है. सबसे पहले 1962 फ्रांस में मार्सेल शहर के किनारे समंदर के भीतर इंसान के रहने का इंतज़ाम किया गया था. जिसमें दो लोग रह सकते थे.

इसके बाद 1965 में लाल सागर के अंदर क़रीब सौ मीटर की गहराई में लोगों के रहने के लिए जगह बनाई गई थी. यहां पर टीवी देखने से लेकर लाइब्रेरी तक का इंतज़ाम था. इसके बाद फ्रांस के नीस शहर में ही छह लोगों के रहने के लिए एक समुद्री मकान बनाया गया था.

इसी तरह नासा ने समंदर के भीतर अपनी समुद्री प्रयोगशालाएं बनाई थीं. इनके नाम टेकटिटे वन और टू थे. साथ ही, अमरीकी नौसेना ने सीलैब नाम से समंदर के भीतर एक प्रयोगशाला बनाई थी. फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी तो अभी भी फ्लोरिडा के तट के पास समुद्र के भीतर अपनी एक लैब चलाती है. इसका नाम अक्वारियस है.

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कम्बोडिया का रलाउ द्वीप.

समुद्र के भीतर कई और आलीशान इमारतें बनाने की योजनाओं पर काम हो रहा है. ऑस्ट्रेलिया, दुबई, अमरीका और दक्षिणी प्रशांत महासागर में ऐसी कई योजनाओं पर काम हो रहा है. ऑस्ट्रेलिया में मशहूर ग्रेट बैरियर रीफ़ के पास वाटर डिसकस के नाम से होटल बनाने की योजना है.

इसमें समुद्र के भीतर और बाहर, दोनों तरफ़ डिस्कनुमा चीज़ें होंगी. हालांकि इसका, समुद्री जीवों पर क्या असर होगा, कहना मुश्किल है.

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