बहुत कुछ बताती है जिस्म की ख़ुशबू

  • रिचर्ड ग्रे
  • बीबीसी फ़्यूचर
जुड़वा इंसान

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हर इंसान के दो हाथ, दो पैर, दो आंखें, दो कान और एक नाक होती है. हां, बस रंग का फ़र्क़ ज़रूर होता है.

ये फ़र्क़ भी हर जगह के वातावरण के मुताबिक़ होता है. जैसे अफ़्रीका में आपको एक ही रंग-रूप वाले लोग मिलेंगे. अमरीका और यूरोप में लगभग एक जैसी रंगत वाले लोग हैं.

अगर बात करें भारत जैसे देश की तो यहां एक ही देश में बहुत से रंग रूप और क़द काठी के लोग मिल सकते हैं. क्या आपके ज़हन में कभी ये सवाल नहीं आता कि हम उन्हें पहचान कैसे लेते हैं?

मुमकिन है आपके पास इस सवाल के कुछ वाजिब जवाब हों लेकिन हैरत की बात तो ये है कि हम जुड़वा लोगों के दरमियान भी फ़र्क़ लेते हैं जो एक दूसरे से काफ़ी हद तक मिलते हैं. आख़िर कैसे कर पाते हैं हम ये सब?

ये सवाल वैज्ञानिकों के लिए भी रिसर्च का विषय है और इस पर काम किया जा रहा है. जुड़वा बच्चों के बारे में जानकारों का कहना है कि उनके चेहरे की बनावट में बाल से भी हल्का अंतर होता है, जो उन्हें एक दूसरे से अलग करता है.

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हालांकि ये अंतर तभी पकड़ में आता है जब वो दोनों साथ हों. वरना पहचान करने में दिक़्क़त हो ही जाती है. इसी मुश्किल के हल के लिए अमरीका की इंडियाना यूनिवर्सिटी ने 'बायोमेट्रिक आइडेंटिफिकेशन' तकनीक की खोज की है.

अपनी खोज के सिलसिले में कुछ रिसर्चर अमरीका के ओहायो में आयोजित होने वाले सालाना 'ट्विन डे' फेस्टिवल में पहुंचे. उन्होंने देखा कि हर साल धीरे-धीरे जुड़वा बच्चों की संख्या में इज़ाफ़ा होता जा रहा है. हालांकि हाथों की उंगलियों के निशान से पहचान करना एक आसान और पारंपरिक तरीक़ा रहा है.

आम जनता के लिए इस टेस्ट के बिना पहचान कर पाना अभी भी मुश्किल है. अपनी सुविधा के लिए बहुत से लोग कुछ निशानियां ज़हन में रख लेते हैं, जैसे चेहरे पर कोई निशान या तिल वग़ैरह. इन सबके अलावा आंख की पुतली के ज़रिए पहचान करने का तरीक़ा सबसे सटीक माना जाता है.

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चलिए इन तरीक़ों से अलग आपको शरीर के कुछ हिस्सों के बारे में बताते हैं, जिनके ज़रिए बिना किसी टेस्ट के आप एक समान नज़र आने वाले लोगों के बीच फ़र्क़ कर सकते हैं.

सबके कान अलग होते हैं

सबसे पहल बात कान की. कहने को तो सभी के दो कान होते हैं लेकिन सबके कान एक समान नहीं होते. भले ही ये देखने में एक जैसे लगते हैं लेकिन इनकी बनावट एक दूसरे इंसान से बिल्कुल जुदा होती है.

आपको जानकर हैरानी होगी कि 1950 से फोरेंसिक वैज्ञानिक संदिग्धों के कान की बनावट की बुनियाद पर मुजरिम तक पहुंचने का काम करते आ रहे हैं. 1998 में ऐसे सॉफ्टवेयर बना लिए गए जो हरेक कान के फ़र्क़ को पढ़ सकते थे.

इसके बाद 'थ्री-डी' स्केनिंग की शुरुआत हुई, जिससे कान की ज्योमेट्रिक बनावट को पढ़ा जा सकता है. ये तकनीक इतने अडवांस है कि इसके ज़रिए 0.02 मिली सेकेंड में 99.9 फ़ीसद सटीक अंदाज़ के साथ कान की बनावट में फ़र्क़ की पहचान की जा सकती है.

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खोजकर्ताओं का कहना है कि उम्र के साथ साथ हम जैसे-जैसे बढ़ते जाते हैं, हमारे चेहरे और शरीर की बनावट में अंतर आने लगता है. कान हमारे शरीर का ऐसा अंग है जिनमें बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आता.

हमारे कान के अंदरूनी हिस्से में बहुत छोटे-छोटे बाल होते हैं. ये अंदरूनी हिस्सा एक ख़ास तरह की तरंग के साथ एक आवाज़ पैदा करता है. हर इंसान के कान में ये आवाज़ अलग तरह की होती है. इस आवाज़ की पहचान करने के लिए पिछले साल ही एक विशेष प्रकार का माइक्रोफोन बना लिया गया है.

शरीर की ख़ुशबू होती है ख़ास

जिस्म की खुशबू का ज़िक्र तो आपने शायरी में खूब पढ़ा होगा. अब आप कहेंगे वो तो तरह-तरह के इत्र और परफ्यूम आदि लगाने के बाद आती है. आप ग़लत हैं. ऐसा नहीं है.

हर इंसान के जिस्म की एक ख़ुशबू होती है और ये एक दूसरे से अलग होती है. परिवार में जितने लोग होंगे सभी की अलग ख़ुशबू होगी. ये और बात है कि किसी के जिस्म की महक बहुत अच्छी होती है तो किसी की नागवार होती है.

अमरीका के आर्मी रिसर्च ऑफ़िस का कहना है हर इंसान अपने चारों ओर हवा का एक ग़िलाफ़ ओढ़े रहता है और इसी में उसकी ख़ुशबू लिपटी रहती है. वो जहां से भी गुज़रता है ये ख़ुशबू उसके साथ जाती है. खोजी कुत्ते इसी ख़ुशबू की बुनियाद पर मुज़रिम तक पहुंचते हैं. बायोमेट्रिक्स इंजीनियर सुनील झा का कहना है कि शरीर की गंध का इस्तेमाल बायोमेट्रिक पासपोर्ट बनाने में भी किया जा सकता है.

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चलने का अंदाज़

हमारे चलने का अंदाज़ भी हमारी पहचान होता है. कहने को तो हम सभी एक पैर के आगे दूसरा पैर रखते हैं और क़दम बढ़ा लेते हैं लेकिन क़दम बढ़ाने का ये अंदाज़ भी हर इंसान का अलग होता है.

हो सकता है नंगी आंख से देखने पर हमें सभी की चाल एक जैसी लगे लेकिन कंप्यूटर आपकी चाल के फ़र्क़ को बहुत बारीकी से पकड़ लेता है और 'थ्री डी काइनेटिक मॉडल' के ज़रिए तो ये काम और भी आसान हो गया है. मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियां अब ऐसी तकनीक बनाने जा रही हैं, जिससे फोन जेब में रखने वाले की लोकेशन आसानी से पताई लगाई जा सकेगी.

पीठ की बनावट

आपकी पीठ की बनावट से भी आपकी पहचान की जी सकती है. जापान के रिसर्चर ने ऐसे प्रेशर सेंसिटिव पैड बनाए हैं जो कार की सीट पर फिट किए जा सकते हैं. इसमें 360 सेंसर्स लगे हैं, जो आपके बैठने के तरीक़े से बता सकते हैं कि किसी दूसरे इंसान से कितने अलग हैं.

रिसर्चरों के मुताबिक़ इन डिवाइस का इस्तेमाल कंप्यूटर को अनलॉक करने में किया जा सकता है. पासवर्ड याद रखने का झंझट ही ख़त्म हो जाएगा.

बहुत बार आपने अपनी उंगली कान में लगाकर कान बंद किया होगा. आपको बाहर का शोर कम सुनाई दिया होगा. एक अजीब सी आवाज़ कान में गूंजती हुई सुनाई दी होगी. कान से उंगली हटाने पर वो आवाज़ ख़त्म हो जाती है.

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खोपड़ी का अंतर

दरअसल, ऐसा करने पर हमारे कान की अंदरूनी हड्डी जो खोपड़ी से जुड़ी होती है, बाहर के शोर को रोकती है और उससे जो तरंगें उत्पन्न होती हैं वही आवाज़ पैदा करती हैं.

ऐसा करने पर हर इंसान की खोपड़ी उस आवाज़ को अलग तरह से क़ाबू करती है. इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है कि हम अपने चारों ओर जो आवाज़ें लिए रहते हैं उन्हें हर इंसान की खोपड़ी अलग तरह से क़ाबू करती है.

नाखून पर बने निशान

अंगुलियों के निशान की तरह नाख़ूनों के नीचे बहुत से उभार होते हैं जो हर इंसान में अलग होते हैं.

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आईआईटी दिल्ली के रिसर्चर्स का तो ये भी कहना है कि नेल पॉलिश होने के बावजूद वो एक स्कैनिंग के ज़रिए इन उभारों को देख और पहचान सकते हैं. इनकी बनावट लगभग हर छह महीने में बदलती रहती है.

नाक पर बने छेद

इसके अलावा हमारी नाक पर सैकड़ों बहुत छोटे-छोटे छेद होते हैं. जानकार कहते हैं कि ये छेद लगभग सारी उम्र एक जैसे रहते हैं. इनकी बनावट में कोई बदलाव नहीं आता. और हर इंसान की नाक पर ये छेद अलग-अलग बनावट और तादाद में होते हैं इनका इस्तेमाल किसी भी इंसान की पहचाने के लिए बखूबी किया जा सकता है.

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हमारा शरीर कई लिहाज़ से अनूठा है. बायोमेट्रिक्स पहचान के लिए इस अनोखे शरीर का इस्तेमाल किया जा सकता है. आज हम सभी को बहुत तरह के पासवर्ड याद रखने पड़ते हैं लेकिन इसके बावजूद वो चुरा लिए जाते हैं. अगर हर इंसान के शरीर की बनावट का इस्तेमाल उसकी पहचान के तौर पर किया जाने लगे तो इस मुश्किल से निजात पाई जा सकती है.

(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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