हमलोग क्या निशानी छोड़ेंगे आने वाले युग के लिए?

  • 23 फरवरी 2018
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हमारी धरती करोड़ों साल पुरानी है. इस दौरान इस पर कई युग बीत चुके हैं. धरती ने बहुत सी विपदाएं झेली हैं. हज़ारों जीवों को हमेशा के लिए ख़त्म होते देखा है. हर बीता दौर, धरती पर अपने निशां छोड़ता गया है.

कैसे होते हैं लाखों-करोड़ों साल पहले बीत चुके युगों के निशान?

चलिए, पहले आपको 25 करोड़ साल पहले हुई एक घटना के बारे में बताते हैं. क़रीब 25 करोड़ 20 लाख साल पहले, धरती पर भयंकर ज्वालामुखी विस्फ़ोट हुए थे. इन ज्वालामुखी विस्फ़ोटों की वजह से धरती पर क़यामत-सी आ गई. दुनिया से ज़िंदगी कमोबेश पूरी तरह ख़त्म हो गई.

भू-वैज्ञानिक उस घटना को धरती पर हुई सबसे बड़ी तबाही बताते हैं. धरती पर उस वक़्त पल रहे 90 फ़ीसद जीव-जंतु ख़त्म हो गए. ज्वालामुखी विस्फोटों की उस तबाही से धरती पर उस वक़्त चल रहा पर्मियन युग ख़त्म हो गया. और एक नए युग ट्राइएसिक की शुरुआत हुई.

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अब सिर्फ़ इस घटना को बयां कर दिया जाए, तो कौन 25 करोड़ साल पहले हुई क़ुदरती घटना पर यक़ीन करेगा. हर किसी को इस बात पर यक़ीन करने के लिए सबूत चाहिए. तो, साहब सबूत हैं न. इस महाप्रलय के निशान आज भी धरती पर मौजूद हैं.

आप को इसके लिए दक्षिणी चीन जाना होगा. चीन के शिन्जियांग सूबे के मीशान नाम की जगह पर एक सीधी खड़ी चट्टान है. इस चट्टान को उस क़यामत का सबसे बड़ा सबूत माना जाता है, जिसने धरती पर पर्मियन युग का ख़ात्मा और ट्राइएसिक युग का आग़ाज़ किया था.

2001 में क़रीब 20 साल की मशक़्क़त के बाद दुनिया भर के भू-वैज्ञानिकों ने माना था कि मीशान की वो क्लिफ़ ही, 25 करोड़ साल पहले आए प्रलय का सबसे बड़ा सबूत है.

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Image caption मीशान में एक गांव के नज़दीक चट्टान

आख़िर इन दिनों धरती पर कौन सा युग चल रहा है?

इन दिनों धरती पर एंथ्रोपोसीन युग चल रहा है. और ये युग ज़्यादा पुराना नहीं. इसकी शुरुआत 1948 से यानी आज से 70 साल पहले की मानी जा रही है.

पर, इस भूगर्भीय सीमा रेखा की पहचान कैसे हो? कौन सी ऐसी जगह है, जो धरती के पुराने युग के ख़ात्मे और एंथ्रोपोसीन युग की शुरुआत की सबसे अच्छी गवाह है. दुनिया भर के भू-वैज्ञानिक इन दिनों ऐसी ही एक जगह तलाश रहे हैं, जहां हमारे दौर के युग यानी एंथ्रोपोसीन की शुरुआत के सबसे अच्छे निशान दर्ज हुए हैं.

नॉटिंघम स्थित ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे के कॉलिन वाटर्स, भू-वैज्ञानिकों की उस टीम का हिस्सा हैं. ये टीम दुनिया के अलग-अलग ठिकानों के विकल्प तलाश रही है, जिन्हें एंथ्रोपोसीन युग की शुरुआत का गवाह बनाया जा सके.

अब धरती पर हर गुज़रता लम्हा कुछ न कुछ निशान छोड़ता है. मगर, जैसा निशान 25 करोड़ साल पहले बनी चीन की वो चट्टान है, वो सिर्फ़ 70 साल पुराने एंथ्रोपोसीन युग में बन पाना असंभव है.

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क़ुदरती प्रक्रिया की अपनी रफ़्तार होती है. चट्टानें, ज्वालामुखी या पहाड़ बनने में हज़ारों बरस बीत जाते हैं. ऐसे में सिर्फ़ 70 साल पहले शुरू हुए युग ने ऐसा कौन सा निशान छोड़ा होगा, जो करोड़ों साल बाद भी धरती पर बना रहेगा?

भू-वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे युग की शुरुआत के अब तक रासायनिक या जैविक निशान तो ज़रूर बन गए होंगे. चट्टान अब तक भले ना बनी हो, मगर एंथ्रोपोसीन ने कुछ लक़ीरें तो ज़रूर उकेर दी होंगी.

अब इस बात पर बड़ी दुविधा है. कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि पचास के दशक में कई एटम बम विस्फोट हुए. इनसे पैदा हुआ विकिरण ही एंथ्रोपोसीन युग की शुरुआत का सबूत है.

कुछ का कहना है कि प्लास्टिक का कचरा भी हमारे दौर की पहचान हो सकता है. भू-वैज्ञानिकों को ऐसे एक ठिकाने की तलाश है, जहां एंथ्रोपोसीन युग की शुरुआत से ही ये रिकॉर्ड दर्ज हो रहे हों.

ये ठिकाना कोई कचरे का ढेर भी हो सकता है. जैसे कि न्यूयॉर्क का फ्रेश किल्स गड्ढा. यहां पर कचरा डालने की शुरुआत 1948 में हुई थी. और एक दौर में फ्रेशकिल लैंडफिल साइट पर रोज़ाना 26 हज़ार टन कचरा डाला जाता था. ये दुनिया का सबसे बड़ा कचरे का ठिकाना था.

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Image caption न्यूयॉर्क का फ्रेश किल्स गड्ढा

दिक़्क़त ये है कि कचरे के ऐसे ठिकानों पर हर साल मशीनें चलाकर उन्हें गलाया जाता है. इसलिए हर बीतते साल की एक नई परत बिछे, ये क़रीब-क़रीब नामुमकिन है. किसी भी ऐसी जगह, जहां इंसानी कचरा इकट्ठा किया जाता है, पर एंथ्रोपोसीन युग की शुरुआत की जगह नहीं चुना जा सकता.

ऐसी जगह को जहां इंसान की गतिविधियों के सबूत दर्ज हो रहे हों, वहां भी युग बदलने के निशान बताने वाली खूंटी यानी गोल्डेन स्पाइक लगाई जा सकती है. दिक़्क़त ये है कि फिलहाल ऐसी कोई जगह वैज्ञानिकों की नज़र में आई नहीं.

अब नदियों के मुहाने, जहां वो समंदर से मिलती हैं, उन्हें, एंथ्रोपोसीन युग की शुरुआत के सबूत मिलने वाली जगह के तौर पर नापा-तौला जा रहा है. स्कॉटलैंड की क्लाइड एस्चुअरी इस रेस में सबसे आगे है. यहां नदी के बहाव के साथ आया कीचड़, छुआ तक नहीं गया. ऐसे में हो सकता है कि साल दर साल यहां कीचड़ की नई परत बिछती रही हो. इसमें परेशानी ये है कि ये परत इतनी पतली होगी, कि यहां पर साल बीतने का अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल होगा.

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Image caption अमरीका के कोलोरैडो में सेनोमानियन-टूरोनिया सीमा पर लगा है ये गोल्डेन स्पाइक

झीलों और समंदर के भीतर भी कीचड़ और सिल्ट की परत बनती है. जैसे कि कनाडा की क्रॉफर्ड झील की गहराई में हर साल जमा हो रहे औद्योगिक कचरे के निशान मिलते हैं. कॉलिन वाटर्स मानते हैं कि ये जगह भी हमारे युग की शुरुआत का संकेत देने वाली खूंटी लगाने लायक़ हो सकती है. इसमें दिक़्क़त ये है कि पानी में जाकर इस परत की पड़ताल नहीं हो सकती. लिहाज़ा वहां से कुछ मिट्टी या रेत बाहर लाकर उसे परखना होगा. ये काम आसान नहीं है. मुलायम मिट्टी निकालते वक़्त अपना रूप-रंग बदल सकती है. नतीजा ये कि पूरी पड़ताल में ही घालमेल हो जाएगा.

एक और विकल्प जो भू-वैज्ञानिकों की नज़र में है, वो है पेरिस शहर के नीचे बनी नालियां. इन नालियों में चूने जैसी चीज़ पिछले क़रीब तीन सौ साल से जमा हो रही है. इन परतों से हमें पेरिस शहर के दौर के निशान मिल सकते हैं. शहरी तरक़्क़ी का ये रासायनिक सबूत हैं. अगर भू-वैज्ञानिक इस बात पर राज़ी होते हैं कि ये रासायनिक परत, हमारे एंथ्रोपोसीन युग की शुरुआत का सबूत बन सकती है, तो पेरिस की नालियां इसके लिए सटीक ठिकाना होंगी.

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कॉलिन वाटर्स कहते हैं कि कैरेबियन समंदर से निकाले जाने वाले मूंगे के भीतर भी हमारे दौर के निशान दर्ज हो रहे हैं. मूंगे हर साल एक नई परत बिछाते हैं, इनमें एटमी विस्फोट से लेकर हवा में मौजूद कार्बन डाई ऑक्साइड तक के निशान होते हैं.

इन विकल्पों के साथ परेशानी ये है कि अब तक भू-वैज्ञानिकों ने किसी भी युग का संकेत देने वाली सुनहरी खूंटी, ऐसी किसी जगह पर नहीं टांकी है. अब एंथ्रोपोसीन युग का संकेत देने वाली खूंटी को लगाने से पहले इस पर वोटिंग करानी पड़ सकती है.

कहां पर धरती के युग बताने वाली ये खूंटियां लगेंगी, ये बहुत मुश्किल काम है.

वेल्स यूनिवर्सिटी के माइक वाकर कहते हैं कि पहले सभी विकल्पों को चुनने के लिए भू-वैज्ञानिक वोट डालते हैं, ताकि किसी युग की सरहद तय हो सके. फिर उस जगह का दौरा तमाम भू-वैज्ञानिक करते हैं.

युगों से भी बड़ा महायुग होता है. हो सकता है कि आगे चलकर हमारा एंथ्रोपोसीन युग किसी और महायुग का हिस्सा बन जाए. या फिर यही महायुग कहलाए.

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किसी जगह को लेकर वोटिंग के बाद इसका नतीजा स्ट्रैटिग्राफी के अंतरराष्ट्रीय आयोग को भेजा जाता है. इस पर फिर से मतदान होता है, ताकि ये सुनहरी खूंटी लगाने के फ़ैसले को नए पैमानों पर कसा जा सके.

इसके लिए कॉलिन वाटर्स, माइक वॉकर के तजुर्बे से सीख रहे हैं. जिस तरह से वॉकर ने होलोसीन युग के निशान बताने वाली खूंटी लगाने की जगह तय की थी, ठीक वही तरीक़ा कॉलिन वाटर्स अपनाना चाहते हैं.

होलोसीन युग, एंथ्रोपोसीन युग से पहले चल रहा था. माइक वॉकर ने तर्क दिया था कि इसकी निशानी बताने वाली गोल्डन स्पाइक, ग्रीनलैंड की गहराई से निकाली गई बर्फ़ में लगाई जानी चाहिए. बर्फ़ के इस टुकड़े को, फिलहाल डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में रखा गया है. वाकर कहते हैं कि इसके विरोधियों ने कहा था कि आप तो होलोसीन युग की पहचान बताने वाले स्पाइक को फ्रिज में लगा रहे हैं.

कॉलिन वाटर्स कहते हैं कि हम एंथ्रोपोसीन युग को बताने वाली खूंटी को भी बर्फ़ में टांक सकते हैं. ये बर्फ़ पूर्वी अंटार्कटिका से निकाली जा सकती है. अंटार्कटिका की ये बर्फ़ यहां पर इंसानों के पहुंचने के बाद हुए असर को बयां करती है.

मगर, सबसे बड़ी चुनौती है भू-वैज्ञानिकों को इस बात के लिए राज़ी करने की, कि एंथ्रोपोसीन युग शुरू हो चुका है. कई ऐसे भू-वैज्ञानिक हैं, जो ये मानते ही नहीं कि धरती पर होलोसीन युग ख़त्म हो गया है. एंथ्रोपोसीन युग का आग़ाज़ हो चुका है.

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Image caption डेनमार्क के कलाकार ओलाफुर एलीसन ने ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर के टुकड़ों के एक समूह की ये कलाकृति जियोलॉजी के प्रोफ़ेसर मिनिक रोज़िंग के साथ मिल कर तैयार की है. अक्तूबर 2014 को इस कलाकृति को कोपेनहेगन सिटी हॉल के सामने प्रदर्शित करने के लिए रखा गया था. इसका उद्देश्य लोगों को जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूक करना था.

बीसवीं सदी में हमारे पास इंसानी गतिविधि के तमाम जैविक और रासायनिक सबूत हैं. सबसे बड़ा सबूत तो एटमी विस्फोट से निकलने वाला विकिरण है. जिसमें प्लूटोनियम होता है.

जिस जगह को भी धरती पर नए युग की शुरुआत के ठिकाने के तौर पर चुना जाएगा, वो स्थानीय लोगों के लिए गर्व की बात होगी. जैसे चीन का मीशान. वहां पर कांसे के बड़े-बड़े बोर्ड लगाकर इस बात का एलान किया गया है कि ये वो जगह है, जहां प्रलय के सबूत मिलते हैं. वहां थ्री-डी सिनेमा के ज़रिए भी उसकी ख़ूबियां बताई जाती हैं. एक म्यूजियम भी मीशान में खोला गया है.

इन चीज़ों को देखें, तो लगता है कि एंथ्रोपोसीन के आग़ाज़ के सबूत दर्ज करने वाले देश की रेस काफ़ी कड़ी और तेज़ है.

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