डायनासोर अगर ज़िंदा होते तो क्या होता?

  • 26 सितंबर 2017
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बहुत से ऐसे वाक़ियात हुए हैं, जो न होते, तो जाने क्या होता. दुनिया का रुख़ क्या होता? इंसानियत की तारीख़ क्या आज से अलग होती?

बताया जाता है कि क़रीब 6 करोड़ 60 लाख साल पहले एक एस्टेरॉयड हमारी धरती से टकराया था. इस टक्कर से जितनी ऊर्जा निकली थी, वो हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 10 अरब गुना ज़्यादा थी. एस्टेरॉयड के टकराने से सैकड़ों मील दूर तक आग का गोला फैल गया था. इस टक्कर से समंदर में सुनामी की प्रलयकारी लहरें उठी थीं, जिन्होंने आधी दुनिया में तबाही मचा दी थी.

ये क़यामत के आने जैसा था. हमारे वायुमंडल तक में आग लग गई थी. 25 किलो से ज़्यादा वज़न का कोई जानवर इस प्रलय में ज़िंदा नहीं बचा. क़यामत इसे ही तो कहते हैं कि एस्टेरॉयड की टक्कर से धरती पर जीवों की 75 फ़ीसद नस्लें हमेशा के लिए ख़त्म हो गईं.

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डायनासोर की नस्लें हुईं तबाह

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इसी प्रलय के चलते विशालकाय डायनासोर की तमाम नस्लें तबाह हो गई थीं. कुछ उड़ने वाले छोटे डायनासोर ही इस तबाही से बच सके थे. बाद में डायनासोर की ये नस्लें परिंदों में तब्दील हो गईं.

मगर, आज वैज्ञानिक ये सोचते हैं कि अगर वो एस्टेरॉयड धरती से न टकराया होता, तो क्या होता? या फिर अगर वो क्षुद्र ग्रह कुछ मिनट पहले धरती से टकराया होता. तो ये आज के मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप के बजाय गहरे समंदर में गिरा होता. इससे उतनी तबाही नहीं मचती, जितनी असल में मचती.

हाल ही में बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री के लिए कई वैज्ञानिकों ने ऐसी संभावनाएं तलाशी थीं. इनमें अमरीका की टेक्सस यूनिवर्सिटी के शॉन गुलिक भी थी. वो भूवैज्ञानिक हैं. शॉन का मानना है कि अगर वो एस्टेरॉयड कुछ लम्हा पहले या बाद में धरती से टकराता तो या तो वो अटलांटिक महासागर में गिरता, या फिर प्रशांत महासागर में. इससे जो आग निकली, जो सल्फ़र का धुआं निकला, उसका असर धरती पर कम पड़ता.

ऐसा होता तो डायनासोर की नस्ल हमेशा के लिए नहीं ख़त्म होती. कुछ डायनासोर आज भी ज़िंदा होते. हालांकि उसके बाद भी धरती ने क़यामत के कई मंज़र देखे. शायद उनमें से भी कुछ बड़े डायनासोर बच जाते.

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आज के डायनासोर कैसे होते?

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क्योंकि विकास के सिद्धांत के मुताबिक़, डायनासोर को भी बचे रहने के लिए धरती के बदलते माहौल के हिसाब से ख़ुद को ढालना पड़ता. तब हो सकता है कि कुछ डायनासोर हमेशा के लिए ख़त्म हो जाते. और शायद कुछ नस्लें बच भी जातीं. और अगर जो वो डायनासोर बच जाते, तो क्या वो इंसानों के बराबर अक़्लमंद होते?

अगर डायनासोर होते तो आज के जो स्तनधारी जीव हैं, उनका क्या हश्र होता? क्या फिर इंसान और डायनासोर साथ-साथ धरती पर रहते? इस बात की कल्पना 2015 में बनी फ़िल्म 'द गुड डायनासोर' में की गई है.

कई वैज्ञानिक मानते हैं कि 6.6 करो़ड़ साल पहले अगर एस्टेरॉयड धरती से नहीं भी टकराया होता तो डायनासोर का युग ख़ात्मे के कगार पर पहुंच जाता.

ब्रिटेन की ब्रिस्टॉल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक माइक बेंटन कहते हैं कि धरती का माहौल सर्द हो रहा था, ऐसे में डायनासोर का बचना कमोबेश नामुमकिन सा था. वो धरती के क्रिटेशियस युग के आख़िरी दिनों में बमुश्किल ख़ुद को बचाए हुए थे. एस्टेरॉयड की टक्कर से क़रीब चार करोड़ साल पहले से डायनासोर की नस्ल का पतन हो रहा था.

बेंटन के मुताबिक़ आज की ही तरह, तब भी डायनासोर का नहीं, स्तनधारी जीवों का धरती पर बोलबाला होता.

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डायनासोर की सैकड़ों नस्लें बची रहीं

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डायनासोर क़रीब 23 करोड़ साल पहले विकसित हुए थे. वो आज के रेप्टाइल यानी सांप-छिपकली और मगरमच्छ के पूर्वज थे. इनमें से कुछ उड़ने वाले डायनासोर भी थे, जो आज के पक्षियों के पूर्वज थे.

वैज्ञानिकों ने अब तक मिले कंकालों की मदद से डायनासोर की क़रीब एक हज़ार नस्लों का पता लगाया है. इनमें से कुछ शाकाहारी थे, तो कुछ मांसाहारी. ज़्यादातर डायनासोर विशाल आकार के हुआ करते थे. मगर कुछ इंसानों से भी छोटे थे. डायनासोर चार पैरों वाले भी होते थे और दो पैरों वाले भी. कुछ प्रजातियां उड़ भी सकती थीं. ये पूरी दुनिया में पाये जाते थे. डायनासोर की कुछ नस्लों के कंकाल भारत में भी मिले हैं, जो ज्वालामुखी के लावा की वजह से ख़त्म हो गए थे.

मांसाहारी डायनासोर पर रिसर्च करने वाले अमरीकी विशेषज्ञ टॉम होल्त्ज़ मानते हैं कि डायनासोर की ज़्यादातर नस्लें आज ख़त्म हो गई होतीं. मगर उन्हें ये यक़ीन है कि कुछ प्रजातियां आज भी बची होतीं, अगर धरती से एस्टेरॉयड की टक्कर नहीं होती.

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स्कॉटलैंड की एडिनबरा यूनिवर्सीट के स्टीफ़ेन ब्रुसेट का भी यही मानना है. स्टीफ़ेन कहते हैं कि डायनासोर ने अपने दौर में बहुत बुरा वक़्त झेला. फिर भी उनकी सैकड़ों नस्लें बची रही थीं. 16 करोड़ साल तक डायनासोर का धरती पर राज रहा था. विकास की प्रक्रिया में ये इतना आसान नहीं था. वो धरती के बदलते माहौल के हिसाब से ख़ुद को ढालते आ रहे थे.

तो, अगर डायनासोर आज भी ज़िंदा होते, तो उनके लिए चुनौतियां क्या-क्या होतीं?

पहली चुनौती तो धरती की बदलती आबो-हवा होती. उनके दौर में धरती का तापमान आज से 8 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा था. तब आज से ज़्यादा जंगल थे, जिनसे उन्हें आसानी से चारा मिल जाता था.

इस माहौल में कुछ सॉरोपॉड डायनासोर ज़िंदा रह जाते. वो आज की गायों के बराबर के होते. ऐसे कुछ डायनासोर के जीवाश्म यूरोप में मिले हैं. क्योंकि जब क़यामत आई, तो 131 फुट लंबे टाइटैनोसॉर्स का दौर ख़त्म हो चुका था.

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पेड़-पौधों पर निर्भर रहते

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डायनासोर के दौर में धरती पर पाए जाने वाले पेड़-पौधे भी तेज़ी से बदल रहे थे. अगर विकास की वही प्रक्रिया होती, तो डायनासोर फूलों वाले पेड़-पौधों पर ज़िंदगी बसर कर रहे होते. ये कुछ आज के स्तनधारी घास खाने वाले जीवों जैसा ही होता.

फूल वाले पौधों के साथ ही धरती पर फल वाले पौधे भी विकसित हो रहे थे. उसी दौर में धरती पर स्तनधारी जीव और परिंदे भी विकसित हो रहे थे. शायद उड़ने वाले डायनासोर भी तब अपने आप को बचा पाते. वो फलों को खाकर खुद को बचाकर रखते. हो सकता है कि इनमें से कुछ डायनासोर बंदरों और चिंपैंजी जैसे पेड़ों पर बसर करते. शायद!

आज से क़रीब साढ़े तीन करो़ साल पहले दक्षिण अमरीका, अंटार्कटिका से अलग हो गया था. अंटार्कटिका पर भारी बर्फ़बारी की वजह से धरती के कई हिस्से सूख रहे थे. जंगलों की जगह घास के मैदान विकसित हो रहे थे. उसी दौर में घोड़े, जिराफ जैसे स्तनधारी चौपाए विकसित हो रहे थे. वैज्ञानिक मानते हैं कि डायनासोर की कुछ नस्लें भी इसी तरह अपने-आप को बदलकर बचाने में कामयाब होतीं.

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शायद वो आज के दरियाई घोड़े या गैंडों जैसे होते. ढेर सारे दांतों वाले हाड्रोसॉर्स के जीवाश्म हमें मिले ही हैं, जिनके एक हज़ार दांत हुआ करते थे. जबकि आज के घोड़ों के चालीस दांत ही होते हैं. अब जिसके पास इतने दांत हों, उसके लिए चारा यानी घास चबाना आसान होता.

डायनासोर की आंखें भी तेज़ हुआ करती थीं. इसलिए वो अपने क़रीब आते ख़तरे को भी दूर से ही पहचान लेते. इसीलिए आज के घोड़ों या गायों के मुक़ाबले उनके बचने की उम्मीद ज़्यादा थी.

कुछ उड़ने वाले डायनासोर, आज के चमगादड़ों की तरह ही ख़ुद को बदलते माहौल के हिसाब से ढाल लेते. या शायद सांप-छिपकलियों की तरह वो बिल बनाना सीख जाते.

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समुद्र में भी रहते

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वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि डायनासोर की कुछ नस्लें शायद अपने आप को समंदर में रहने लायक़ बना लेतीं. क्योंकि डायनासोर के सारे ही जीवाश्म ज़मीन पर रहने वाले मिले हैं. बहुत से विशाल डायनासोर आज की व्हेलों की तरह, समंदर को अपना आशियाना बना सकते थे. और अंडे देने के लिए ज़मीन पर आते. इक्थियोसॉर्स और प्लेसियोसॉर्स जैसे कुछ डायनासोर ऐसा ही करते थे.

अगर ज़मीन पर, हवा में या समंदर में रहने वाले डायनासोर आज भी बचे रहते, तो आज के परिंदों या स्तनधारी जीवों का फिर क्या होता?

वैज्ञानिक टॉम होल्त्ज़ मानते हैं कि परिंदे तो पहले ही ख़ुद को डायनासोर के साथ रहने के लिए ढाल चुके थे.

अब अगर डायनासोर की नस्लें आज तक ज़िंदा होतीं, तो उनके शरीर के साथ-साथ उनका दिमाग़ भी विकसित होता.

तो क्या आज अगर डायनासोर होते, तो उनकी अक़्ल इंसानों के बराबर या उन से ज़्यादा होती?

अगर ऐसा होता, तो शायद वो आज की साइंस-फिक्शन फ़िल्मों में दिखने वाले एलियन्स जैसे होते!

या शायद ऐसा नहीं होता. हां, वो आज की गायों, घोड़ों और तोतों जैसे दिखने वाले होते. उनका मुक़ाबला इंसानों से नहीं, दूसरे जानवरों से होता. और फिर जो बच रहते, वो इंसानों के साथ आराम से धरती पर रहते.

पर ये सब तब होता, जब वो एस्टेरॉयड धरती से नहीं टकराई होती. पर ऐसा हुआ और डायनासोर ख़त्म हो गए.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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