अंतरिक्ष यात्री बनने के लिए किन बातों का होना ज़रूरी?

  • 27 नवंबर 2017
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Image caption आम तौर पर अंतरिक्ष यात्री एयरफ़ोर्स के बेहतरीन पायलट होते हैं

अंतरिक्ष की सैर का सपना तो हम में से बहुत से लोग देखते हैं. लेकिन अंतरिक्ष यात्री बनना आसान नहीं है. इसके लिए आम से ख़ास बनना पड़ता है.

मसलन आप में तुरंत फ़ैसला करने की क़ाबिलियत होनी चाहिए. आपकी सेहत आम लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा बेहतर होनी चाहिए. दबाव होने के बावजूद आपका ज़हनी सुकून डगमगाना नहीं चाहिए. एक अंतरिक्ष यात्री बनने के लिए ये चंद बुनियादी बातें हैं जिन्हें 'द राइट स्टफ़' कहा जाता है.

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Image caption अंतरिक्ष यात्रियों को ब्रह्मांड में मौजूद रेडिएशन झेलना पड़ता है

अंतिरक्ष यात्री बनने की शर्तें

आम तौर से अंतरिक्ष यात्री एयरफ़ोर्स के बेहतरीन पायलट होते हैं. 1950 में नासा ने भी अपना पहला अंतरिक्ष यात्री एयरफ़ोर्स के पायलट को ही चुना था. यही काम सोवियत संघ ने भी किया था.

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि सोवियत संघ ने इस क्षेत्र में महिलाओं को भी शामिल कर लिया था. साथ ही लंबाई की बंदिश लगा दी. यानी किसी भी अंतरिक्ष यात्री की लंबाई पांच फ़ीट छह इंच से ज़्यादा नहीं हो सकती थी.

क़रीब 60 साल से रिसर्च के लिए इंसान अंतरिक्ष में जा रहे हैं. लेकिन वहां जाने के लिए शर्तें आज भी वही हैं.

मिसाल के लिए 2009 में यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने अपने यहां छह अंतरिक्ष यात्री भर्ती किए. इनमें से तीन फ़ौज के पायलट हैं. एक पेशेवर पायलट है. एक स्काई डाइवर है. जबकि, एक पर्वतारोही है.

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आसान नहीं है अंतरिक्ष में रह पाना

कोशिश यही रहती है कि बेहतरीन लोगों को ही अंतरिक्ष में भेजा जाए. लेकिन आम इंसान का अंतरिक्ष में रह पाना आसान नहीं होता है.

ज़मीन पर हम ऑक्सीजन के ग़िलाफ़ में रहते हैं. इसके बिना इंसानी वजूद की कल्पना नहीं की जा सकती.

लेकिन धरती से दूर अंतरिक्ष में रहने वाले बनावटी सांसों के सहारे जीते हैं. उन्हें ब्रह्मांड में मौजूद रेडिएशन झेलना पड़ता है. इसका सीधा असर उनकी सेहत पर पड़ता है. शरीर कमज़ोर पड़ने लगता है. हर समय मतली महसूस होती रहती है. आंखें कमज़ोर हो जाती हैं. कमज़ोरी इतनी बढ़ जाती है कि बीमारियों से लड़ने की क़ुव्वत नहीं रहती.

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क्या होती हैं परेशानियां?

अंतरिक्ष यात्री ल्यूका परमितानो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में क़रीब साढ़े पांच महीने रहे. वो कहते हैं कि जैसे-जैसे दिन गुज़रते जाते हैं, आपकी टांगें ख़ुद आपको ही कमज़ोर और पतली महसूस होने लगती हैं. चेहरा गोल होने लगता है. वापस धरती पर आने के बाद भी नॉर्मल होने में काफ़ी समय लग जाता है.

अंतरिक्ष में शुरुआत के दिनों में एक ही दिशा में चलना पड़ता है. छह महीने बाद आप धीरे-धीरे दूसरी दिशाओं में घूमना शुरू कर देते हैं. स्पेस स्टेशन की जगह को पहचानना शुरू करते हैं.

ज़ीरो गुरुत्वाकर्षण की वजह से अंतरिक्ष यात्री हवा में ही झूलते रहते हैं. लिहाज़ा आपकी टांगों का कोई काम नहीं रहता. अंतरिक्ष में बहुत लंबे समय तक टिक पाना आसान नहीं है.

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अंतरिक्ष में बस्तियां बसाना आसान नहीं

अंतरिक्ष यात्री वैलेरी पोलियाकोव ने अब तक अंतरिक्ष में सबसे लंबा समय गुज़ारा है. वो 437 दिन तक अंतरिक्ष में रहे. हालांकि विचार किया जा रहा है कि अंतरिक्ष में ही ऐसी व्यवस्था की जाएं जहां रिसर्चर फिट रह सकें.

इसके लिए सबसे अहम है, उन्हें रेडिएशन से बचाना. साथ ही उनके लिए लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की व्यवस्था होना भी ज़रूरी है. इस सिलसिले में कई वर्कशॉप भी की जा चुकी हैं.

अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने पर चर्चा हुई है. इस वर्कशॉप में इंजीनियर, वैज्ञानिक और बड़े रिसर्चर शामिल हुए थे.

अमरीकी न्यूरो साइंटिस्ट रॉबर्ट हेम्पसन मानते हैं कि अंतरिक्ष में बस्तियां बसाना आसान काम नहीं. साथ ही इस काम को करने में लंबा समय लगेगा. तब तक अंतरिक्ष में जाने वालों को ही इस लायक़ बनाने की ज़रूरत है कि वो वहां के माहौल के मुताबिक़ ख़ुद को ढाल सकें और सेहतमंद रह सकें.

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क्या हैं मुश्किलें?

अंतरिक्ष में जिस तरह की बस्तियां बसाने की बात की जा रही है, वो सुनने में तो सहज लगती है.

लेकिन असल में इसके नुक़सान ज़्यादा हैं. मिसाल के लिए अगर आज किसी नौजवान को ऐसी किसी कॉलोनी में भेजा जाएगा, तो उसकी आने वाली पीढ़ी धरती पर रहने लायक़ नहीं रहेगी. उसका शरीर अंतरिक्ष के माहौल के मुताबिक़ ही ढल जाएगा. उनकी ज़िंदगी धरती पर रहने वालों से जुदा होगी.

अंतरिक्ष के लिए एक इंसानों की नई नस्ल तैयार करना आसान नहीं है. लिहाज़ा बेहतर है कि धरती पर ही इंसानों को अंतरिक्ष के लिए तैयार किया जाए.

हालांकि एक ऐसी दुनिया का ख़याल दिलचस्प है जिसमें इंसान हवा में तैरते रहें. विज्ञान फंतासी वाली फ़िल्मों में हम ऐसी दुनिया देख चुके हैं. पर इन्हें हक़ीक़त का जामा पहनाना फ़िलहाल तो मुमकिन नहीं.

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