महिलाओं और पुरुषों के दर्द में किया जाता है भेदभाव

  • 29 मई 2018
दवा खाती महिला, प्रतीकात्मक तस्वीर इमेज कॉपीरइट Getty Images

कुदरत ने मर्द और औरत के बीच कोई भेदभाव नहीं किया है. कहने को तो तमाम मज़हबों ने भी औरत और मर्द को बराबर माना है लेकिन दुनिया के हर देश और समाज में औरतों और पुरुषों में भेदभाव होता नज़र आता है और औरतों को दोयम दर्जा दिया जाता है.

आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि दर्द और इसके इलाज को लेकर भी औरतों और मर्दों में फ़र्क़ किया जाता है. हाल में हुए कुछ शोधों से ये चौंकाने वाली बात सामने आई है.

इनके मुताबिक़ अगर औरत को कोई तकलीफ़ हो या उसे किसी तरह का दर्द हो तो मामूली दर्द ही समझा जाता है. जबकि मर्द की तकलीफ़ का ज़्यादा संजीदगी से इलाज होता है. बात सुनने में अजीब ज़रूर लगती है, लेकिन है ये तल्ख़ हक़ीक़त.

महिलाओं में माहवारी के दौरान दर्द होना आम बात है. कुछ को ये ज़्यादा होता है और कुछ को कम. किसी को ये दर्द कई दिन पहले शुरू हो जाता है और मासिक धर्म जारी रहने तक रहता है. जबकि कुछ को फ़ौरन राहत मिल जाती है.

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Image caption दर्द से राहत के लिए घरेलू तरीके अपनाती हैं कई महिलाएं

बहुत-सी महिलाएं इस दर्द से राहत के लिए घरेलू नुस्खे अपनाती हैं. वहीं कुछ औरतें मासिक धर्म का दर्द बर्दाश्त नहीं होने पर डॉक्टर के पास चली जाती हैं. लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया जाता. सामान्य दर्द बता कर उन्हें कोई भी मामूली दर्द निरोधक दवा दे दी जाती है. जबकि 'Ask me about my Uterus' की लेखिका एबी नॉर्मन के मुताबिक़ माहवारी का ये दर्द मामूली तकलीफ़ नहीं.

नॉर्मन के मुताबिक़ ये एन्डोमेट्रियोसिस की समस्या है. जिसकी सबसे बड़ी वजह है तनाव, डिप्रेशन और अनियमित दिनचर्या. वैसे तो कामकाजी महिलाओं में इसके लक्षण ज़्यादा पाए जाते हैं लेकिन घरेलू महिलाओं को भी ये परेशानी हो सकती है.

एन्डोमेट्रियोसिस के कारण गर्भाशय के अलावा आस-पास के अंदरूनी कई अंगों पर यहां तक कि फैलोपियन ट्यूब और उसके आसपास एन्डोमेट्रियम टिशू पैदा हो जाते हैं. इसकी वजह से दर्द काफ़ी ज़्यादा होता है. लेकिन डॉक्टर इसे सामान्य दर्द मानकर छोड़ देते हैं. नॉर्मन कहती हैं कि मेडिकल इंडस्ट्री में औरतों के दर्द को नज़रअंदाज़ करने का इतिहास लंबा है.

अब इसकी वजह मर्द औरत के दरमियान किया जाने वाला भेदभाव है या मर्द-औरत में अपना-अपना दर्द बताने के तरीक़े का अंतर, ये कहना मुश्किल है. लेकिन इस बात में भी कोई शक नहीं कि महिलाओं की बीमारियों को लेकर अलग से रिसर्च करने की मेडिकल साइंस में हमेशा कमी रही है.

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Image caption महिलाओं की बीमारियों पर अलग से कम रिसर्च हुआ है

पुरुषों को प्राथमिकता

एक स्टडी में पाया गया है कि अगर मर्द और औरत एक जैसे दर्द के साथ इमर्जेंसी डिपार्टमेंट में आते हैं, तो औरत पर मर्दों को तरज़ीह दी जाती है. यही नहीं तुरंत आराम पहुंचाने वाली पेनकिलर भी मर्दों को पहले दी जाती हैं, जबकि औरतों को कम असर वाली दवाएं दी जाती हैं. डॉक्टर का इंतज़ार भी महिलाओं को ज़्यादा करना पड़ता है.

तेज़ असर करने वाली पेनकिलर पर रिसर्च करने वाली अमरीकी डॉक्टर ईस्थर शेन भी इस बात को मानती हैं कि इमर्जेंसी वॉर्ड में महिलाओं को मर्दों के मुक़ाबले कम तवज्जो दी जाती है. लेकिन इसे भेदभाव की नज़र देखा जाना कितना सही है, कहना मुश्किल है. ये महिलाओं के दर्द को बयान करने के तरीक़े का फ़र्क़ भी हो सकता है.

मिसाल के लिए जब महिलाएं पेट दर्द की शिकायत करती हैं, तो पहली नज़र में इसे स्त्री रोग से जोड़ कर देखा जाता है. उसे मामूली दवाओं से ठीक करने की कोशिश होती है. जबकि मर्द अगर ऐसे ही दर्द की शिकायत करते हैं, तो उनका इलाज ज़्यादा क्लिनिकल तरीक़े से किया जाता है. यही नहीं महिलाओं को कई बार ज़्यादा दर्द की शिकायत करने पर मनोचिकित्सक के पास भेज दिया जाता है. जबकि मर्दों के दर्द की वजह जानने के लिए कई तरह की जांचें कराई जाती हैं.

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Image caption महिलाओं को अजीब सलाहें दी जाती हैं

महिलाओं को लेकर ग़लतफ़हमी

अमरीका के क्रोनिक पेन रिसर्च अलायंस के डॉयरेक्टर क्रिस्टीन वीज़ली कहते हैं कि कई मर्तबा डॉक्टर औरतों को उनके दर्द की ऐसी वजहें बता देते हैं, जिन्हें सुनकर हैरानी होती है. जैसे सेक्स के दौरान होने वाले दर्द से छुटकारा पाने के लिए सलाह दी जाती है कि हमबिस्तर होने से पहले एक गिलास शराब ले लो. इसी तरह और भी कई तरह की सलाहें दी जाती हैं.

आम ख़्याल ये है कि महिलाएं छोटी सी दिक़्क़त को भी बढ़ा-चढ़ा कर बताती हैं. ब्रिटेन में की गई एक स्टडी के मुताबिक़ औरतों के मुक़ाबले मर्द 32 फ़ीसद कम डॉक्टर के पास जाते हैं. जबकि कुछ रिसर्च इसी बात को नकारते हैं.

मिसाल के लिए कमर और सिर दर्द की शिकायत मर्द, औरत दोनों में बराबर होती है. और बहुत तरह के दर्द की शिकायत के लिए महिलाएं डॉक्टर के पास जाती ही नहीं.

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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

कैलिफ़ोर्निया सोसाइटी ऑफ़ एनेस्थिसियोलॉजिस्ट की अध्यक्ष करेन साइबर्ट कहती हैं कि साल 1972 से 2003 के बीच किए गए रिसर्च साबित करते हैं कि महिलाओं में मर्दों के मुक़ाबले दर्द सहने की क़ुव्वत कम होती है.

महिलाएं थोड़े से दर्द में ही बेचैन हो उठती हैं इसीलिए उन्हें पेनकिलर की बजाए एंटी-एंग्ज़ाइटी की दवा दी जाती है. चिंतित होने पर दर्द बर्दाश्त करने की ताक़त कम हो जाती है. लिहाज़ा पहले फ़िक्र दूर करने की कोशिश की जाती है उसके बाद ज़रूरत की दूसरी दवाएं दी जाती हैं.

हालांकि सही वजह जानने के लिए अभी विस्तार से रिसर्च की ज़रूरत है.

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पुरुषों का नज़रिया हावी

एबी नॉर्मन का कहना है कि अभी तक मेडिकल की ज़्यादातर रिसर्च मर्दों ने मर्दों पर ही की हैं. यहां तक कि मेडिकल की किताबें भी मर्दों के नज़रिए से लिखी गई हैं.

2015 में अमरीका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ ने एक पॉलिसी लॉन्च की, जिसके तहत फंड तभी मिलेगा जब रिसर्च में मर्द और औरत दोनों शामिल होंगे.

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Image caption एक शोध के मुताबिक़, पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को डॉक्टर का इंतज़ार ज़्यादा देर तक करना पड़ता है

ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस ने भी 2017 में ऐसा ही फ़रमान जारी किया. उसमें भी स्त्री रोग संबंधी बीमारियों को समझने के लिए रिसर्च में तेज़ी लाने को कहा गया था. जबकि औरतों को ख़ास औरतों वाली बीमारियों के अलावा भी सेहत से जुड़ी परेशानियां होती हैं.

फिलहाल उन पर अभी किसी का ध्यान नहीं है. महिलाओं को अपनी बीमारियों के लिए सही रिसर्च और नज़रिए के लिए अभी और कितना इंतज़ार करना होगा कहना मुश्किल है.

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