जिसने रचा तिलस्मी दुनिया का 'माया जाल'

  • 14 सितंबर 2017
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Image caption सिड मीड (दाईं ओर)

लोग कपड़े डिज़ाइन करते हैं, जूते-चप्पल डिज़ाइन करते हैं, इंजन डिज़ाइन करते हैं, मकान डिज़ाइन करतें हैं, कारों को ख़ूबसूरत बनाते हैं- ऊपर वाले ने पूरी क़ायनात ही डिज़ाइन कर डाली है.

फ़िल्मों में आपने अलग ही दुनिया देखी है. अंतरिक्ष में बसे भयानक लोग. धरती को तबाह करने की तैयारी करते स्पेसशिप. आधे इंसान और आधे मशीन जैसे जीव. बड़ी-बड़ी मशीनें.

आपने बहुत-सी साइंस फ़िक्शन फ़िल्में भी देखी होंगी. हिंदुस्तान में तो ऐसी फ़िल्में कम बनी हैं. मगर, हॉलीवुड ने ख़्वाबों की दुनिया पर बहुत-सी फ़िल्में बनाई हैं. इनमें से कई सुहानी हैं, तो कई बेहद डरावनी भी.

इन फ़िल्मों में एक ऐसी दुनिया का आभास होता है, जो फ़िलहाल तो कहीं नहीं है. लेकिन साइंस अगर उस हद तक तरक़्क़ी कर ले तो उसका वजूद में आना हैरत की बात नहीं होगी. कई बार तो धरती से दूर किसी और ग्रह पर ज़िंदगी का तसव्वुर दिखाया गया है.

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Image caption ब्लेड रनर फ़िल्म का एक दृश्य

अंतरिक्ष में कॉलोनियां

सवाल उठता है जो दुनिया अभी कहीं है ही नहीं, उसकी कल्पना आख़िर कैसे और कौन करता है?

यूं तो फंतासी की दुनिया बहुत से लेखक शब्दों के ज़रिए गढ़ते आए हैं. लेकिन इन्हें रूप-रंग पहनाने का काम अक्सर विज़ुअल आर्टिस्ट करते हैं.

ऐसे ही एक शख़्स हैं अमरीका के सिड मीड. मीड विज़ुअल फ्यूचरिस्ट हैं. उन्होंने अंतरिक्ष में घर, जंगल, कॉलोनियों के जो फ़िल्मी डिज़ाइन बनाए वो हैरान करने वाले हैं. इतने यक़ीनी कि इन्हें फ़िल्म में देखकर कोई ये नहीं कह सकता कि ये तो नक़ली या बनावटी है.

सिड के इन्हीं डिज़ाइन ने हॉलीवुड के दिग्गजों को यक़ीन दिलाया कि इनका इस्तेमाल बड़े पर्दे के लिए बख़ूबी किया जा सकता है. सिड की मदद से ही ब्लेड रनर, स्टार ट्रेक, एलियंस और ट्रॉन और एलीशियम जैसी फिल्में बनाई गईं.

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Image caption स्टार ट्रेक फ़िल्म का स्पेसशिप

ख़ुद की कंपनी

विज़ुअल फ़्यूचरिस्ट बनने से पहले सिड को गाड़ियां बनाने का जुनून था. उन्होंने अपना करियर फ़ोर्ड कंपनी से शुरू किया था. 1970 में उन्होंने ख़ुद की अपनी शुरू की.

सिड की कंपनी को सबसे पहला काम हॉलैंड में फिलिप्स कंपनी के लिए कैसेट रिकॉर्डर बनाने का मिला. 1975 में वो दक्षिण कैलिफ़ोर्निया आ गए और पैरामाउंट पिक्चर्स के साथ काम करना शुरू कर दिया.

जब मीड ने कंपनी को यक़ीन दिलाया कि वो ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, जिसका अभी लोगों ने तसव्वुर तक नहीं किया है, तो कंपनी ने उनके साथ पांच साल के लिए क़रार कर लिया.

1979 में स्टार ट्रेक- द मोशन पिक्चर रिलीज़ हुई. इस फ़िल्म में एक बड़े से अंतरिक्ष यान को दिखाया गया था जिससे ज़मीन को ख़तरा है. दरअसल ये फ़िल्म, टेलिविज़न पर दिखाई जाने वाली एक सिरीज़ का ही अगला हिस्सा थी.

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नैपकिन पर डिज़ाइन

मीड ने इस फ़िल्म में जिस स्पेसशिप को दिखाया वो दर्शकों के लिए एक नई चीज़ थी. इस अंतरिक्ष यान का डिज़ाइन मीड ने एक होटल में खड़े-खड़े, एक नैपकिन पर बनाया था.

लेकिन इसे 42 फुट लंबे मॉडल के तौर पर बनाया जाना था. जब कैमरे इस मॉडल को शूट करते तो इसका साइज़ बेपनाह बड़ा नज़र आता. स्टार ट्रेक की रिलीज़ के बाद दूसरी कंपनियों ने भी मीड से काम कराना शुरू कर दिया.

स्टार ट्रेक के निर्माता जीन रॉडेनबेरी अगली पीढ़ी की टीवी सिरीज़ के लिए मीड के साथ काम करने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की. लेकिन रॉडेनबेरी की एक शर्त थी कि प्रोडक्शन का सारा काम स्टार ट्रेक के ऑफिस में ही होगा.

मीड ने अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ काम करने में यक़ीन रखते हैं. उन्हें ये ऑफ़र पसंद नहीं आया और उन्होंने मना कर दिया. बाद में इस प्रोजेक्ट पर मीड के ही एक दोस्त ने काम किया.

मीड कहते हैं कि वो जो कुछ भी डिज़ाइन करते हैं, उसके साथ सबसे बड़ी चुनौती होती है उसे यक़ीनी बनाने की. उनकी कोशिश होती है कि वो जिस तरह के हथियार, रॉकेट, शिप या वॉर रूम डिज़ाइन कर रहे हैं, वो कहानी के साथ पूरा इंसाफ़ करें. उनकी डिज़ाइन की हुई कोई भी चीज़ किसी भी लिहाज़ से कहानी की अहमियत को कम ना करे.

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अंतरिक्ष कॉलोनी की कल्पना

साथ ही मीड इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि कहानी और तस्वीरों के बीच बैलेंस ज़रूर रहे. मिसाल के लिए 2013 में मैट डैमन की फ़िल्म एलीशियम के लिए मीड से एक अंतरिक्ष कॉलोनी की कल्पना करने को कहा गया जहां से धरती नज़र आए.

इस कॉलोनी में बड़े-बड़े आलीशान घर दिखाने के साथ अंतरिक्ष में एक आदर्शवादी दुनिया की कल्पना करनी थी- जहां झीलें हों, पहाड़ हों और ऊंचे दर्जे का जीवन हो. अब ऐसी दुनिया अगर दिखानी है तो उसमें गुरुत्वाकर्षण होना भी ज़रूरी था. अब गुरत्वाकर्षण कितना हो, जो यक़ीनी लगे. ये एक बड़ी चुनौती थी.

इसके लिए मीड ने अपने एक दोस्त की मदद ली जो नासा की जेट प्रोपल्शन लैब में काम करता था. उसने मीड को बताया कि ये ग्रह ऐसा हो, जो अपनी धुरी पर ढाई मिनट में एक चक्कर पूरा कर ले. हालांकि फ़िल्म में हरेक चीज़ साइंस के लिहाज़ से बिल्कुल ठीक नहीं थी.

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फ़िल्म हक़ीक़त नहीं

यही वजह थी कि फिल्म के प्रचार के वक्त कुछ लोगों ने कहा भी कि ये साइंस के हिसाब से गलत है. लेकिन मीड के पास इसका माक़ूल जवाब था. उन्होंने कहा कि, भाई ये फ़िल्म है, हक़ीक़त नहीं.

ख़्वाबों को हक़ीक़त बनाने के लिए कई बार सच्चाई से दो क़दम आगे जाना पड़ता है. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो कल्पना को पर्दे पर लाना आसान नहीं होगा. कोशिश रहती है कि हरेक चीज़ को सच्चाई के नज़दीक लाया जाए. लेकिन हमेशा ऐसा हू-ब-हू होना मुमकिन नहीं होता.

इंसान ने कई बार कल्पना के घोड़े इतने तेज़ दौड़ाए हैं, जो हक़ीक़त में तब्दील हुई है. क्या पता, जिस दुनिया के मॉडल हमने सिड मीड के हाथों बनते देखे हैं, वो कभी हक़ीक़त बन जाएं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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