किस वजह से धंस रही है दुनिया भर की ज़मीन?

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Image caption इंडोनेशिया का जकार्ता शहर समुद्र का जलस्तर बढ़ने और ज़मीन धंसने की चुनौती से जूझ रहा है

क्या आप को पता है कि हमारे देश में पीने के पानी का सबसे बड़ा ज़रिया क्या है?

जवाब में आप नदी, झील या तालाब का नाम नहीं लें. क्योंकि सही जवाब ये है कि भारत में 85 फ़ीसदी पीने का पानी ज़मीन से निकाला जाता है. ये दुनिया में सबसे ज़्यादा है. हम बहुत तेज़ी से ज़मीन के भीतर से पानी खींचकर निकाल रहे हैं. हमें इसके भयंकर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं.

सिर्फ़ पानी स्तर ही इससे नीचे नहीं जाता. ज़रूरत से ज़्यादा पानी ज़मीन से निकालने से कई और नुक़सान भी होते हैं.

आज अमरीका के मयामी से लेकर इंडोनेशिया के जकार्ता तक ज़मीन धंस रही है. नतीजा ये हो रहा है कि पानी शहरों में घुस रहा है.

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता को ही लीजिए. ये शहर समंदर के क़रीब है. इसकी ज़मीन धंसने की वजह से अक्सर समुद्र का पानी शहर में घुस आता है. जब ज्वार आता है, तो जकार्ता की कई बस्तियां डूबने लगती हैं. इंडोनेशिया ने इससे बचने के लिए समंदर किनारे दीवारें तक बनाई हैं. मगर इस मुश्किल का स्थायी हल नहीं निकल सका है. आज की तारीख़ में जकार्ता शहर हर साल 17 सेंटीमीटर की रफ़्तार से धंस रहा है.

अमरीकी जियोलॉजिकल सर्वे की एक्सपर्ट मिशेल स्नीड कहती हैं कि लोग इसे ग्लोबल वॉर्मिंग से जोड़कर देखते हैं. इसे लेकर पूरी दुनिया फ़िक्रमंद है. लेकिन, वो ग़लत है. असल में समुद्र का पानी तो बढ़ ही रहा है. लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में ज़मीन भी धंस रही है.

दोनों अलग-अलग समस्याएं हैं. हां जिन जगहों पर ये दोनों चुनौतियां एक साथ उठ खड़ी हुई हैं, उन्हें ज़्यादा मुश्किल हो रही है. जकार्ता ऐसी ही जगह है, जो समुद्र के बढ़ते पानी और ज़मीन धंसने की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है.

जकार्ता की तरह मेक्सिको की राजधानी मेक्सिको सिटी और अमरीका का सैन जोआचिन इलाक़ा भी लगातार और बहुत तेज़ी से धंस रहा है.

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Image caption ज़मीन धंसने की समस्या स्थानीय है

ज़मीन से पानी निकालना जुर्म

मगर अच्छी बात ये है कि ज़मीन धंसने की ये घटनाएं बहुत स्थानीय स्तर की हैं. नीदरलैंड की उट्रेख्ट यूनिवर्सिटी के जियोलॉजिस्ट गाइल्स एर्केंस कहते हैं कि समंदर में पानी बढ़ना पूरी दुनिया के लिए चुनौती है. वहीं, ज़मीन धंसने की समस्या स्थानीय है. जिससे कई देश अपने-अपने तरीक़े से निपट रहे हैं.

शंघाई और टोक्यो जैसे देशों ने इस परेशानी पर कमोबेश क़ाबू पा लिया है. इन शहरों में ज़मीन से पानी निकालने के काम की सख़्त निगरानी हो रही है. इन शहरों ने सख़्त क़ानून बनाकर भूगर्भ जल निकालने को जुर्म बना दिया है. साथ ही शहर की पानी की ज़रूरत पूरी करने के नए तरीक़े भी तलाश लिए हैं.

जानकार बताते हैं कि ज़मीन में थोड़ी-बहुत उठापटक तो हज़ारों साल से चली आ रही है. जैसे कि पिछले बर्फ़ युग के बाद से ग्रीनलैंड और कनाडा में ज़मीन धंस रही है. उसके बरअक्स अटलांटिक महासागर में कई जगह ज़मीन ऊपर भी उठ रही है. मगर ये रफ़्तार एक या दो मिलीमीटर प्रति वर्ष की है. जिसका असर भी किसी को नहीं पता चल रहा.

इसके मुक़ाबले ज़मीन से पानी के बेतहाशा दोहन से मेक्सिको सिटी, सैन जोआचिन और वर्जिनिया का हैम्पटन रोड इलाक़ा लगातार धंस रहा है.

इटली की पादुआ यूनिवर्सिटी की सिमोन फियाशी कहती हैं कि आप ज़मीन से कुछ निकालते हैं, तो अंदर वो जगह ख़ाली रह जाती है. अब आपने पानी निकाला, तो ज़मीन के भीतर की मिट्टी सिकुड़ जाती है. बारिश का पानी रिसकर ज़मीन के भीतर पहुंचता है. मगर जितनी तेज़ी से पानी निकाला जाता है, उतनी तेज़ी से ज़मीन पानी दोबारा नहीं सोख पा रही है. नतीजा ये कि ज़मीन धंसने लगती है.

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Image caption मैक्सिको सिटी के इलाके भी धंस रहे हैं

50 साल में ज़मीन से पानी ख़त्म होने का ख़तरा

आज की तारीख़ में भारत अपने पीने के पानी की कुल ज़रूरत का 85 फ़ीसद भूगर्भ जल से पूरा करता है. यूरोप में 75 प्रतिशत पीने का पानी ज़मीन से निकाला जाता है.

वहीं अमरीका में सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर भूगर्भ जल का इस्तेमाल होता है. 2010 में अमरीका में फसलों की सिंचाई के लिए रोज़ाना क़रीब 50 अरब गैलन पानी ज़मीन से निकाला जा रहा था.

अब जितनी तेज़ी से पानी निकाला जा रहा है, उतनी तेज़ी से ज़मीन को इसकी आपूर्ति तो हो नहीं रही है. यही वजह है कि कैलिफ़ोर्निया के सैन जोआचिन में ज़मीन बहुत तेज़ी से धंस रही है.

मेक्सिको सिटी का भी यही हाल है. शहर की क़रीब सवा दो करोड़ आबादी को पानी मुहैया कराने के लिए भारी पैमाने पर ज़मीन से पानी निकाला जाता है. इसका 41 फ़ीसद हिस्सा तो सप्लाई के दौरान बर्बाद हो जाता है.

जिस रफ़्तार से मेक्सिको सिटी में पानी निकाला जा रहा है, उससे अगले 50 सालों में तो ज़मीन का पानी ही ख़त्म हो जाएगा. इतनी तेज़ी से भूगर्भ जल के दोहन से मेक्सिको सिटी के कुछ हिस्से 30 सेंटीमीटर यानी एक फुट हर साल की दर से धंस रहे हैं.

ज़मीन धंसने की वजह से मेक्सिको सिटी अजब से दुष्चक्र में फंस गया है. ज़मीन के भीतर बिछाई गई पुरानी पाइपलाइनें ज़मीन धंसने से टूट रही हैं. इससे काफ़ी पानी बर्बाद हो जाता है. लिहाज़ा ज़मीन से और पानी निकाला जा रहा है. इससे ज़मीन धंसने की रफ़्तार और तेज़ हो गई है. शहर की कई पुरानी इमारतें ख़तरे में हैं.

नीदरलैंड के एक्सपर्ट गाइल्स एर्केंस कहते हैं कि दुनिया भर में ऐसी कितनी घटनाएं हो रही हैं, इसका कोई आंकड़ा आज मौजूद नहीं है. लेकिन वैज्ञानिकों ने ये बात ज़रूर देखी है कि जहां ज़मीन से पानी खींचने की रफ़्तार कम हुई है, वहां ज़मीन धंसने की रफ़्तार भी धीमी पड़ी है.

टोक्यो शहर इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. 1968 में टोक्यो में हर साल 24 सेंटीमीटर की दर से ज़मीन धंस रही थी. उस वक़्त वहां रोज़ाना क़रीब 33 करोड़ गैलन पानी रोज़ ज़मीन से निकाला जा रहा था. टोक्यो ने हालात पर क़ाबू पाने के लिए कई कड़े कानून बनाए. साल 2000 के आते-आते टोक्यो में ज़मीन धंसने की रफ़्तार 0.4 सेंटीमीटर प्रति वर्ष रह गई थी.

मगर हर जगह ये फॉर्मूला नहीं दोहराया जा सकता. आख़िर जिन इलाक़ों में ज़मीन से पानी निकाला जा रहा है, उनके पास इसका विकल्प भी तो होना चाहिए.

इस मोर्चे पर अमरीका के सैन जोआचिन इलाक़े ने रास्ता दिखाया है. यहां पानी के ज़बरदस्त दोहन से हर साल दो फुट की रफ़्तार से जम़ीन धंस रही थी. फिर यहां के प्लानर्स ने ये तय किया कि जो पानी इस्तेमाल के बाद बर्बाद होता है, उसे साफ़ करके दोबारा जमा किया जाए. उसका फिर से इस्तेमाल हो. ताकि जम़ीन से पानी निकालने का सिलसिला कम हो.

अभी इस योजना पर काम शुरू हुआ है. इस दौरान सैन जोआचिन में बनाई गई नहरें, ज़मीन धंसने की वजह से टूटने लगी हैं. पुल धंस रहे हैं. यानी कैलिफ़ोर्निया के इस इलाक़े को ख़ुद को धंसने से बचाने के लिए और तेज़ी से काम करने की ज़रूरत है.

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Image caption सैन जोआचिन में पुल धंस रहे हैं

वापस खाली जगह भरना मुश्किल

कुछ इसी तरह के फॉर्मूले पर शंघाई ने अमल किया था. उसने दूसरी जगह से पानी लाकर शंघाई के आस-पास की झीलों और तालाबों को लबालब किया. नतीजा ये कि ज़मीन से पानी का दोहन कम हुआ. शहर के धंसने की रफ़्तार भी धीमी हुई.

अब अमरीका के वर्जिनिया सूबे का हैंपटन रोड्स इलाक़ा भी इसी फ़ॉर्मूले पर अमल करने की कोशिश कर रहा है. यहां पर भी भूगर्भ जल का बड़े पैमाने पर दोहन हो रहा है. सिर्फ़ इसी की वजह से हैम्पटन रोड्स इलाक़े में ज़मीन क़रीब 3 मिलीमीटर हर साल की दर से धंस रही है. ज़मीन बराबर है. इसलिए इतनी मामूली धंसान भी काफ़ी फ़र्क डालती है. अब यहां का प्रशासन भी गंदे पानी को साफ़ करके पोटोमैक नदी में दोबारा डालने की योजना पर काम कर रहा है. ताकि ज़रूरत का पानी ज़मीन से कम से कम निकाला जा सके.

हालांकि अमरीकी जियोलॉजिकल सर्वे के वैज्ञानिक डेविड नेल्म्स आगाह करते हैं कि ये समाधान हर जगह लागू कर पाना मुमकिन नहीं.

वो कहते हैं कि ज़मीन के भीतर मिट्टी और बालू की परत होती है. जब आप पानी निकालते हैं, तो दोनों परतें सिकुड़ती हैं. अगर आपने कोशिश करके पानी को दोबारा ज़मीन के भीतर पहुंचाया, तो बालू की परत तो दोबारा अपने रूप में आ जाएगी. मगर मिट्टी की सिकुड़ी हुई परत फिर से वैसी नहीं होगी. क्योंकि वो स्थायी तौर पर सिकुड़ चुकी है.

हालांकि, डेविड नेल्म्स कहते हैं कि हो सकता है कि कुछ जगहों पर हमें अपनी कोशिशों के अच्छे नतीजे देखने को मिलें.

भारत को भी दुनिया भर की इन मिसालों से सबक़ लेने की ज़रूरत है. क्योंकि हम तो दुनिया भर में सबसे ज़्यादा पानी ज़मीन से खींचकर निकाल रहे हैं. साल दर साल कम होती बारिश, सूखती नदियां और झीलें, हमारी परेशानी को और बड़ा कर रही हैं.

हमें सावधान होने की ज़रूरत है. वरना कहीं बहुत देर न हो जाए.

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