बच्चों के जन्म को लेकर फैली तीन ग़लतफ़हमियों का सच

  • 22 दिसंबर 2017
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दुनिया में सिर्फ़ चार फ़ीसद बच्चे ही अपने सही वक़्त पर पैदा होते हैं. बाक़ी के 96 फ़ीसद में से कुछ बच्चे तय वक़्त से पहले, तो कुछ देर से दुनिया में आते हैं.

2002 में अमरीका के ओलिन कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग ने इस बात पर एक सर्वे कराया था. जिससे पता चलता है कि दूसरे या तीसरे बच्चे की पैदाइश के मुक़ाबले पहले बच्चे का जन्म अक्सर तय वक़्त से देर से होता है. समय पर पैदा होने वाले बच्चों से अगर तुलना की जाए, तो ये देरी महज़ कुछ घंटों की होती है. ज़्यादा से ज़्यादा 16 घंटे या उससे थोड़ा ज़्यादा.

मोटे तौर पर देखा जाए तो ये देरी कोई बहुत लंबा समय नहीं है. लिहाज़ा ये कहना ग़लत होगा कि पहले बच्चे की पैदाइश देर से होती है. इस मामले में यक़ीनी तौर पर कुछ भी कह पाना मुश्किल है. हरेक बच्चे के जन्म की कहानी अलग हो सकती है.

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गर्भधारण करने का वक्त बेहद अहम

एक रिसर्च के दौरान गर्भधारण करने वाली महिलाओं के पेशाब के सैंपल का रोज़ परीक्षण किया गया.

इससे रिसर्चर्स को सही तौर पर ये पता चल सका कि गर्भधारण करने वाली महिलाओं के शरीर में अंडे कब और कितनी देर के लिए पैदा हो रहे हैं. इसी के आधार पर तय किया गया कि बच्चे का जन्म कितने समय में हो जाएगा. लेकिन इस रिसर्च के बाद भी अलग अलग बच्चों की पैदाइश में क़रीब पांच हफ़्ते का फ़र्क़ पाया गया.

दूसरे या तीसरे बच्चे का जन्म कितने समय में हो जाएगा, ये भी बहुत हद तक गर्भधारण करने के समय पर निर्भर करता है. एक रिसर्च में पाया गया है कि अगर पहले बच्चे की पैदाइश के एक साल के भीतर ही फिर से गर्भधारण कर लिया जाता है, तो दूसरे बच्चे का जन्म जल्द हो जाता है.

कुछ रिसर्चरों का ये भी मानना है कि मां बनने वाली महिला को बच्चे की पैदाइश की सही तारीख़ नहीं बतानी चाहिए. क्योंकि जैसे जैसे डिलीवरी की तारीख़ नज़दीक आती जाती है, मां की बेचैनी बढ़ती जाती है. जब तक बच्चा पैदा नहीं हो जाता वो बेचैनी के आलम में रहती है. लिहाज़ा सही तारीख़ और वक़्त ना बताकर मां को इस ज़हनी तनाव से बचाया जा सकता है.

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तय वक्त पर प्रसव पीड़ा न हो तो?

बच्चा पैदा करना कोई हंसी खेल नहीं है. हालांकि ये एक फ़ितरी अमल है. लेकिन इसमें ख़तरा भी शामिल है. बुज़ुर्गों का कहना है कि बच्चे की पैदाइश के साथ मां का भी फिर से जन्म होता है.

अगर नियत तारीख़ बीत जाने के बाद भी प्रसव पीड़ा का कोई संकेत नहीं मिलता, तो बहुत सी महिलाएं देसी नुस्ख़े अपनाना शुरू कर देती हैं.

अमरीका में एक सर्वे के मुताबिक़, पचास फ़ीसद महिलाएं तेज़ मसाले वाले खाने खाना शुरू कर देती हैं. माना जाता है कि तेज़ मसाले वाले खाने से लेबर पेन यानी बच्चों की पैदाइश के वक़्त होने वाला दर्द जल्दी शुरू हो जाता है. हालांकि इस बात का कोई मेडिकल प्रमाण नहीं है. जो महिलाएं पहले से ही तेज़ मसाले खाती हैं, ज़रूरी नहीं ये तरकीब उनके लिए भी काम आए.

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थैली फटने का जल्दी पैदाइश से क्या है नाता?

पेट में बच्चा जिस थैली में रहता है उसमें पानी भरा रहता है. आपने बहुत सी फ़िल्मों में देखा होगा कि गर्भवती महिला को अचानक दर्द होता है और तेज़ी से उसके शरीर से पानी का रिसाव शुरू हो जाता है.

असल में ऐसा नहीं होता है. पानी की थैली फटने से पहले हल्का हल्का दर्द शुरू होता है. धीरे-धीरे ये दर्द बढ़ना शुरू होता है. जब बच्चा बिल्कुल बाहर आने वाला होता है तब ये थैली फटती है. बहुत मर्तबा तो थैली फटती ही नहीं है. डॉक्टर ही उसे फाड़कर बच्चा बाहर निकालते हैं. कई अगर थैली फट जाती है, तो पैदाइश जल्दी हो जाती है.

एक स्टडी में पाया गया है कि जिन महिलाओं की पानी की थैली फट जाती है उन्हें चौबीस घंटे के भीतर ही प्रसव पीड़ा शुरू हो जाती है. ये भी संभव है कि पानी एक साथ बाहर ना निकलकर धीरे धीरे रिसता रहे. लेकिन गर्भाशय से पानी का रिसाव होने के साथ ही संकेत मिल जाता है कि अब बस कुछ ही देर में नन्हा मेहमान दुनिया में आने वाला है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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