इरमा जैसे भयंकर तूफ़ान के नुकसान को कैसे करें कम

  • 13 सितंबर 2017
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अमरीका में इरमा तूफ़ान ने भारी तबाही मचाई है. अमरीका पहुंचने से पहले इरमा ने कैरेबियाई द्वीपों पर भयंकर उत्पात मचाया था. जिसमें दस से ज़्यादा लोगों की जान चली गई थी. यही नहीं अटलांटिक महासागर और मेक्सिको की खाड़ी में दो और तूफ़ान तेज़ी से ताक़त बटोर रहे हैं, जो अगले कुछ दिनों में अमरीकी देशों पर हमला बोल सकते हैं.

इरमा से पहले हार्वे तूफ़ान अमरीका के टेक्सस और लूसियाना सूबों में क़यामत बनकर बरपा था. इन राज्यों में भयंकर बारिश हुई थी. तमाम इलाक़े बाढ़ से तबाह हो गए. अरबों रुपए की संपत्ति और कारोबार का नुक़सान हुआ था.

अमरीकी देशों में इस साल का तूफ़ान का सीज़न क़हर का पैग़ाम लेकर आया है. भयंकर तूफ़ानों ने ज़िंदगी को उलट-पलट कर रख दिया है. कहा जा रहा है कि इतनी तबाही तूफ़ानों की वजह से पहले नहीं हुई. हालांकि ये बात कहना ठीक नहीं.

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क़ुदरत पर ज़ोर नहीं

क़ुदरती आपदा इंसान के लिए कोई नई चीज़ नहीं. हिंदुस्तान समेत तमाम देश ज़लज़ले, चक्रवात और बाढ़ के तौर पर अक्सर इसे झेलते रहे हैं. क़ुदरत ये तबाही बार-बार लाती है. इंसान को आगाह करती है. और हर तबाही के बाद हम फिर अगली आफ़त का इंतज़ार करते रहते हैं. ख़ुद को ये यक़ीन दिलाते रहते हैं कि अगली बार ऐसा नहीं होगा.

पूर्वोत्तर के राज्यों में हाल ही में आई बाढ़ को ही लीजिए. ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ था कि असम, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल बाढ़ के शिकार हुए हों. मगर हमने पिछली बाढ़ों से कोई सबक़ नहीं सीखा. नतीजा नई आफ़त के तौर पर सामने आया.

अब क़ुदरत पर तो हमारा ज़ोर नहीं. मगर कुछ एहतियात बरतकर हम अपना नुक़सान कम कर सकते हैं. मगर ये एहतियात बरतने में हम अक्सर कोताही करते हैं. कभी राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी होती है. कभी हम पैसे बचाने की सोचने लगते हैं. तो कभी लालच आड़े आ जाता है.

असल में क़ुदरत की मार से नुक़सान कम करने के लिए सरकार से लेकर आम आदमी तक को अपनी सोच बदलनी होगी. हमें भविष्य के ख़तरों के बारे में सोचकर पहले से तैयारी करनी होगी.

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बीमा क्यों नहीं कराते?

अक्सर हम ऐसे जोखिम लेते हैं, जो हमें भविष्य के नज़र आते हैं. जैसे, हम आज घर ख़रीदने के बारे में ज़्यादा गंभीरता से सोचते हैं. जबकि, आने वाले वक़्त के लिए बीमा पॉलिसी ख़रीदने में हम अक्सर हीला-हवाली करते हैं. असल में हम ये सोचकर बीमा नहीं लेते कि हो सकता है कि मेरे साथ ऐसा हो ही न.

इस सोच की लोगों ने अक्सर भारी क़ीमत चुकाई है. जैसे कि बहुत से लोग स्वास्थ्य का बीमा नहीं कराते. वो ये सोचते हैं कि उन्हें कोई गंभीर बीमारी होगी ही नहीं. और अक्सर ऐसा होता है कि लोग इस सोच की आगे चलकर भारी क़ीमत चुकाते हैं. मेडिकल बीमा न होने का ख़ामियाज़ा भुगतते हैं.

आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि तमाम सर्वे हमें दूरंदेश होने की सीख देते हैं. जैसे कि अमरीका की फेडरल इमरजेंसी मैनेजमेंट एजेंसी यानी आफ़त से निपटने वाला विभाग, तैयारी में अगर एक डॉलर ख़र्च करता है. तो, ऐसा करके वो 4 डॉलर बचाता है. ये तो मुनाफ़े का ही सौदा हुआ न.

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आफ़त से निपटने में निवेश

फिलीपींस से लेकर छोटे से देश समोआ तक हुए तमाम सर्वे ये बताते हैं कि आफ़त से निपटने की तैयारी में निवेश, बहुत फ़ायदे का सौदा है.

जैसे 1992 में एंड्र्यू नाम के तूफ़ान से हुई तबाही के बाद अमरीका के फ्लोरिडा राज्य में तूफ़ान से निपटने की तैयारियों पर काफ़ी रक़म ख़र्च की गई. सभी घरों में तूफ़ान का सामना करने लायक़ शीशे लगाना ज़रूरी कर दिया गया. इमारतों की मज़बूती के नियम सख़्त कर दिए गए. बाद के दिनों में फ्लोरिडा के लोगों को इस निवेश का फ़ायदा भी मिला.

अक्सर प्रशासन स्कूल और पुलिस में निवेश को तरज़ीह देता है. इससे भविष्य की चुनौतियों से निपटने की तैयारी कमज़ोर होती है. बिल्डरों के दबाव में सख़्त सुरक्षा नियमों में ढील दे दी जाती है. नेता, आने वाली चुनौतियों को गंभीरता से नहीं लेते.

अमरीका का ह्यूस्टन शहर इस बात की मिसाल है. ह्यूस्टन में हार्वे तूफ़ान ने भारी तबाही मचायी. वजह ये थी कि शहर से पानी के निकास की व्यवस्था बहुत ख़राब थी. इसके अलावा ह्यूस्टन के ज़्यादातर इलाक़े समुद्र तल से नीचे थे. इनके बचाव की कोई तैयारी नहीं की गई थी. भारी तूफ़ानी बारिश ने ह्यूस्टन शहर को कमोबेश डुबो ही दिया था.

एहतियाती तैयारियों को आगे के लिए टालना इंसान की फ़ितरत है. ये कुछ ख़ास इंसानों की कमज़ोरी नहीं. हमारा समाज, प्रशासन और नेता, सब के सब ऐसा ही बर्ताव करते हैं.

जैसे कि अमरीकी डिज़ास्टर एजेंसी फेमा (Federal Emengency Management Agency). इस सरकारी संस्था ने ख़ुद अपने नुक़सान की भरपाई के लिए बीमा नहीं कराया हुआ था. ये क़दम इसी साल उठाया गया. अब हाल ये है कि हार्वे तूफ़ान से हुई तबाही के बीमे के तौर पर फेमा को क़रीब बीस अरब डॉलर देने होंगे. ऐसे में इस का ख़ुद का बीमा काम आएगा.

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आफ़त से निपटने की तैयारी हो

तूफ़ानों और दूसरी क़ुदरती वजहों से हो रही तबाही, बार-बार दोहराई जा रही है. हो सकता है कि आने वाले वक़्त में क़ुदरत और रौद्र रूप दिखाए. ऐसे में भलाई, किसी भी आफ़त से निपटने की तैयारी में ही है. हां, बढ़ती आबादी और ख़तरे की वजह से तैयारी के इंतज़ाम दिनों-दिन महंगे होते जा रहे हैं.

लेकिन ये तैयारी ज़रूरी है. अमरीका के ह्यूस्टन शहर में तूफ़ान से इतनी तबाही की उम्मीद नहीं थी. हो सकता है कि आगे चलकर अगले दस, पचास या ढाई सौ सालों तक ह्यूस्टन में दूसरा तूफ़ान न आए. लेकिन हो सकता है कि अगले कुछ सालों में दोबारा कोई तूफ़ान यहां तबाही मचा जाए.

ऐसे में बेहतरी तो इसी बात में है न कि हम आपदाओं से निपटने की पुख़्ता तैयारी कर के रखें. भले ही ये लगे कि ये पैसे बर्बाद हो रहे हैं, मगर मुस्तक़बिल को महफ़ूज़ बनाने के लिए ये बेहद ज़रूरी है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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