ख़राब मौसम की वजह से पैदा होती हैं बेटियां!

  • ज़ारिया गॉरवेट
  • बीबीसी फ़्यूचर
दंपत्ति

किसी जोड़े को खुशखबरी मिलती है कि उनके आंगन में किलकारी गूंजने वाली है तो कई ये कोशिश करते हैं कि किसी टेस्ट के ज़रिए ये पता चल जाए कि बेटा होगा या बेटी!

ऐसा इसलिए क्योंकि ज़्यादातर लोग बेटे की ख्वाहिश रखते हैं.

इतिहास पर नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि लगभग सभी समाज पुरूष प्रधान रहे हैं. इसलिए दुनियां में बेटे की चाहत ज़्यादा मज़बूत रही है.

कई समाज में तो बेटे के जन्म के बाद परिवार में औरत का मुक़ाम भी बदलता नज़र आता है.

पुराने ज़माने बेटा पैदा करने के लिए तरह-तरह के टोटक और नुस्खे आज़माए जाते थे, और अभी भी बहुत सारे समाज में आज़माए जाते है.

ग्रीस में ऐसे कई नुस्खों चलन था. जैसे यौन संबंध बनाते वक़्त मर्द पूरब की तरफ़ मुंह करके रहें.

बड़े-बूढ़े कहते रहे हैं औलाद मां के नसीब से होती है. और, किसी औरत के नसीब को चुनौती नहीं दी जा सकती.

बेटे और बेटी के जन्म को लेकर तरह-तरह की मान्यताएं हैं. जैसे कुछ का मानना है कि ख़राब मौसम की वजह से ज़्यादा बेटियां पैदा होती हैं. या, रमज़ान में रोज़े रखने के दौरान अगर गर्भधारण किया जाता है तो लड़की पैदा होती है.

वहीं जो रसूख वाले घराने की औरतें होती हैं उनके बेटे ज़्यादा पैदा होते हैं. या जो औरतें सुबह का नाश्ता अच्छा लेती हैं, वो भी ज़्यादातर बेटे को जन्म देती हैं.

लेकिन ये सब मान्यताएं ही हैं.

बेटा या बेटी होने की असल वजह क्या है पुख्ता तौर पर कह पाना मुश्किल है.

दुनिया में सौ लड़कियों पर 109 लड़कों का अनुपात है. दरअसल मर्दों का इम्यून सिस्टम लड़कियों के मुक़ाबले कमज़ोर होता है. उन्हें ख़तरनाक बीमारियां जल्दी हो जाती हैं.

इसके अलावा हादसों में उनकी मौत भी ज़्यादा होती है और लड़के खुदकशी भी जल्दी कर बैठते हैं. लड़कों में जुर्म करने की आदत भी ज़्यादा होती है. शायद इसलिए एक तिहाई मर्दों का क़त्ल हो जाता है.

इंसानों में औरत और मर्द का अनुपात बराबर क्यों नहीं है?

ये पता लगाने के लिए एक ख़ास तरह कि समझ की ज़रूरत थी. इस समझ का मुज़ाहरा किया जमैका के रॉबर्ट ट्राइवर्स ने. रॉबर्ट ने कई इतिहास से लेकर गणित तक कई विषयों में हाथ आज़माया. यहां तक कि उन्होंने अपना गैंग भी बना लिया था. जुर्म के चलते रॉबर्ट को जेल भी जाना पड़ा. उनके यूनिवर्सिटी में घुसने पर भी रोक लगा दी गई थी.

ऐसे बदनाम वैज्ञानिक रॉबर्ट ने 1972 में रॉबर्ट ने अपने साथी डैन विलार्ड के साथ मिलकर एक थ्योरी ईजाद की.

इसका नाम ट्राइवर्स-विलार्ड हाइपोथीसिस पड़ा. ये थ्योरी कुछ इस तरह से काम करती है. फ़र्ज़ कीजिए आप अपने बच्चे का लिंग चुन सकते हैं. अगर वो लड़का है तो हो सकता है बहुत बड़ा बिज़नेसमेन बन जाए. या अमरीका का राष्ट्रपति बन जाए. उसके पास बुहत सी गर्लफ्रैंड चुनने का इख्तियार हो सकता है.

ये एक वैज्ञानिक सच्चाई है कि रसूख़ और पैसे वाले मर्द औरतों को ज़्यादा लुभाते हैं.

अगर आपके बेटे में वो दम है तो समझिए कि आपका बेटा कामयाब हो गया. और अगर वो समाज में अपनी जगह नहीं बना पाया तो हो सकता है उसे ज़िंदगी बिताने के लिए कोई साथी भी ना मिले. जबकि महिलाओं के साथ ऐसा नहीं है. उन्हें कोई भी साथी आसानी से मिल जाता है. वो मर्द के लिए उसके वंशज पैदा कर सकती हैं.

ट्राइवर्स की थ्योरी के मुताबिक़ रईसों के लड़के ज़्यादा होते हैं.

इस थ्योरी में एक और बात पर खास ज़ोर दिया गया कि जिसके पास भरपूर संसाधन हैं वो सेक्स के लिए बहुत सी महिलाओं को साथ रख सकता है और खूब बच्चे पैदा कर सकता है.

लेकिन जिसके पास संसाधन नहीं हैं वो एक साथी भी तलाशने में नाकाम हो सकता है. इसके अलावा लड़कियों के मुक़ाबले लड़कों को खाना भी ज़्यादा चाहिए होता है.

कुछ समाज ऐसे भी हैं जहां लड़कों को ज़्यादा पैसा और तालीम दी जाती है.

मां-बाप भी समाज में लड़के को ही रसूख वाला बनाना चाहते हैं. लिहाज़ा उस पर ख़र्च भी भरपूर किया जाता है.

ऐसे में ट्राइवर्स की थ्योरी कहती है कि जो मां-बाप बच्चों की अच्छी परवरिश कर सकते हैं. जो समाज में ऊंचा मक़ाम रखते हैं, उनके बेटे भी ज़्यादा होते हैं. और जो ऐसा नहीं कर पाते उनके बेटियां ज़्यादा होती हैं.

1958 में चीन में एक प्रोजेक्ट की शुरूआत की गई. इसका नाम था द ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड. इसके तहत किसानों को उनके खेत छोड़ने को कहा गया ताकि चीन को कृषि प्रधान देश से औद्योगिक मुल्क बनाया जा सके.

चीन की सरकार का इरादा स्टील के उत्पादन में तीस फ़ीसद का इज़ाफ़ा करना था. इसके लिए ट्रैक्टर से लेकर बर्तन तक पिघला दिए गए. ताकि स्टील का उत्पादन बढ़ जाए.

लेकिन इस वजह से चार सालों में ही चीन में अकाल पड़ गया. क्योंकि फ़सलों की पैदावार लगातार कम होती गई. इस अकाल में चीन के साढ़े चार करोड़ लोगों की मौत हो गई.

इस सूखे के क़रीब 40 साल बाद अमरीकी अर्थशास्त्री डगलस ऑमंड ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक स्टडी की. सूखे के फौरन बाद जो बच्चे पैदा हुए थे और जो बच्चे इस सूखे के लंबे समय के बाद पैदा हुए थे उनके बीच तुलना की गई.

कुछ इलाक़े ऐसे थे जहां इस सूखे का असर ज़्यादा था और कुछ पर कम. लिहाज़ा तुलना करना आसान था.

स्टडी में पाया गया कि जिन इलाक़ों में सूखे का असर ज़्यादा था वहां के लोग कम पढ़े लिखे थे और उनके लड़कियां ज़्यादा पैदा हुईं.

जबकि जिन इलाक़ों पर सूखे का असर कम था वहां लोगों के पास रोज़गार भी था. वो छोटे घरों में किसी तरह गुज़ारा कर रहे थे. उन्हें जीवन साथी भी मिल गया था.

इस सूखे का असर उनके बच्चों पर भी पड़ा था. 1965 के बाद से अब तक चीन में लड़के और लड़की का अनुपात ठीक नहीं हो पाया है. आज भी सौ लड़कियों पर 104 लड़के हैं.

एक अंदाज़े के मुताबिक़ 2030 तक चार चीनी लड़कों में से एक लड़के को कोई साथी नहीं मिल पाएगा. इसकी वजह से कुंवारे लड़कों में निराशा और जुर्म करने की सोच पनपने लगेगी.

हमें अब पता है कि किसी मुसीबत के हालात में महिलाएं लड़कियों को ज़्यादा जन्म देती हैं. और वो महिलाएं जिन्हें अच्छी ख़ुराक और माहौल मिलता है, वो बेटों को जन्म देती हैं.

अमरीकी वैज्ञानिक कीथ बॉवर्स कहते हैं कि क़ुदरत, औरतों के मुक़ाबले मर्दों को तरजीह देती है. मगर, जब कम लड़कियां होंगी तो मर्दों को साथी कम मिलेंगे. जिससे दूसरी दिक्क़तें पैदा होंगी.

लेकिन दोनों लिंगो का अनुपात एक वक़्त के बाद कमोबेश बराबर हो जाता है और इतना नहीं बिगड़ता जैसा हम चीन में देख रहे हैं.

तो, बेहतर होगा कि तमाम नुस्खों और टोटकों से बचा जाए. क्योंकि बेटा होगा या बेटी, इसके चांस आधे-आधे ही हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीबी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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