20 अरब किलोमीटर दूर जा चुका वोएजर क्या है?

  • रिचर्ड होलिंगम
  • बीबीसी फ्यूचर

खोज करना इंसान की फ़ितरत है. इसके लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार होता है. तभी तो, इंसान उस चीज़ को खोजने में जुटा हुआ है, जिसकी कोई हद नहीं. जिसका कोई ओर-छोर नहीं.

पर, वो आख़िर क्या है जिसका कोई ओर-छोर नहीं और हम जिसकी खोज में जुटे हुए हैं. वो है हमारा ब्रह्मांड.

इस में कितनी आकाशगंगाएं हैं? कितने सितारे हैं? कितने ग्रह और उपग्रह हैं?

इसमें से किसी भी सवाल का जवाब हमें नहीं मालूम. मगर हम ब्रह्मांड का ओर-छोर, इसके राज़ तलाशने में जुटे हैं.

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वोयेजर पहुंचा सौर मंडल के पार

इंसान की खोजी फ़ितरत ने ही जन्म दिया है दुनिया के सबसे महान अंतरिक्ष अभियान को. इस महान स्पेस मिशन का नाम है-वोएजर.

बात आज से 40 साल पहले की है. 1977 में अगस्त और सितंबर महीने में अमरीकी स्पेस एजेंसी नासा ने दो अंतरिक्ष यान धरती से रवाना किए थे. इन्हीं का नाम था वोएजर एक और दो.

वोएजर 2 को 20 अगस्त को अमरीकी स्पेस सेंटर केप कनावरल से छोड़ा गया था. वहीं वोएजर एक को पांच सितंबर को रवाना किया गया.

आज से 40 बरस बाद ये दोनों अंतरिक्ष यान धरती से अरबों किलोमीटर की दूरी पर हैं. वोएजर एक तो अब हमारे सौर मंडल से भी दूर यानी क़रीब 20 अरब किलोमीटर दूर जा चुका है. वही वोएजर दो ने दूसरा रास्ता अख़्तियार करते हुए क़रीब 17 अरब किलोमीटर का सफ़र तय कर लिया है.

ये दूरी इतनी है कि वोएजर एक से धरती पर संदेश आने जाने में क़रीब 38 घंटे लगते हैं. वो भी तब जब ये रेडियो सिग्नल, 6 सेकेंड में एक किलोमीटर की दूरी तय करते हैं, यानी रौशनी की रफ़्तार से चलते हैं.

वहीं वोएजर 2 से धरती तक संदेश आने में 30 घंटे लगते हैं.

सबसे दिलचस्प बात ये है कि आज 40 साल बाद भी दोनों यान काम कर रहे हैं और इंसानियत तक ब्रह्मांड के तमाम राज़ पहुंचा रहे हैं. हां, अब ये बूढ़े हो चले हैं.

इनकी काम करने की ताक़त कमज़ोर हो गई है. इनकी तकनीक भी पुरानी पड़ चुकी है. आज, वोएजर यानों से आने वाले संदेश पकड़ने के लिए नासा ने पूरी दुनिया में रेडियो सिग्नल सेंटर बनाए हैं.

ये बात कुछ वैसी ही है जैसे आप शहर से बाहर जाएं तो आपको मोबाइल का सिग्नल पाने में मशक़्क़त करनी पड़े. ठीक इसी तरह आज नासा, दुनिया भर में बड़ी-बड़ी सैटेलाइट डिश लगाकर वोएजर से आने वाले सिग्नल पकड़ता है.

इस मिशन से शुरुआत से जुड़े हुए वैज्ञानिक एड स्टोन कहते हैं कि आज वोएजर एक ब्रह्मांड में इतनी दूर है, जहां शून्य, अंधेरे और सर्द माहौल के सिवा कुछ भी नहीं. वो बताते हैं कि वोएजर मिशन के डिज़ाइन पर 1972 में काम शुरू हुआ था.

आज 40 साल बाद वोएजर मिशन से हमें ब्रह्मांड के बहुत से राज़ पता चले हैं. बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण ग्रहों के बारे में तमाम दिलचस्प जानकारियां मिली हैं.

इन विशाल ग्रहों के चंद्रमा के बारे में तमाम जानकारियां वोएजर मिशन के ज़रिए मिली हैं.

वोएजर मिशन से जुड़े एक और शख़्स थे मरहूम कार्ल सगन. सगन ने वोएजर यानों से ग्रामोफ़ोन जोड़ने के प्रोजेक्ट पर काम किया था.

वो पहले अमरीका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोफिजिक्स पढ़ाया करते थे. बाद में सगन नासा के लिए काम करने लगे. वो मंगल ग्रह पर जाने वाले पहले मिशन वाइकिंग का भी हिस्सा थे. उन्होंने बच्चों के लिए विज्ञान की कई दिलचस्प क़िताबें लिखीं. कई रेडियो और टीवी कार्यक्रमों में भी भागीदारी की.

वोएजर यानों में ग्रामोफ़ोन लगाने का मक़सद एक उम्मीद थी. उम्मीद ये कि धरती के अलावा भी ब्रह्मांड में कहीं ज़िंदगी ज़रूर है. सफ़र करते-करते जब किसी और सभ्यता को हमारा वोएजर मिले, तो उसे इंसानी सभ्यता की एक झलक इन ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड के ज़रिए मिले.

यानी वोएजर सिर्फ़ एक स्पेस मिशन नहीं, बल्कि सुदूर ब्रह्मांड को भेजा गया इंसानियत का संदेश भी हैं.

ये ग्रामोफ़ोन तांबे के डिस्क से बने हैं, जो क़रीब एक अरब साल तक सही सलामत रहेंगे. इस दौरान जो अगर वोएजर किसी ऐसी सभ्यता के हाथ लग गया जो ब्रह्मांड में कहीं बसती है, तो, इन ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड के ज़रिए उन्हें इंसानियत के होने का, उसकी तरक़्क़ी का संदेश मिलेगा.

नासा के सीनियर वैज्ञानिक एड स्टोन बताते हैं कि वोएजर यानों को साल 1977 में रवाना करने की भी एक वजह थी. उस साल सौर मंडल के ग्रहों की कुछ ऐसी स्थिति थी, कि ये यान सभी बड़े ग्रहों यानी जुपिटर, सैटर्न, यूरेनस और नेपच्यून से होकर गुज़रते.

इस मिशन पर काम करने वाली लिंडा स्पिलकर बताती हैं कि ग्रहों की स्थिति की वजह से उस दौरान नासा में काम कर रहे कई लोगों के बच्चे हुए थे. आज इन्हें वोएजर पीढ़ी के बच्चे कहा जाता है.

लॉन्च के 18 महीने बाद यानी 1979 में वोएजर 1 और 2 ने जुपिटर यानी बृहस्पति ग्रह की खोज शुरू की. दोनों स्पेसक्राफ्ट ने सौर मंडल के इस सबसे बड़े ग्रह की बेहद साफ़ और दिलचस्प तस्वीरें भेजीं.

वोएजर मिशन से जुड़े इकलौते ब्रिटिश वैज्ञानिक गैरी हंट बताते हैं कि वोएजर यानों से आने वाली हर तस्वीर जानकारी की नई परत खोलती थी.

वोएजर मिशन से पहले हमें यही पता था कि सौर मंडल में सिर्फ़ धरती पर ही ज्वालामुखी पाए जाते हैं. लेकिन वोएजर से पता चला कि जुपिटर के एक चंद्रमा पर भी ज्वालामुखी हैं.

एड स्टोन कहते हैं कि वोएजर मिशन ने सौर मंडल को लेकर हमारे तमाम ख़याल ग़लत साबित कर दिए. जैसे हमें पहले ये लगता था कि समंदर सिर्फ़ धरती पर हैं.

मगर, वोएजर से आई तस्वीरों से पता चला कि जुपिटर के चंद्रमा यूरोपा पर भी समंदर हैं.

आज की तारीख़ में वोएजर मिशन की ओरिजिनल तस्वीरों को लंदन के क्वीन मैरी कॉलेज की लाइब्रेरी में रखा गया है. क्योंकि नासा ने इन तस्वीरों की डिजिटल कॉपी बना ली हैं.

गैरी हंट बताते हैं कि जब वोएजर 1 ने शनि के चंद्रमा मिमास की तस्वीरें भेजी थीं, तो उन्हें देखकर सभी लोग हैरान रह गए थे. वो दौर स्टार वार्स फ़िल्मों का था. इसलिए वैज्ञानिकों ने मिमास को 'डेथ स्टार' का फ़िल्मी नाम दिया था.

वोएजर ने तस्वीरों के ज़रिए हमें शनि के छल्लों के नए राज़ बताए थे. इस मिशन से पता चला था कि शनि के उपग्रह टाइटन पर बड़ी तादाद में पेट्रोकेमिकल हैं. और यहां मीथेन गैस की बारिश होती है.

वोएजर मिशन के ज़रिए हमें शनि के छोटे से चंद्रमा एनसेलाडस का पता चला था. बात में कैसिनी-ह्यूजेंस मिशन के ज़रिए भी इसके बारे में कई जानकारियां मिली थीं. आज की तारीख़ में सौर मंडल में ज़िंदगी के सबसे ज़्यादा आसार, शनि के चंद्रमा एनसेलाडस पर ही दिखते हैं.

वैज्ञानी एमिली लकड़ावाला कहती हैं कि शनि का हर चंद्रमा अपने आप में अलग है. एमिली के मुताबिक़ वोएजर के ज़रिए हमें ये एहसास हुआ कि शनि के तमाम चंद्रमाओं की पड़ताल के लिए हमें नए मिशन भेजने की ज़रूरत है.

नवंबर 1980 में वोएजर 1 ने शनि से आगे का सफ़र शुरू किया. नौ महीने बाद वोएजर 2 ने सौर मंडल के दूर के ग्रहों का रुख़ किया. वो 1986 में यूरेनस ग्रह के क़रीब पहुंचा. वोएजर 2 ने हमें बताया कि ये ग्रह गैस से बना हुआ है और इसके 10 उपग्रह हैं.

1989 में वोएजर 2 नेपच्यून ग्रह के क़रीब पहुंचा, तो हमें पता चला कि इस के चंद्रमा तो बेहद दिलचस्प हैं. ट्राइटन नाम के चंद्रमा पर नाइट्रोजन के गीज़र देखने को मिले. सौर मंडल के लंबे सफ़र में वोएजर 1 और 2 ने इंसान को तमाम जानकारियों से लबरेज़ किया है. हमें पता चला है कि धरती पर होने वाली कई गतिविधियां सौर मंडल के दूसरे ग्रहों पर भी होती हैं.

वोएजर की खोज की बुनिया पर ही बाद में कई और स्पेस मिशन शुरू किए गए. जैसे शनि के लिए कैसिनी-ह्यूजेंस मिशन स्पेसक्राफ्ट भेजा गया. बृहस्पति ग्रह के लिए गैलीलियो और जूनो यान भेजे गए. अब कई और मिशन सुदूर अंतरिक्ष भेजे जाने की योजना है.

हालांकि फिलहाल यूरेनस और नेपच्यून ग्रहों के लिए किसी नए मिशन की योजना नहीं है. तब तक हमें वोएजर से मिली जानकारी से ही काम चलाना होगा.

इंसान के इतिहास में ऐसे गिने-चुने मिशन ही हुए होंगे, जिनसे इतनी जानकारियां हासिल हुईं. आज चालीस साल बाद तकनीक ने काफ़ी तरक़्क़ी कर ली है. ऐसे में वोएजर यान पुराने पड़ चुके हैं.

वोएजर दुनिया के पहले ऐसे स्पेस मिशन थे जिनका कंट्रोल कंप्यूटर के हाथ में था. आज चालीस साल बाद भी ये दोनों ही यान ख़ुद से अपना सफर तय करते हैं. अपनी पड़ताल करते हैं और ज़रूरत पड़ने पर अपना बैकअप सिस्टम चालू करते हैं.

वोएजर को बनाने में इस्तेमाल हुई कई तकनीक हम आज भी इस्तेमाल करते हैं. आज के मोबाइल फ़ोन और सीडी प्लेयर वोएजर में इस्तेमाल हुई कोडिंग सिस्टम तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. आज के स्मार्टफ़ोन में तस्वीरें प्रॉसेस करने की जो तकनीक है, वो वोएजर के विकास के दौरान ही खोजी गई थी.

वोएजर मिशन का सबसे महान लम्हा उस वक़्त आया था, जब 14 फरवरी 1990 को इसने अपने कैमरे धरती की तरफ़ घुमाए थे. उस दौरान पूरे सौर मंडल और ब्रह्मांड में धरती सिर्फ़ एक छोटी सी नीली रौशनी जैसी दिखी थी.

एमिली लकड़ावाला कहती हैं कि पूरे ब्रह्मांड में ये एक छोटी सी नीले रंग की टिमटिमाहट ही वो जगह है, जहां हम जानते हैं कि ज़िंदगी आबाद है. वो कहती हैं कि किसी भी खगोलीय घटना से धरती पर से ज़िंदगी का ख़ात्मा हो सकता है. ऐसे में वोएजर के ज़रिए ही हमारी सभ्यता की निशानियां सुदूर ब्रह्मांड में बची रहेंगी.

2013 में वोएजर 1 स्पेसक्राफ्ट सौरमंडल से दूर निकल गया. आज वो ख़ला में घूम रहा है. अभी भी जानकारियां भेज रहा है. जल्द ही वोएजर 2 भी सौरमंडल से बाहर चला जाएगा.

दोनों ही स्पेसक्राफ्ट में एटमी बैटरियां लगी हैं. जल्द ही इनसे बिजली बनना बंद हो जाएगी. हर साल इनसे चार वाट कम बिजली बनती है.

वोएजर के प्रोग्राम मैनेजर सूज़ी डॉड कहते हैं कि हमें बहुत सावधानी से वोएजर मिशन को जारी रखना है. इसके पुराने पड़ चुके यंत्र बंद किए जा रहे हैं. दोनों के कैमरे बंद किए जा चुके हैं. क्योंकि अंतरिक्ष में घुप्प अंधेरा है. देखने के लिए कुछ भी नहीं है. बिजली बचाकर वोएजर को सर्द अंतरिक्ष मे गर्म बनाए रखा जा रहा है.

सूज़ी डॉड कहते हैं कि अगले दस सालों में दोनों को पूरी तरह से बंद करना होगा. ये पूरी मानवता के लिए बहुत दुखद दिन होगा. हालांकि तब तक दोनों ने अपनी बेहद दिलचस्प ज़िंदगी का सफ़र पूरा कर लिया होगा.

लेकिन दोनों ही स्पेसक्राफ्ट अंतरिक्ष में हमेशा ही मौजूद रहेंगे. शायद किसी और सभ्यता को इंसानियत के ये दूत मिल जाएं. फिर वो इन यानों में लगे ग्रामाफ़ोन रिकॉर्ड के ज़रिए मानवता का संदेश पढ़ सकेंगे.

वोएजर मिशन के ज़रिए 1977 की दुनिया अंतरिक्ष में जी रही है. वोएजर मिशन ने इंसानियत को अमर कर दिया है.

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