बूंद-बूंद के लिए तरस रहा डूबने वाला मेक्सिको

  • 21 मई 2018
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इस शहर का नाम है मेक्सिको सिटी. मेक्सिको सिटी, लैटिन अमरीकी देश मेक्सिको की राजधानी है. ये दुनिया के बड़े शहरों में से एक है.

मेक्सिको सिटी की आबादी इस वक़्त दो करोड़ 10 लाख है. अगर हम इसमें उप नगरीय इलाक़े भी जोड़ लें, तो आबादी क़रीब दो करोड़ 70 लाख बैठती है. कहा जा रहा है कि 2030 तक मेक्सिको में तीन करोड़ से ज़्यादा लोग रह रहे होंगे.

अब इतनी बड़ी तादाद में लोग रहते हैं, तो ज़ाहिर है उन्हें पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की चुनौती भी होगी. शहर में आबादी का बोझ इतना ज़्यादा है कि पानी सप्लाई करने का बुनियादी ढांचा इसके दबाव में दरक रहा है.

हालात ऐसे दिख रहे हैं कि अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया, तो मेक्सिको सिटी के पानी के स्रोत अगले 30 सालों में सूख जाएंगे. ऐसा हुआ तो अमरीका के ठीक बगल में दुनिया का सबसे बड़ा पानी का संकट उठ खड़ा होगा.

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मेक्सिको सिटी समुद्र से क़रीब दो हज़ार मीटर की ऊंचाई पर बसा है. यहां हर साल ज़ोरदार बारिश होती है. जून से सितंबर के बीच भारी बारिश की वजह ये यहां अक्सर बाढ़ आ जाती है.

शहर का पानी निकासी का सिस्टम इतना पुराना पड़ चुका है कि भारी बारिश के चलते घरों और सड़कों में अक्सर गंदा पानी भर जाता है. सीवेज की पाइपलाइन फट जाती हैं. यानी बारिश होते ही मेक्सिको सिटी में हाहाकार मच जाता है.

सिर्फ़ पानी के दबाव से यहां सीवेज सिस्टम नाकाम नहीं होता. अक्सर लोग नालियों और पानी निकासी के पाइपों में कचरा फेंक देते हैं. बारिश की वजह से सड़क पर जमा कचरा इन पाइपों को जाम कर देता है. इससे हालात और बिगड़ जाते हैं. मेक्सिको सिटी में हर सेकेंड 40 हज़ार लीटर सीवेज बनता है.

हालात से निपटने के लिए शहर के किसी न किसी कोने में सीवेज लाइन साफ़ करने का काम चलता ही रहता है. एक बहुत बड़ा ड्रेनेज सिस्टम है, जिसका नाम एमिसॉर सेंट्रल है, उसके ज़रिए सीवेज को शहर से बाहर निकाला जाता है. मगर इस पर इतना दबाव है कि ये व्यवस्था किसी भी दिन ठप हो सकती है.

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भारी बारिश और बाढ़ के बावजूद मेक्सिको की एक बड़ी आबादी पानी की किल्लत झेलती है. इसकी बड़ी वजह मेक्सिको का बेहद पुराना पड़ चुका पानी की सप्लाई का सिस्टम है.

पाइप बहुत पुराने हो चुके हैं. अक्सर सप्लाई के वक़्त पाइपलाइन फट जाती है. नतीजा ये कि पाइप से सप्लाई का 40 फ़ीसद पानी यूं ही बर्बाद हो जाता है.

इसकी वजह से शहर के ग़रीब लोग पानी की किल्लत झेलते हैं. ये लीटर के हिसाब से पानी ख़रीदते हैं, जो कि बेहद महंगा पड़ता है. शहर के एक बड़े हिस्से में हफ़्ते में केवल दो दिन नल से पानी आता है. बाक़ी दिनों में लोगों को टैंकर के ज़रिए पानी पहुंचाया जाता है. लोग इसे भरकर गधों-खच्चरों पर लादकर घरों तक पहुंचाते हैं.

हालात इतने ख़राब हैं कि स्थानीय किसानों को फ़सलों की सिंचाई और सब्ज़ियों को धोने तक के लिए पानी नहीं मिल पाता. कभी मेक्सिको सिटी के इर्द-गिर्द कई छोटी-छोटी नदियां बहा करती थीं.

अब उनके ज़रिए सीवेज का ट्रीटेड पानी निकाला जाता है. किसान इसी पानी से फ़सलों को सींचते हैं और फल-सब्ज़ियों को धोकर बेचने ले जाते हैं.

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ये हैरानी की ही बात है कि जिस शहर में इतनी बारिश हो, बाढ़ आए, वो पानी के लिए तरस रहा है.

मेक्सिको सिटी कभी एक द्वीप पर बसाया गया था. इसके चारों तरफ़ झील की घाटी हुआ करती थी. लेकिन सोलहवीं सदी में जब स्पेन ने मेक्सिको को अपना ग़ुलाम बनाया, तो औपनिवेशिक शासकों ने मेक्सिको सिटी के इर्द-गिर्द मौजूद झील को सुखा दिया, ताकि शहर का और विस्तार हो सके.

झील की घाटी में होने की वजह से मेक्सिको सिटी में भूगर्भ जल यानी ज़मीन के भीतर पानी के सोते बड़ी तादाद में मौजूद हैं. शहर की 40 फ़ीसदी वाटर सप्लाई ज़मीन से पानी निकाल कर ही होती है.

इन स्रोतों को पानी से लबरेज़ रखने के लिए ज़रूरी है कि बारिश का पानी रिस-रिस कर ज़मीन के भीतर जाता रहे. मेक्सिको सिटी के आस-पास खुली ज़मीन पर छोटे-छोटे गड्ढे खोदकर इसका इंतज़ाम भी किया गया है, ताकि भूगर्भ जल का स्तर बना रहे.

दिक़्क़त ये है कि पानी की मांग इतनी है कि जितना पानी ज़मीन में जाता नहीं, उससे कई गुना रोज़ाना निकाला जाता है. मेक्सिको सिटी अक्सर सूखे का भी शिकार होता है. नतीजा ये होता है कि ज़मीन ने बेतहाशा पानी निकाला जाता है.

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जानकार कहते हैं कि ज़मीन से पानी निकालने की यही रफ़्तार रही, तो अगले 30 से 50 साल में मेक्सिको सिटी में ज़मीन के भीतर मौजूद पानी के सोते भी सूख जाएंगे.

ज़मीन के भीतर से लगातार बड़े पैमाने पर पानी निकाले जाने का एक और नुक़सान हो रहा है. ज़मीन के भीतर हलचल बढ़ रही है. घटते जल स्तर की वजह से मेक्सिको सिटी के कई हिस्से साल में एक फुट तक धंस रहे हैं. सितंबर 2017 में आए भूकंप को इसी का नतीजा बताया जा रहा है. उस ज़लज़ले में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और हज़ारों मकान तबाह हो गए थे.

ज़मीन धंसने से पानी सप्लाई की पाइपलाइन टूट रही हैं. इससे सप्लाई किया जाने वाला पानी बर्बाद हो रहा है. इसके अलावा ज़मीन धंसने से अक्सर सीवेज के पाइप भी फट जाते हैं. जिससे पानी गंदा होता है.

मेक्सिको सिटी के इर्द-गिर्द पानी पर तैरते मकान बनाकर भी लोग रहते हैं. इससे भी साफ़ और पीने का पानी प्रदूषित होता है. शहर के वाटर कमीशन को यहां की नहरों को बार-बार पानी से भरना पड़ता है, ताकि पानी गंदा न हो और लोगों को ज़रूरत का पानी मिल सके.

कुल मिलाकर मेक्सिको शहर भयंकर बाढ़, भयंकर सूखे और बहुत तेज़ गर्मी यानी हर तरह की मुसीबत झेल रहा है. इसकी वजह धरती की बदलती आबो-हवा यानी क्लाइमेट चेंज बताई जा रही है.

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स्थानीय लोग क्लाइमेट चेंज की चुनौती से तो वाक़िफ़ हैं. मगर उन्हें अपने शहर के पाताल में मौजूद पानी के छीजते जाने का अंदाज़ा नहीं है. उन्हे अभी ये भी पता नहीं है कि उनके शहर के धंसने की वजह वो ख़ुद हैं.

जानकार कहते हैं कि मेक्सिको जिस झील की घाटी में बसा है, उसके पूरी तरह से सूख जाने पर यहां की आबो-हवा से नमी भी ख़त्म हो जाएगी. तापमान बढ़ने से पानी और सूखेगा. उसकी मांग और बढ़ेगी. शहर के बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ेगा.

हालात से निपटने के लिए मेक्सिको सिटी के प्लानर्स दो बड़ी योजनाओ पर काम कर रहे हैं. एक तो पानी सप्लाई करने वाले सिस्टम को दुरुस्त किया जा रहा है. वहीं दूसरी तरफ़ शहर के सीवेज सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए एक बहुत बड़ी और चौड़ी सुरंग बनाई जा रही है, जो शहर के गंदे पानी को बाहर ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाएगी. जहां पानी को साफ़ करके उसे दोबारा इस्तेमाल के लायक़ बनाया जाएगा.

मेक्सिको सिटी के हालात को सुनकर आपको मुंबई शहर जैसा महसूस हुआ है. मुंबई भी तो कमोबेश ऐसे ही हालात से जूझ रही है. कभी शहर से बहने वाली मीठी जैसी नदियां अब कचरे के ढेर से पटी पड़ी हैं. बारिश में इनकी वजह से मुंबई बाढ़ की शिकार होती है. लेकिन बाक़ी दिनों में ये नदी कचरे का डिब्बा बन जाती है.

मुंबई को पानी सप्लाई करने वाली झीलें और तालाब भी सिकुड़ रहे हैं.

ये हालात असल में चेतावनी दे रहे हैं कि इंसान अपने तौर-तरीक़े सुधार ले. वरना अंजाम बहुत बुरा होगा.

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