तलाक़ के बाद सवाल पहचान का

  • क्रिश्चियन जैरेट
  • बीबीसी फ़्यूचर
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इंसानी समाज मर्द और औरत दोनों से मिलकर बनता है. एक दूसरे के साथ इन दोनों के रिश्तों के बहुत से नाम भी हैं. जैसे मां-बेटे का रिश्ता, भाई-बहन का रिश्ता, गर्ल फ़्रेंड-बॉय फ़्रेंड का रिश्ता, मियां बीवी का रिश्ता वगैरह.

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इन सब रिश्तों में मियां-बीवी का रिश्ता ऐसा है कि अगर लंबे वक़्त तक ये दोनों साथ रहें तो वो एक दूसरे की पहचान बन जाते हैं. दोनों के मिज़ाज और किरदार की बहुत सी ख़ूबियां एक दूसरे से जुड़ जाती हैं. दोनों की ख़ासियतें एक दूसरे से इतनी मिलने लगती हैं कि कई बार वो ख़ुद हैरान रह जाते हैं, अपने अंदर आए बदलाव को देखकर.

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अब सवाल ये है, कि अगर एक साथ रहते-रहते अगर दो लोग एक दूसरे का आईना बन जाते हैं. तो, एक दूसरे से अलग होने पर भी क्या उनकी शख़्सियत पर इसका असर पड़ता है. जानकार इस सवाल का जवाब 'हां' में देते हैं.

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शोधकर्ताओं के मुताबिक़ कुछ हद तक इसका असर पड़ता है लेकिन ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप लड़के हैं या लड़की. वर्ष 2000 में प्रकाशित हुई एक स्टडी के मुताबिक़ तलाक़ का असर मर्द और औरत दोनों पर अलग-अलग तरह से पड़ता है.

प्रोफ़ेसर पॉल कोस्टा जूनियर और उनके साथियों ने 40 साल की उम्र वाले क़रीब दो हज़ार लोगों पर एक तजुर्बा किया. उन्होंने कुछ सवाल 40 की उम्र में पूछे. फिर क़रीब छह साल बाद कुछ और सवाल पूछे. इस दौरान उनकी ज़िंदगी में जो बड़ी घटनाएं हुईं, उनके बारे में उनसे पूछा गया.

मक़सद यही जानना था कि क्या उनकी ज़िंदगी में किसी तरह का बदलाव आया है. दिलचस्प बात ये रही कि इस दौरान जिन महिलाओं का तलाक़ हुआ उनके मिज़ाज में खुलापन ज़्यादा आया. उन्होंने अपनी ज़ात से बाहर की दुनिया पर भी ग़ौर करना शुरू किया.

रिसर्च करने वालों के लिए तलाक़ का ये एक पॉज़िटिव असर था. वहीं इस दौरान जिन मर्दों का तलाक़ हुआ था वो जज़्बाती तौर पर ज़्यादा कमज़ोर हो गए थे. उन पर तलाक़ का बुरा असर पड़ा था.

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हालांकि सभी तरह की रिसर्च में ये बात सही साबित नहीं हुई. वर्ष 1994 से लेकर 2006 तक जर्मनी के कुछ रिसर्चर्स ने क़रीब 500 लोगों पर एक तजुर्बा किया. इसमें पाया गया कि इन बारह सालों में जिन महिलाओं का तलाक़ हुआ था वो ख़ुद में ही सिमट कर रह गईं.

इस तलाक़ से ससुराल के जो रिश्ते उन्होंने खोए थे उनका नेगेटिव असर उनके किरदार पर पड़ा था. इसके अलावा अपने पार्टनर पर उनकी निर्भरता भी कम हुई थी. अपनी तमाम ज़रूरतों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी ख़ुद उन पर आ पड़ी थी.

तलाक़ होने की बहुत सी वजहें हो सकती हैं लेकिन सबसे बड़ी वजह होती है दोनों पार्टनर के मिज़ाज का आपस में ना मिल पाना. बहुत सी रिसर्च ये साबित करती हैं कि जिन लोगों में इमोशनल कमज़ोरी होती है, उनका रिश्ता टूटने की आशंका बढ़ जाती हैं.

और जिन लोगों में दूसरे के जज़्बात की क़द्र करने का हौसला और जज़्बा ज़्यादा होता है, उनके रिश्ते लंबे वक़्त तक चलते हैं. ऐसे लोगों का सामाजिक दायरा भी बड़ा होता है. उन्हें अपने जीवन साथी के अलावा भी और बहुत से साथी मिल जाते हैं, जो लंबे वक़्त तक उनके साथ रह सकते हैं.

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एक स्टडी में ये भी पाया गया है कि जो लोग इमोशनली कमज़ोर होते हैं, वो तलाक़ के बाद जल्दी ही थोड़े-थोड़े समय वाले रिश्ते में बंध जाते हैं. लेकिन किसी के साथ लंबा रिश्ता क़ायम नहीं कर पाते.

क्योंकि एक स्थायी रिश्ते से उनका यक़ीन पूरी तरह से टूट चुका होता है. वो फिर से किसी पर यक़ीन आसानी से नहीं कर पाते. लेकिन जिन लोगों में भावनात्मक स्थिरता होती है वो दूसरी शादी भी जल्दी करते हैं और उनका रिश्ता लंबे समय के लिए बनता है.

चूंकि एक दूसरे के साथ रहते रहते मर्द और औरत एक दूसरे की पहचान बन चुके होते हैं. ऐसे में जब वो एक दूसरे से अलग होते हैं, तो, उनके सामने सबसे बड़ा सवाल खुद की पहचान का बन जाता है. अलग होने पर उन्हें लगता है कि वो खुद अपना एक हिस्सा गंवा रहे हैं.

तलाक़ का लोगों पर किस तरह का असर होता है ये बहुत हद तक किसी की शख़्सियत पर भी निर्भर करता है. कुछ लोग इस सच्चाई को थोड़ी मुश्किल के साथ ही सही, लेकिन स्वीकार कर लेते हैं कि उनका साथ मुमकिन नहीं. अब अलग हो जाना ही बेहतर है.

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क्रिस मार्टिन और ग्वानेथ पालथ्रो जैसे लोगों ने ब्रेकअप का असर अपनी ज़िंदगी पर नहीं पड़ने दिया है.

वहीं कुछ लोग तलाक़ को अपनी ईगो का मसला बना लेते हैं. ऐसे लोगों पर अलग होने का असर ज़्यादा गहरा होता है. वो इस सच्चाई को बर्दाश्त नहीं कर पाते कि कोई उन्हें रिजेक्ट कर सकता है.

बहरहाल जितनी भी रिसर्च सामने आई हैं, उनकी बुनियाद पर एक बात एकदम साफ़ है कि तलाक़ के बाद इंसान थोड़ा कम सक्रिय हो जाता है. वो अकेलेपन का शिकार हो जाता है. लेकिन ज़िंदगी है. खुशियां गम, मिलना बिछड़ना, आना जाना लगा रहता है. किसी के चले जाने के बाद भी आपकी ज़िंदगी चलती रहती है.

आपको किसी और के लिए नहीं ख़ुद अपने लिए तो जीना ही है. लिहाज़ा अपने अकेलपन से बाहर आइए, अपने नए दोस्त बनाइए. अपना सामाजिक दायरा बढ़ाइए.

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एंजलिना जॉली और ब्रैड पिट की फ़ाइल तस्वीर.

अपनी एनर्जी किसी ख़ास रचनात्मक मक़सद के लिए इस्तेमाल कीजिए जिससे आपको भी खुशी मिले और दूसरे भी आपके साथ जुड़ सकें.

इसमें कोई शक नहीं कि एक लंबा रिश्ता टूटने का दर्द सहना आसान नहीं होता. लेकिन अगर शादी पैरों की बेड़ी बन जाए तो उसे तोड़ा जाना ज़रूरी है.

एक नाख़ुश रिश्ते से बेहतर अनजान लोगों से मिलकर खुशी का रिश्ता बना लेना ज़्यादा बेहतर है. आख़िर आपकी भी ज़िंदगी है. आपमें भी उसे जीने की ललक बरक़रार रहनी चाहिए.

(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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