इन धीमी मौतों से बचाता है गीत-संगीत

  • 21 दिसंबर 2017
संगीत

संगीत में ख़ुदाई ताक़त होती है. अगर संगीत दिल से बजाया जाए तो मुर्दे में जान आ जाए. तानसेन के बारे में तो कहा जाता है कि उनके संगीत से दीये रौशन हो गए थे.

लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि संगीत से अल्ज़ाइमर जैसी बीमारी का इलाज हो सकता है.

अल्ज़ाइमर एक तरह की भूलने की बीमारी है. पुरानी कुछ यादें तो ज़हन में रह जाती हैं. लेकिन, कोई नई बात कभी याद रहती है, तो कभी नहीं. पुरानी यादें भी टुकड़ों में ज़िंदा रहती हैं.

मेरे पिता भी भूलने की इस बीमारी का शिकार हैं. उन्हें ये बीमारी 50 साल की उम्र में हुई थी. शुरुआत में उन्हें इतनी परेशानी नहीं होती थी.

लेकिन 70 की उम्र आते-आते तक अल्ज़ाइमर के मर्ज़ ने उनके पूरे दिमाग़ को अपनी चपेट में ले लिया. धीरे-धीरे शब्द उनके ज़हन से ग़ायब होने लगे. यहां तक कि वो अपनी मादरी ज़बान भी भूलने लगे.

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मेरे पिता कहते हैं कि अपने जीवन की कुछ ही बातें उन्हें याद हैं. लेकिन संगीत के प्रति उनके लगाव में कमी नहीं आई. 70 के दशक में वो बहुत चाव से ओपेरा देखने जाते थे. शास्त्रीय संगीत से उन्हें ख़ासा लगाव था. वो घर में भी तेज़ आवाज़ में संगीत सुनते थे.

आज उनके बोलने की क़ुव्वत भी धीमी पड़ चुकी है. उनका ज़हन जुमले नहीं बना पाता है. लेकिन संगीत उन्हें आज भी याद है.

पिछले दो सालों में म्यूज़िक थेरेपी के ज़रिए ही उन्होंने संगीत के नए हुनर सीखे हैं. वो वीणा पर नई-नई धुने बजाते रहे हैं. दिन में उन्हें कई मर्तबा गाते हैं.

उनकी याद में सिर्फ़ संगीत ही ज़िंदा है. इसीलिए मेरे पिता कई बार चलते-फिरते, भरी महफ़िल, किसी भी अहम ग़ुफ़्तगू के दरमियान गाना शुरू कर देते हैं. कभी सुर में गाते हैं तो कभी बेसुरा.

दिमाग़ के काम करने के तरीक़े का गणित समझने के लिए संगीत भी वैज्ञानिकों के लिए भी एक अहम रिसर्च टूल है.

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रिसर्चरों का कहना है कि संगीत में इतनी ताक़त होती है कि दिमाग़ के सभी तंत्रिकाओं को एक्टिव कर देता है. इसीलिए संगीत सुनकर इंसान झूमने लगता है.

अल्ज़ाइमर या डिमेंशिया जैसी बीमारी की कोई ख़ास वजह आज तक पता नहीं चल पाई है. ये बीमारी किसी सेहतमंद को भी हो सकती है.

ब्रिटेन में ही क़रीब आठ लाख पचास हज़ार लोग इस बीमारी का शिकार हैं. हालांकि ज़्यादातर लोगों को ये बीमारी उम्र के आख़री हिस्से में होती है. लेकिन कुछ लोगों में 40 या 50 की उम्र से ही इस बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं.

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हाल ही में अल्ज़ाइमर के एडवांस रूप से पीड़ित 91 साल की एक महिला पर रिसर्च की गई. जिनका नाम है नोरमा.

अपनी ज़िंदगी की कोई याद उनके ज़हन में ताज़ा नहीं है. ना ही वो किसी अपने को पहचान पाती हैं. लेकिन वो संगीत की नई धुनें सीखने के लिए तैयार रहती हैं. संगीत ही उन्हें सबसे ज़्यादा ख़ुशी देता है.

जानकारों का कहना है कि डिमेंशिया के मरीज़ अपने बेहतर दिनों में सुने गीत और धुनें याद रख सकते हैं. जिन्हें वो याद आने पर गुनगुनाने लगते हैं.

लेकिन नई धुन सीखना आसान नहीं होता जबकि नोरमा 91 साल की उम्र में ना सिर्फ़ नई धुनें सीख रही थीं, बल्कि उन्हें याद भी रख पा रही थीं. यहां तक की रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाले मुहावरे उन्हें उतने याद नहीं थे जितना कि अपने ज़माने के गाने याद थे.

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यक़ीनन उनके दिमाग़ में संगीत के लिए ख़ास जगह थी.

इसी तरह की केस स्टडी के आधार पर जानकार मानते हैं कि डिमेंशिया के मरीज़ों को संगीत की मदद से नए हुनर सिखाए जा सकते हैं. उनमें बढ़ते तनाव को भी कम किया जा सकता है.

यानी संगीत सिर्फ़ यादगार नहीं होता. बल्कि ये याददाश्त लौटाने में मददगार भी हो सकता है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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