अगर ज़ीरो न होता तो क्या क्या ना होता

  • 26 दिसंबर 2016
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ज़ीरो, शून्य या सिफ़र एक बड़ा ही दिलचस्प नंबर है. इसका अपना कोई वज़न नहीं होता. मगर किसी और अंक के आगे या पीछे ज़ीरो लिखने से ही उस अंक की औक़ात बढ़ती या घटती है.

ज़ीरो के वजूद की कहानी बेहद दिलचस्प है. कहने को अकेला ये नंबर कुछ भी नहीं है. लेकिन जब किसी और नंबर के साथ ये जुड़ जाता है तो अपनी संख्या के अनुसार उस नंबर की ताक़त को बढ़ा देता है.

जैसे एक नंबर से पहले इसकी कोई पहचान नहीं. लेकिन अगर एक नंबर के आगे लग जाए तो उसे एक से दस बना देता है, दो बार लग जाए तो सौ, तीन बार लग जाए तो हज़ार.

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वक्त के साथ साथ हरेक अंक को लिखने का अंदाज़ बदला. लेकिन ज़ीरो ऐसा अकेला नंबर है जो हर दौर में एक जैसा ही रहा. चलिए आज आपको ज़ीरे के सफ़र की कहना बताते हैं.

प्राचीन काल से ही ज़ीरो की का कॉनसेप्ट रहा है. बेबीलोनिया और माया तहज़ीब के अभिलेखों में भी इसका ज़िक्र मिलता है. उस दौर में इसका इस्तेमाल मौसमों की आमदो-रफ़्त का जोड़-घटाव करने के लिए किया जाता था.

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Image caption बेबीलोन सभ्यता में ज़ीरो को दर्शाने वाला चिन्ह

प्राचीन विद्वानों ने इसे किसी भी नंबर की ग़ैर हाज़री के तौर पर माना. जैसे अगर 101 नंबर लिखना है तो यहां सौ के बाद कुछ नहीं है. उसके बाद एक नंबर है. इन विद्वानों ने भी ज़ीरो कि शक्ल गोल ही रखी थी. लेकिन बेबिलोनियन सभ्यता में ये एक भाले की शक्ल का होता था.

इस सभ्यता में दो नंबरों के बीच इस निशान को बनाने की मतलब ही होता था कि यहां कुछ भी नहीं है. गणित में ज़ीरो की अहमियत क्या हो सकती है इसे भारत के विद्वानों ने जाना.

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प्रोफ़ेसर एलेक्स बेलोस का कहना है कि कुछ ना हो कर भी कुछ होने का तसव्वुर भारतीय संस्कृति में मौजूद था. जिसे 'निर्वाण' के तौर पर जाना गया.

अगर इंसान की तमाम ख़्वाहिशें और परेशानियां उससे दूर हो जाती हैं, तो फिर, जीवन में कुछ बचता नहीं है. यानि शून्य की स्थिति आ जाती है. यानि कुछ भी नहीं. भारतीय रहस्यवाद में ज़ीरो की शक्ल गोल इसलिए है क्योंकि ये जीवन चक्र को दर्शाता है.

ज़ीरो की उपयोगिता से दुनिया को रूबरू कराने का श्रेय सातवीं सदी के भारतीय खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त को जाता है. इसे ऐसे ही जमा, घटा गुणा, भाग सभी किया जा सकता है, जैसे आप किसी और नंबर को कर सकते हैं. अलबत्ता इसे भाग करना थोड़ा मुश्किल होता है.

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कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ज़ीरो की उत्पत्ति भारत में हुई थी. लेकिन इसे बड़ी सफ़ाई से तारीख़ से हटा दिया गया. एशिया में अपनी धाक जमाने के बाद मध्य पूर्व में इस्लामिक विद्वानों ने इसे अरबी नंबरों की फेहरिस्त में शामिल कर इसकी भूमिका को और निखारा. भारत और अरबी देशों से इसका गहरा ताल्लुक़ है, लिहाज़ा इसे इंडो-अरेबिक नंबर कहा जाना चाहिए.

ज़ीरो का सफ़र आसान नहीं था. उसने अपने सफ़र में बहुत मुश्किलों का सामना किया. यूरोप में ये उस वक़्त अपने पैर जमा रहा था, जब यहां इस्लाम के ख़िलाफ़ ईसाई धर्मयुद्ध चल रहा था. अरबी नंबरों पर यूरोपीय लोग भरोसा नहीं करते थे.

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सन 1299 में इटली के फ्लोरेंस शहर में दूसरे अरबी नंबरों के साथ साथ ज़ीरो पर पाबंदी लगा दी गई. क्योंकि इसे ज़ीरो से नौ नंबर में तब्दील करना बहुत आसान था. पैसों का लेन-देन करने वालों के साथ बहुत बार बेईमानी हो जाती थी.

लेकिन, सत्रहवीं सदी तक आते आते सिफ़र ने खुद को इतना मज़बूत बना लिया कि इसके बना काम चलना मुश्किल हो गया. इसने गणित और विज्ञान के तमाम सिद्धांतों को आगे बढ़ाने की एक मज़बूत बुनियाद दी.

आज तक इसकी अहमियत बरक़रार है. स्कूल में बहुत बार आपने ग्राफ़ बनाया होगा. जिसकी कल्पना ज़ीरो के बग़ैर मुमकिन नहीं है. यहां तक कि आज इंजीनियरिंग से लेकर कंप्यूटर ग्राफ़िक तक, सिफ़र के बग़ैर बन ही नहीं सकते.

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प्रोफ़ेसर बेलोस का कहना है कि अरबी नंबरों और ज़ीरो की पैदाइश के साथ ही नंबरों की दुनिया में इंक़िलाब सा आ गया था. अंकगणित की काली सफ़ेद दुनिया अचानक चमक उठी.

ज़रा सोचिए अगर ज़ीरो ना होता तो क्या स्टॉक मार्केट का तसव्वुर भी किया जा सकता था. अगर ज़ीरो ना होता तो सारे नंबर बेमानी हो जाते.

तो आगे से आपको कोई सिफ़र कहे तो बुरा मानने के बजाय उसे ये बताएं कि भाई सारी ताक़त शून्य में ही है. और इसी में हम सबको एक दिन विलीन हो जाना है.

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