क्या कट्टरपंथी विचार को बढ़ावा दे रहा है इंटरनेट?

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दुनिया के हर दौर में इंक़लाब हुए हैं. बाग़ियों ने क्रांति का अलख जगाया है. लेकिन इंटरनेट से आई क्रांति का सानी कोई नहीं. इंटरनेट ने उन लोगों को भी ज़ुबान दी जिनकी आवाज़ें ख़ामोश थीं. इंटरनेट ने रंग, जाति, मज़हब और सरहदों की दीवारें गिरा कर पूरी दुनिया को एकजुट कर दिया.

माना गया कि इंटरनेट ने इंसान को असल आज़ादी दी है. हर इंसान यहां पर अपनी बात कह सकता है. दुनिया के किसी भी कोने में मौजूद दो लोग आपस में जुड़ सकते हैं. जिससे विचार नहीं मिलते उन्हें छोड़कर हम ख़्यालों के साथ अपनी राय बांट सकते हैं.

इंटरनेट की इसी आज़ादी के ख़िलाफ़ अमरीका के सामाजिक विज्ञानी और क़ानून के जानकार कैस सनस्टीन ने चेतावनी देती थी.

सनस्टीन के मुताबिक़ भले ही इंटरनेट, इंसान को तमाम तरह की बंदिशों से आज़ाद कर रहा है. लेकिन इसके एवज़ में नई तरह की दीवारें खड़ी कर रहा है. दुनिया को अलग-अलग खेमों में बांट रहा है. समान सोच वाले लोग खेमों में बंट रहे हैं. ऐसे लोगों की जानकारियों का ज़रिया भी हमख़्याल लोग ही हैं. नतीजतन दूसरा पहलू ना तो नज़र आता है और ना ही विरोधी विचारधारा स्वीकार करने का माद्दा रह जाता है.

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सूचना के असर को बढ़ा-चढ़ा कर बताना

ऐसे लोगों के लिए सनस्टीन ख़ास शब्दावली का प्रयोग करते हैं 'इको चैम्बर'. यानी ऐसे लोगों का दायरा, जिन्हें सिर्फ़ हमख़्याल आवाज़ें सुनाई देती हैं.

सनस्टीन की बातों से बहुत से जानकार इत्तिफ़ाक़ रखते हैं. साथ ही ये भी कहते हैं कि मुख़्तलिफ़ समूहों में भी जो जानकारियां दी जाती हैं, उनमें भी बहुत काट-छांट की गई होती है. मिसाल के लिए ट्विटर या फेसबुक पर जितनी भी जानकारियां हमख़्यालों को दी जाती हैं, वो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पहले ही फ़िल्टर कर ली जाती हैं.

कनाडा में ओटावा की प्रोफ़ेसर एलिज़ाबेथ डूबॉय का कहना है कि इंटरनेट पर जानकारियों का अथाह सागर है. कोई भी शख़्स तमाम तरह की जानकारियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता. इस तरह की काटी-छांटी सूचना से लोगों को अपनी राय क़ायम करने में मदद मिलती है. पर, इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं कि लोग सिर्फ़ एक ही ख़्याल के ग़ुलाम हो जाते हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि मनमर्ज़ी की जानकारियां अपना असर डालती हैं. इसके बावजूद लोगों का मुख़्तालिफ़ नज़रिया भी होता है. मिसाल के लिए अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान 78 फ़ीसद लोग काले लोगों का रहन-सहन बेहतर करने के समर्थन में थे. जबकि ट्रंप के समर्थन में सिर्फ़ 31 फ़ीसद लोग थे. फिर भी राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे इसके उलट थे. लिहाज़ा ये कहना मुश्किल है कि ऑनलाइन जानकारियां लोगों की सियासी समझ को अपनी मनमर्ज़ी मुताबिक़ ढालने में कामयाब होती हैं.

कुछ जानकार तो ये भी कहते हैं कि छंटी हुई सूचना के असर को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर सेथ फ़्लेक्समैन ने 50 हज़ार लोगों की ब्राउज़िंग हिस्ट्री पर एक रिसर्च की. इन लोगों ने एक ख़ास न्यूज़ वेबसाइट को सबसे ज़्यादा देखा था. ये वेबसाइट दुनिया देखने का कट्टर नज़रिया पेश करती है. जबकि इन्हीं लोगों ने वो वेबसाइट भी देखीं थी, जो इस नज़रिए के बरअक्स ख़्याल रखती हैं.

ख़बरों के लिए कुछ साइट ऐसी हैं जिन्हें ज़्यादातर लोग ब्राउज़ करते हैं. लेकिन सोशल मीडिया के दूसरे प्लेटफोर्म भी कई तरह की जानकारियां मुहैया कराते हैं. वो भी नज़रिया बनाने में अहम रोल निभाती हैं.

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इंटरनेट पर इको-चैम्बर का असर

फ़्लेक्समैन की ये रिसर्च 2013 में जमा किए गए आंकड़ों की बुनियाद पर थी.

ओटावा यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर एलिज़ाबेथ डुबॉय भी अपनी रिसर्च के ज़रिए कुछ इसी तरह के नतीजे सामने लाती हैं. उन्होंने क़रीब दो हज़ार ब्रिटिश नागरिकों पर ये रिसर्च किया था.

उन्होंने पाया कि रिसर्च में शामिल होने वाले ज़्यादातर प्रतिभागी पहले ही अलग-अलग सियासी विचारधाराओं को पढ़ और समझ रहे थे, जो उनकी अपनी विचारधारा से बिल्कुल मेल नहीं खाती. जबकि आठ फ़ीसद लोग ऐसे थे जो अपने ही इको-चैम्बर में रह रहे थे.

प्रोफ़ेसर डुबॉय के मुताबिक़ ये आठ फ़ीसद आंकड़ा भी ख़तरनाक है. सभी लोगों को एक मज़बूत राय क़ायम करने के लिए मुख़्तालिफ़ नज़रिया जानना भी ज़रूरी है.

हालांकि ज़्यादातर जानकार यही मान रहे हैं कि इंटरनेट पर फिल्टर्ड जानकारियों का या इको-चैम्बर का कोई ख़ास असर अब नहीं पड़ रहा है. लोग किसी एक ख़बर की साइट पर अटके नहीं रहते. बल्कि, विरोधी विचारधारा वाली साइट पर भी ख़ूब जाते हैं. इससे सियासी ध्रुवीकरण भी होता है.

ब्रिटेन की ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र बेल का कहना है कि मानसिकता भी हमारे फ़ैसलों पर प्रभाव डालती है. दरअसल हम अपनी सियासी पहचान से इतने जुड़े होते हैं कि उसके ख़िलाफ़ कुछ सुनना नहीं चाहते. अगर सामने से कोई विरोधी आवाज़ आती है तो हम अपने नज़रिए पर फिर से ग़ौर करने या उसमें सुधार करने के बजाए और भी मज़बूती से उसके ग़ुलाम बन जाते हैं.

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ज़्यादा मज़बूती से फ़ैलती है नकारात्मक विचारधारा

अमरीका में जिस समय समलैंगिकों के अधिकार के लिए आवाज़ उठी तो रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों के ख़यालात एक दूसरे से अलग थे. और दोनों ही अपनी-अपनी विचारधाराओं पर अड़े हुए थे. अपने ख़यालात में बदलाव लाने के बजाय उनकी विचारधारा पहले से मज़बूत हो गई थी. दोनों को ही लग रहा था कि उन्हीं का स्टैंड सही है. उसी पर अमल होना चाहिए.

इस मुहिम के दैरान बहुत से भाषाविदों ने सोशल मीडिया पर रिपब्लिकन समर्थकों के खेमे में इस्तेमाल हो रहे शब्दों का विश्लेषण किया. पाया गया कि उदार विचारधारा के ख़िलाफ़ कट्टरपंथी विचारधारा मज़बूत करने वाली भाषा का इस्तेमाल ज़्यादा हुआ है. जानकार कहते हैं कि जब उदारवादी विचारधारा वाले लोग अपने ख़्यालात में लचीलापन नहीं लाते हैं, तो, उनके ख़िलाफ़ नकारात्मक विचारधारा ज़्यादा मज़बूती से फ़ैलती है.

शायद यही वजह है कि आज भारत में भी ख़ुद को लिबरल जमात कहने वाले लोग, भयंकर विरोध का सामना कर रहे हैं. तमाम चर्चाओं में अक्सर वो अल्पमत में आ जाते हैं और फिर हाशिए पर चले जाते हैं.

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कट्टरपंथ को और बढ़ावा देते विचार

मनोवैज्ञानिक इसमें एक और पहलू देखते हैं. वो इसे 'सेल्फ़ लाइसेंसिंग' की संज्ञा देते हैं. यानी ऐसे लोग अगर कभी किसी एक विचारधारा का समर्थन करते हैं. तो, अगली बार उसी विचारधारा का विरोध करना वो अपना हक़ समझने लगते हैं.

2008 में की गई एक स्टडी के मुताबिक़ जिन लोगों ने बराक ओबामा का समर्थन किया था, बाद में वही लोग रंगभेदी विचारधारा के हिमायती निकले. यानी एक बार काले अमरीकी का समर्थन करने के बाद उन्हें इस बात का लाइसेंस मिल गया कि अब वो इसी के ख़िलाफ़ अपनी राय रख सकते हैं और कह सकते हैं कि वो रंगभेदी नहीं हैं.

अगर ऐसा होता तो वो कभी भी बराक ओबामा का समर्थन नहीं करते. इसी के साथ जब फेसबुक या ट्विटर पर असहमति वाले विचार फैलाए जाते हैं तो वो कट्टरपंथ को और बढ़ावा देते हैं.

इसी तरह जब न्यूज़ चैनलों पर मुद्दों को लेकर बहस होती है तो कोई किसी की बात सुनने के लिए तैयार नहीं होता. बहस में शामिल हर शख़्स को लगता है कि उसका स्टैंड ही सबसे अच्छा है. फिर वो सामने वाले को बाध्य करता है कि वो उसकी बात माने. और इसी से कट्टरपंथ का माहौल तैयार होता है.

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ऑनलाइन एजेंडे पर लगाम लगाना संभव नहीं

इसके अलावा कोई भी रिसर्च इस बात से इनकार नहीं करती कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल हेरा-फेरी के लिए नहीं होता. हाल ही में एक साइंस जरनल की स्टडी इस बात पर मुहर लगाती है कि सोशल मीडिया पर पुख़्ता ख़बरों के मुक़ाबले फ़ेक न्यूज़ बहुत तेज़ी से फैलती है. हो सकता है बहुत से लोगों पर इको-चैम्बर का असर ना पड़ता हो लेकिन ख़ास तरह के विज्ञापनों के ज़रिए उनकी सोच प्रभावित करने का प्रयास ज़रूर किया जाता है.

तमाम रिसर्चों के बाद रिसर्चर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ऑनलाइन एजेंडे पर लगाम लगाना असंभव है. स्कूल-कॉलेज में मीडिया एजुकेशन के ज़रिए ही इसे रोका जा सकता है. स्कूल से ही बच्चों को तर्कसंग सोचने की आदत डाली जाए. इंटरनेट को आए क़रीब तीस साल होने वाले हैं लेकिन अफ़सोस की बात है हमने अभी तक इंटरनेट का सही इस्तेमाल नहीं सीखा.

जो, माध्यम कभी दुनिया को जोड़ने की सबसे बड़ी ताक़त था. आज वही माध्यम नफ़रतों के विचार भी पूरे ज़ोर-शोर से फैला रहा है.

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