ऐसा विमान जो हेलिकॉप्टर भी बन जाता है, हवाई जहाज़ भी

  • 7 जनवरी 2018
उड़ान के भविष्य को आकार दे रही यूनिवर्सिटी

यूनिवर्सिटी में पढ़ाई होती है साइंस की, साहित्य की, इतिहास की, जुगराफ़िए की, इंजीनियरिंग की, मेडिकल की, मनोविज्ञान की...

मगर ब्रिटेन में एक अलग तरह की ही यूनिवर्सिटी है. वहां उड़ने की पढ़ाई होती है. इस उड़ान यूनिवर्सिटी का नाम है क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी. लंदन से क़रीब 64 किलोमीटर उत्तर में स्थित ये यूनिवर्सिटी एकदम अलग है. इसकी अपनी हवाई पट्टी और अपने विमान हैं.

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कॉलेज ऑफ़ एरोनॉटिक्स

क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी को दूसरे विश्व युद्ध के बाद द कॉलेज ऑफ़ एरोनॉटिक्स के तौर पर स्थापित किया गया था. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यहां पर ख़ुफ़िया हवाई अड्डा था. यहां के विशाल हैंगर्स में विमान छुपाकर रखे जाते थे. जंग ख़त्म हुई, तो इस हवाई अड्डे को कॉलेज में बदल दिया गया.

क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी को अमरीका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की तर्ज पर स्थापित किया गया था. इस यूनिवर्सिटी में चार हैंगर हैं, जो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान विमान रखने के लिए बनाए गए थे. वहीं, यहां पर पांच विंड टनल हैं, जिनमें विमानों पर हवा के दबाव का टेस्ट किया जाता है.

आजकल क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी में विमानन क्षेत्र का बड़ा रिसर्च हो रहा है. इसमें बोइंग, साब ऐंड थेल्स और डार्टेक जैसी बड़ी विमान कंपनियां पैसा लगा रही हैं.

इस रिसर्च का मक़सद डिजिटल एयर ट्रैफिक कंट्रोल और मानव रहित विमान से हवाई उड़ानों को परखना है. इसके लिए यूनिवर्सिटी की हवाई पट्टी को नए सिरे से तैयार किया जा रहा है. यहां पर डिजिटल एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम भी लगाया जा रहा है.

इस यूनिवर्सिटी में 1970 के दशक में नेशनल फ्लाइंल लैबोरेटरी भी बनाई गई थी. इसमें आज की तारीख में दुनिया भर के 1200 छात्रों को एयरक्राफ्ट इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई जाती है. ताकि वो भविष्य के विमानों का डिज़ाइन तैयार कर सकें.

इस लैब में दुनिया की कई बड़ी कंपनियों जैसे रॉल्स रॉयस, बीएई सिस्टम्स और एयरबस के लिए रिसर्च भी होती है.

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ज़माना रोबोटिक्स का

ब्रिटेन के एविएशन एक्सपर्ट निक लॉसन इस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. वो पहले पायलट रह चुके हैं. आजकल वो लोगों को एविएशन की पढ़ाई कराने के साथ-साथ एविएशन में नए तजुर्बों पर रिसर्च करते रहते हैं.

क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी की नेशनल फ्लाइंग लैब में पढ़ने वाले छात्रों को नए विमानों के डिज़ाइन तैयार करने की पढ़ाई कराई जाती है. ताकि वो हल्के, फुर्तीले और मज़बूत विमान बना सकें.

आज ज़माना रोबोटिक्स का है. तो इन छात्रों को बिना इंसानों के चलने वाले विमान बनाने की चुनौती मिली है. निक लॉसन ऐसे ही छात्रों को उड़ान पर ले जाते हैं, ताकि वो फ्लाइट के दौरान हवा के दबाव और दूसरी चुनौतियों को समझ सकें. तभी तो वो मानवरहित ऐसे विमान बना सकेंगे, जो ख़ुद से उड़ सकें और लोगों को सुरक्षित सफ़र करा सकें.

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बेहद अनोखा विमान है डेमन

इस यूनिवर्सिटी में एक ऐसा विमान तैयार किया गया है, जो हेलीकॉप्टर भी बन जाता है और हवाई जहाज़ भी. इसी तरह बिना पंखों वाला भी एक विमान यहां तैयार किया गया है, जिसका नाम रखा गया है डेमन. ये हवा की मदद से अपना संतुलन बनाता है.

इस यूनिवर्सिटी के पास साठ और सत्तर के दशक के विमान भी हैं, जिन्हें आजकल ट्रेनिंग और नुमाइश के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यहां ब्रिटेन का मशहूर बुलडॉग सिंगल इंजन ट्रेनिंग विमान भी है, जिसे आज भी इस्तेमाल किया जाता है.

निक लॉसन आजकल एक बहुत बड़ी रिसर्च पर काम कर रहे हैं. वो ऐसे फाइबर ऑप्टिक्स तैयार कर रहे हैं, जिनका विमानों और हेलीकॉप्टर के पंख बनाने में इस्तेमाल होगा. इनमें सेसर लगे होंगे, जो ख़ुद ब ख़ुद हवा के दबाव के हिसाब से विमान और हेलीकॉप्टर की रफ़्तार और दशा-दिशा तय कर लेंगे.

निक लॉसन के इस प्रोजेक्ट का नाम है विंडी. अभी इस तकनीक का विंड टनल में परीक्षण किया जा रहा है. जल्द ही इस तकनीक से लैस छोटे विमान उड़ाने की भी योजना है. लॉसन यही तकनीक एयरबस के हेलीकॉप्टर पर भी आज़मा रहे हैं. वहीं रॉल्स-रॉयस कंपनी ऐसी ही सेंसर तकनीक से लैस इंजन बनाने के लिए भी निक लॉसन की मदद ले रही है. ये भविष्य की तकनीक है, जो विमानन क्षेत्र में इंक़लाब ला देगी.

निक लॉसन कहते हैं कि नए रिसर्च के लिए अक्सर पैसे की कमी हो जाती है. लेकिन आजकल बड़ी कंपनियां और सरकार भी, नई तकनीक के लिए उन्हें कुछ पैसे दे रही हैं.

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नए झंडे गाड़ रही यूनिवर्सिटी

निक लॉसन कहते हैं कि यूनिवर्सिटी में मौजूद संसाधनों की मदद से नई-नई तकनीक का परीक्षण किया जाता है. इस वजह से एयर ट्रैफिक कंट्रोल के सिस्टम बेहतर हुए हैं. आजकल यूनिवर्सिटी में ड्रोन के टेस्ट पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है.

जुलाई 2008 में इस यूनिवर्सिटी में एक ड्रोन ने बिना किसी इंसानी दखल के क़रीब 1290 किलोमीटर की उड़ान भरी थी. ये बहुत बड़ी उड़ान थी.

आजकल यूनिवर्सिटी की नेशनल फ्लाइंग लैब, बीएई सिस्टम्स की मदद से इस ड्रोन को व्यापक इस्तेमाल के लिए तैयार कर रही है. इनका इस्तेमाल ब्रिटिश वायुसेना करेगी.

निक लॉसन और उनकी टीम नई पीढ़ी के यूएवी का भी परीक्षण इस यूनिवर्सिटी में कर रहे हैं. इनमें 4जी नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि ये यूएवी अपने लक्ष्य पर सटीक प्रहार कर सकें. इनकी मदद से लोगों को इंटरनेट मुहैया कराने की भी कोशिश की जा रही है.

कुल मिलाकर ब्रिटेन की ये यूनिवर्सिटी, आसमान में इंसानी अक़्ल के नए झंडे गाड़ रही है.

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