अगर दुनिया से बंदूक ख़त्म हो जाए तो...

गन कल्चर इमेज कॉपीरइट Getty Images

पिछले महीने अमरीका में क़रीब बीस लाख लोग 'नो वायलेंस' यानी छोटे हथियारों से होने वाली हिंसा के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे. ये अमरीकी लोग बंदूक या छोटे हथियार रखने को लेकर क़ानून में बदलाव की मांग कर रहे थे ताकि गोलीबारी से होने वाली हिंसा पर रोक लग सके.

बंदूक को लेकर अमरीकी लोग पूरी तरह से बंटे हुए हैं. कुछ लोग चाहते हैं कि हथियार रखने के नागरिकों के अधिकार में बदलाव किया जाए. वहीं कुछ लोग इस हक़ को और मज़बूती देने के हामी हैं. वैसे, ज़्यादातर अमरीकी नागरिक बीच का रास्ता निकालने के पक्षधर हैं.

दुनिया भर में बंदूक की गोली से मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है. जिस समाज में बंदूकों को रखने की भी आज़ादी है, वहां हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं.

आख़िर अमरीकियों को बंदूक़ से इतनी मोहब्बत क्यों?

क्या विदेशों में भी है वीआईपी कल्चर?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बिन हथियार कैसी होगी दुनिया?

ऐसे में हम अगर ये पूछें कि क्या हो अगर बंदूकें ख़त्म हो जाएं? सारे छोटे हथियार दुनिया से ग़ायब हो जाएं?

ज़ाहिर है, ऐसा तो होने से रहा कि बंदूकें अचानक जादुई तरीक़े से लापता हो जाएंगी. मगर इस सवाल के ज़रिए हम बंदूकों के ख़ात्मे से होने वाले नफ़ा-नुक़सान का अंदाज़ा तो लगा ही सकते हैं.

अगर तमाम देश मिलकर ऐसे क़ानून बनाएं कि बंदूकों को ख़त्म किया जा सके तो दुनिया कैसी दिखेगी? क्या-क्या बदलाव आएंगे? इन बातों पर ग़ौर करें तो कुछ दिलचस्प नतीजे सामने आएंगे.

अगर बंदूकें और दूसरे छोटे हथियार ख़त्म हो जाएंगे तो इसका सबसे बड़ा फ़ायदा तो ये होगा कि बंदूकों से होने वाली मौतें पूरी तरह से ख़त्म हो जाएंगी.

पूरी दुनिया में हर साल क़रीब पांच लाख लोग बंदूक की गोली से मरते हैं. बंदूक से हमारा मतलब बंदूक, रायफ़ल, पिस्तौल या रिवॉल्वर जैसे छोटे हथियार से है.

विकसित देशों में सबसे ज़्यादा अमरीका में बंदूकें पाई जाती हैं. यहां आम नागरिकों के पास 30 से 35 करोड़ हथियार हैं. इसीलिए दूसरे अमीर देशों के मुक़ाबले अमरीका में बंदूक से होने वाली मौतें 25 गुना तक ज़्यादा हैं.

क्यों कर रहे शिकवा, ये दुनिया बड़ी अच्छी है

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमरीका के ड्यूक स्कूल ऑफ़ मेडिसीन के मनोवैज्ञानिक, जेफ़री स्वान्सन बताते हैं कि उनके देश में रोज़ाना क़रीब 100 लोगों की मौत बंदूक की गोली से होती है.

प्रोफ़ेसर स्वान्सन कहते हैं कि अगर बंदूकें मिट जाएंगी, तो इनमें से बहुत से लोगों को बचाया जा सकेगा.

अमरीका में ख़ुदकुशी के लिए बहुत बड़ी तादाद में लोग बंदूक का इस्तेमाल करते हैं. 2012 से 2016 के बीच एक लाख 75 हज़ार 700 अमरीकियों ने अपनी जान ले ली. इनमें से 60 फ़ीसदी ने सुसाइड के लिए बंदूक का इस्तेमाल किया था. 2015 में 44 हज़ार लोगों ने ख़ुद अपनी जान ली थी. इनमें से कमोबेश आधे ने ख़ुदकुशी के लिए बंदूक इस्तेमाल की थी.

अमरीका के समाजशास्त्री और अपराध विज्ञान के विशेषज्ञ टॉम गैबोर बताते हैं कि बंदूक से ख़ुदकुशी के 80 प्रतिशत मामलों में लोग अपनी जान लेने में कामयाब हो जाते हैं.

वो इस तजुर्बे का दूसरा पहलू बताते हैं. टॉम कहते हैं कि जो लोग पहली बार ख़ुदकुशी में नाकाम रहते हैं. वो दोबारा इसकी कोशिश नहीं करते. मगर, बंदूक से ख़ुदकुशी के मामलों में ऐसा होने की गुंजाइश ही नहीं बचती.

क्या है हमारी ख़ुशी का राज़ और ये क्यों ज़रूरी है

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बंदूकों पर पाबंदी के फ़ायदे क्या हैं?

बंदूकों यानी छोटे हथियारों की तादाद घटाने का कितना फ़ायदा है, इसकी सबसे बड़ी मिसाल है ऑस्ट्रेलिया.

1996 में ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया में मार्टिन ब्रायंट नाम के शख़्स ने अंधाधुंध गोलियां चला कर 35 लोगों की जान ले ली थी. गोलीबारी में 23 लोग घायल भी हुए थे. इस घटना से आम ऑस्ट्रेलियाई नागरिक सदमे में आ गए.

इमेज कॉपीरइट Reuters

सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर बंदूकों पर रोक लगाने का फ़ैसला किया. कुछ ही दिनों के अंदर हथियार रखने को नियंत्रित करने का नया क़ानून बन गया. इसके तहत आम लोगों के सेमी-ऑटोमेटिक शॉटगन और राइफ़लें रखने पर रोक लगा दी गई.

सरकार ने आम लोगों से उचित दाम पर उनके हथियार ख़रीदकर नष्ट कर दिए. इस कोशिश का नतीजा ये हुआ कि ऑस्ट्रेलिया में आम लोगों के पास मौजूद हथियारों में 30 फ़ीसद की कमी आ गई.

इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये हुआ कि ऑस्ट्रेलिया में बंदूक से मरने वालों की तादाद में 50 फ़ीसद की कमी आ गई है.

सिडनी स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के प्रोफ़ेसर फ़िलिप एल्पर्स कहते हैं कि पिछले 22 सालों के तजुर्बे से ऐसा लगता है कि ऑस्ट्रेलिया में बंदूकों पर पाबंदी काफ़ी कामयाब रही है. वो बताते हैं कि बंदूकों की तादाद कम होने से ऑस्ट्रेलिया में ख़ुदकुशी के मामलों में काफ़ी कमी आई है. बंदूकें न होने पर ऐसा भी नहीं हुआ कि लोगों ने दूसरे तरीक़े से अपनी जान लेने की कोशिश की.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बंदूकों की संख्या क़ाबू करके ऑस्ट्रेलिया ने इससे होने वाली हत्याओं पर भी काफ़ी हद तक रोक लगा ली. बिना बंदूक से होने वाली हत्याओं की संख्या में इसकी वजह से इज़ाफ़ा नहीं हुआ. मतलब ये कि बंदूकें कम होने से ऑस्ट्रेलिया में हत्याओं की तादाद में भी काफ़ी कमी दर्ज की गई.

घरेलू हिंसा की शिकार होने वाली महिलाओं की मदद में भी बंदूकों पर पाबंदी काफ़ी कारगर हो सकती है. अगर किसी घर में छोटे हथियार हैं, तो उस घर की महिलाओं के घरेलू हिंसा के शिकार होने की आशंका पांच से आठ गुना तक बढ़ जाती है.

अब अगर बंदूकें घर में नहीं होंगी तो ऐसी महिलाओं की जान को भी ख़तरा कम होगा. अमरीका में हर महीने 50 महिलाओं की उनके जीवनसाथी गोली मारकर हत्या कर देते हैं. बंदूकें न होने की सूरत में इन महिलाओं की जान बचाई जा सकेगी.

अपराध के औसत मामलों में अमरीका, जापान, ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोप के दूसरे देशों के बराबर ही है. लेकिन बंदूकों से जुड़े अपराधों में मौत का आंकड़ा अमरीका में दूसरे देशों से सात गुना तक ज़्यादा है.

ज़ाहिर है, ज़्यादा हथियारों का मतलब ज़्यादा मौतें हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमरीका में हालात

स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क कॉलेज के रॉबर्ट स्पिट्ज़र कहते हैं कि जिन अमरीकी राज्यों में बंदूकें रखने के नियम सख़्त हैं, वहां अपराध भी कम हैं.

अमरीका में ज़्यादा हथियार होने से पुलिस के हाथों मौत का आंकड़ा भी ज़्यादा है. भीड़ जब भी पुलिस के मुक़ाबले खड़ी होती है तो पुलिसवालों को लगता है कि उनके ऊपर गोली चल सकती है. लिहाजा वो आत्मरक्षा में ज़्यादा गोलियां चलाते हैं. इससे पुलिस के हाथों आम लोगों की मौत का आंकड़ा बढ़ता है.

अमरीका में हर साल क़रीब एक हज़ार लोग पुलिस की गोलियों के शिकार होते हैं. हालांकि इन मौतों में कई बार वजह नस्लीय भी होती है.

बंदूकों की आसानी से उपलब्धता आतंकवादियों के लिए भी मददगार होती है. अमरीका, कनाडा, पश्चिमी यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में 2017 में क़रीब 2800 आतंकवादी घटनाएं हुईं. इन पर हुई रिसर्च बताती है कि आतंकवादियों ने बंदूक से ज़्यादा जानें लीं. इनके मुक़ाबले विस्फ़ोटकों से, या गाड़ियां चढ़ाने से भी ज़्यादा लोगों की मौत नहीं हुई. रिसर्च के मुताबिक़, इनमें से केवल 10 फ़ीसद आतंकी हमलों में बंदूकों का इस्तेमाल हुआ. मगर कुल मौतों में से 55 फ़ीसदी बंदूकों से हुई थीं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमन असंभव है?

इतिहास बताता है कि हिंसा, इंसान की नसों में समाई हुई है. इसलिए ऐसा नहीं है कि बंदूकों के ख़ात्मे से हिंसा ख़त्म हो जाएगी. अमरीका की वेक फ़ॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेविड यमाने 1994 के रवांडा के नरसंहार की मिसाल देते हैं. रवांडा में बिना बंदूकों के ही इंसानों ने इंसान का इतना ख़ून बहाया था. इस नरसंहार में बंदूकों के अलावा हूतू समुदाय के लोगों ने तुत्सी समुदाय के लोगों का चाकुओं, कुल्हाड़ी और दूसरे ऐसे हथियारों से भी क़त्ल किया था.

अगर बंदूकों पर पाबंदी लगेगी तो इंसान तीर-धनुष, भाले और तलवार जैसे हथियारों का दोबारा इस्तेमाल करने लगेगा. अमीर मुल्क़ टैंकों, घातक विस्फ़ोटकों, मिसाइलों, केमिकल और जैविक हथियारों का इस्तेमाल करने लगेंगे.

अमीर देश बंदूक की जगह नए हथियारों का आविष्कार कर लेंगे. यानी अमीर और ग़रीब देशों के बीच ताक़त का जो असंतुलन है, वो बंदूकों के मिटने से नहीं मिटेगा.

हां, सोमालिया, लीबिया और सूडान जैसे हिंसाग्रस्त देशों में हालात ज़रूर पूरी तरह बदल जाएंगे. बंदूकें और छोटे हथियार ख़रीदना या तस्करी कर के लाना-ले जाना आसान होता है. इनकी मदद से उग्रवादी संगठनों को इन हथियारों की मदद से सरकारी सेनाओं से मुक़ाबला करने में आसानी होती है. बंदूकें नहीं होंगी तो ऐसे उग्रवादी संगठनों पर क़ाबू पाना आसान होगा.

लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि कई देशों में ज़ुल्मी और तानाशाही निज़ामों से मुक़ाबले के लिए बहुत से लोग बाग़ी हो जाते हैं. बंदूकें उठा लेते हैं. उनके लिए तानाशाही हुकूमतों के सामने खड़े होना मुश्किल हो जाएगा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption हॉली डी की बेटी निकोल ओलिवर (बाएं तस्वीर में) को उनके पति ने 2007 में गोली मार दी थी. हर साल अमरीका में 50 महिलाएं अपने पति की गोलियों का शिकार होती हैं

बंदूकें न होने का क़ुदरत पर क्या असर होगा?

अगर बंदूकों और राइफ़लों पर रोक लग गई तो इसका मज़लूम जानवरों पर भी गहरा असर होगा. जानवरों का शिकार रुकेगा. बेवजह मारे जाने वाले जानवरों की ज़िंदगी बच जाएगी.

मगर, कई बार जानवरों का शिकार ज़रूरी भी होता है. ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जंगली जानवर खेती को बहुत नुक़सान पहुंचाते हैं. उनके शिकार में बंदूकें और राइफ़लें काफ़ी मददगार होती हैं. इससे किसानों को अपनी फ़सलें बचाने में मदद मिलती है.

कई बड़े जानवर छोटे द्वीपों पर भारी तबाही मचाते हैं. उन्हें मारना भी ज़रूरी हो जाता है. इनसे निपटने में तब दिक़्क़तें आएंगी, जब बंदूकें नहीं होंगी.

इसके अलावा कई बार गंभीर रूप से बीमार जानवरों को तकलीफ़ से निजात देने के लिए उन्हें गोली से मार दिया जाता है. बंदूकों की ग़ैरमौजूदगी से उन्हें फ़ौरी मौत वाली ये राहत नहीं हासिल हो सकेगी.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बंदूकों पर बैन का अर्थव्यवस्था पर असर

यूं तो बंदूकें सिर्फ़ जान लेने के लिए बनाई जाती हैं. मगर समाज पर इनके दूरगामी नतीजे भी होते हैं.

अमरीका में बंदूकों का कारोबार क़रीब 50 अरब डॉलर का है. बंदूकें न होने से ये कारोबार ठप हो जाएगा. हालांकि अमरीकी अर्थव्यवस्था के लिए ये रक़म समंदर में एक बूंद जैसी है.

मगर बंदूकें होने से, उनके शिकार लोगों की मदद पर होने वाला स्वास्थ्य का ख़र्च, उनको इंसाफ़ दिलाने के लिए न्यायिक व्यवस्था पर भी बोझ बढ़ता है. ये रक़म कितनी होती है, इसका सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया जा सकता है. कुछ रिसर्चर अमरीकी अर्थव्यवस्था पर बंदूकों का असर 200 अरब डॉलर तक बताते हैं.

बंदूकें सिर्फ़ जान ही नहीं लेतीं, वो जानें बचाती भी हैं. बहुत से कमज़ोर लोगों के लिए बंदूकें मददगार होती हैं. घरों में कई बार महिलाओं को बंदूक होने से बाहरी लोगों के शिकार होने से बचने का मौक़ा होता है.

भारत में बहुत-सी लड़कियां अपनी हिफ़ाज़त के लिए बंदूकें चलाने की ट्रेनिंग लेती हैं.

अगर बंदूकें नहीं रहीं तो उनमें सुरक्षा का ये एहसास नहीं रहेगा.

कुल, मिलाकर बंदूकें अगर इंसान के लिए ख़तरनाक हैं, तो फ़ायदेमंद भी. इनका होना जान लेता भी है और कई बार जान बचाता भी है.

पर बंदूक न होने के फ़ायदे ज़्यादा हैं और होने के कम.

(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे