क्या प्रोटीन से वज़न कम किया जा सकता है?

  • 29 मई 2018
प्रोटीन शेक पीती महिला इमेज कॉपीरइट Getty Images

बीसवीं सदी की शुरुआत में आर्कटिक में खोज के लिए निकले विल्ज़ाल्मर स्टेफ़न्सन ने पांच साल सिर्फ़ मांस खा कर गुज़ारे. इसका मतलब ये था कि उनके खाने में 80 फ़ीसदी मांस और 20 फ़ीसदी प्रोटीन था.

20 साल बाद 1928 में स्टेफ़न्सन ने क़रीब साल भर तक ऐसा ही प्रयोग न्यूयॉर्क के बेलव्यू अस्पताल में किया. स्टेफ़न्सन ने ये प्रयोग इसलिए किए क्योंकि वो उन लोगों को ग़लत साबित करना चाहते थे, जो कहते थे कि इंसान सिर्फ़ मांस खाकर ज़िंदा नहीं रह सकता.

लेकिन बदकिस्मती से दोनों ही प्रयोगों के दौरान वो बहुत जल्द बीमार पड़ गए. वजह साफ़ थी. स्टेफ़न्सन बिना फैट वाला प्रोटीन खा रहे थे. इससे उन्हें 'प्रोटीन प्वॉयज़निंग' हो गई. यानी ज़्यादा प्रोटीन लेने की वजह से दिक़्क़त हो गई.

स्टेफ़न्सन ने जब अपनी डाइट में बदलाव किया और अपने खान-पान में प्रोटीन के साथ फैट को भी शामिल कर लिया, उनकी ये बीमारी तुरंत ठीक हो गई.

83 साल की उम्र में मौत से पहले स्टेफ़न्सन ने कम कार्बोहाइड्रेट और कम फ़ैट वाली डाइट लेना जारी रखा था.

स्टेफ़न्सन का मामला उन शुरुआती मिसालों में से है, जिनके हवाले से कहा जाता है कि ज़्यादा प्रोटीन लेने से इंसान की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है.

पर ये बात एक सदी पुरानी हो गई है. आज ज़माना ये है कि लोग प्रोटीन बार, प्रोटीन शेक, प्रोटीन बॉल्स खाते हैं. और ऐसा तब हो रहा है, जब ज़्यादातर लोगों को मालूम ही नहीं कि उन्हें कितना प्रोटीन चाहिए, किस तरीक़े से प्रोटीन लेना चाहिए, कितना कम या कितना ज़्यादा प्रोटीन हमारे लिए नुक़सानदेह है.

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Image caption सप्लीमेंट कंपनियां कसरत के बाद प्रोटीन ड्रिंक्स पीने की सलाह देती हैं.

मोटापा भी बढ़ा, जागरूकता भी

पिछले दो दशकों में दुनिया भर में लोगों के मोटापे के शिकार होने की रफ़्तार दोगुनी हो गई है. लेकिन आज हम अपने खान-पान को लेकर ज़्यादा जागरूक भी हो गए हैं.

पिछले कुछ सालों में हम सफ़ेद ब्रेड की जगह ब्राउन ब्रेड, आटा ब्रेड और मोटे अनाज से बनी ब्रेड इस्तेमाल करने लगे हैं. हम फुल क्रीम दूध की जगह स्किम्ड और टोन्ड दूध लेने लगे हैं. सेहत को लेकर हमारी जागरूकता का केंद्र है प्रोटीन.

लोग प्रोटीन बार, प्रोटीन बॉल्स और प्रोटीन शेक लेने के लिए बेताब हैं. बाज़ार में प्रोटीन सूप से लेकर प्रोटीन सीरियल वाले पैकेट सजे हुए हैं. आज सुपरमार्केट जाएं तो करीने से लगे प्रोटीन उत्पाद आपको रिझाते हैं. दुनिया भर में इस प्रोटीन सप्लीमेंट का बाज़ार अंदाज़न 12.4 अरब डॉलर का है. यानी सेहत को लेकर जागरूक लोग ये मानते हैं कि हमें ज़्यादा से ज़्यादा प्रोटीन लेना चाहिए.

लेकिन अब तमाम जानकार ये कह रहे हैं कि ज़्यादा प्रोटीन वाले ये उत्पाद हमारे लिए ग़ैरज़रूरी और जेब पर बोझ हैं.

प्रोटीन हमारे शरीर के विकास और मरम्मत के लिए ज़रूरी है. ज़्यादा प्रोटीन वाली चीज़ें जैसे दुग्ध पदार्थ, मांस, अंडे, मछली और दालें हमारा शरीर बनाने के लिए आवश्यक हैं. जब हम ऐसी चीज़ें खाते हैं, तो हमारे पेट में इन्हें तमाम अमीनो एसिड में तोड़ने का काम हमारी छोटी आंत करती है. यहां से ये अमीनो एसिड हमारे जिगर तक पहुंचते हैं. लिवर ये तय करता है कि हमारे शरीर के लिए ज़रूरी अमीनो एसिड कौन से हैं. उन्हें अलग कर बाक़ी अमीनो एसिड को पेशाब के ज़रिए शरीर बाहर कर देता है.

कितना प्रोटीन लेना चाहिए?

जो वयस्क लोग ज़्यादा दौड़-भाग या मेहनत का काम नहीं करते, उन्हें अपने शरीर के प्रति किलो वज़न के लिए 0.75 ग्राम प्रोटीन रोज़ाना चाहिए. औसतन ये तादाद पुरुषों के लिए 55 ग्राम और महिलाओं के लिए 45 ग्राम रोज़ाना बैठती है. यानी दो मुट्ठी मीट, मछली, टोफू, नट्स या दालें खाने से रोज़ाना की प्रोटीन की ज़रूरत पूरी हो जाती है.

पूरी तादाद में ज़रूरी प्रोटीन न लेने से बाल झड़ने, त्वचा फटने, वज़न घटने और मांसपेशियां घटने की शिकायतें हो सकती हैं. लेकिन कम प्रोटीन खाने से होने वाली ये परेशानियां बहुत कम ही देखने को मिलती हैं. आम तौर पर ये उन्हीं लोगों में देखने को मिलती हैं, जिनके खान-पान में भारी गड़बड़ी हो और वो नियमित न हो.

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Image caption बहुत से लोग प्रोटीन बार और शेक के ज़रिये न्यूट्रिशन लेने लगे हैं

इसके बावजूद हम अक्सर यही मानते हैं कि बॉडी बिल्डिंग और मांसपेशियों के विकास के लिए प्रोटीन बेहद ज़रूरी है. ये काफ़ी हद तक सही भी है. ताक़त बढ़ाने वाली वर्ज़िश करने से मांशपेशियों में मौजूद प्रोटीन टूटने लगती है. ऐसे में मांसपेशियों को ताक़तवर बनाने के लिए प्रोटीन की ज़रूरत होती है, ताकि मसल्स की मरम्मत हो सके. इसमें प्रोटीन में पाया जाने वाला ल्यूसिन नाम का अमीनो एसिड बहुत मददगार होता है.

कुछ जानकार तो ये भी कहते हैं कि बहुत मुश्किल कसरतें करने के बाद अगर हम प्रोटीन रिच डाइट नहीं लेते हैं, तो इससे हमारी मसल्स और भी टूटती हैं. यानी वर्ज़िश से तब फ़ायदा नहीं होता, जब आप प्रोटीन शेक वग़ैरह न लें. इसीलिए सप्लीमेंट बेचने वाली कंपनियां आप को बार-बार प्रोटीन शेक जैसी चीज़ें कसरत के फ़ौरन बाद लेने के लिए उकसाती हैं. ये बताती-समझाती हैं कि ये आपकी मसल्स बनाने के लिए ज़रूरी हैं. प्रोटीन शेक में व्हे प्रोटीन पाया जाता है, जो चीज़ बनाने का बाई-प्रोडक्ट है.

प्रोटीन सप्लीमेंट फ़ायदेमंद हैं?

रिसर्च कंपनी मिंटेल की 2017 की रिपोर्ट कहती है कि ब्रिटेन के 27 फ़ीसद लोग प्रोटीन बार या प्रोटीन शेक लेते हैं. जो लोग हफ़्ते में दो बार से ज़्यादा एक्सरसाइज़ करते हैं, उनको जोड़ लें, तो ये तादाद 39 फ़ीसदी पहुंच जाती है. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इनमें से 63 प्रतिशत को ये नहीं मालूम कि उन्हें ये पोस्ट वर्क आउट प्रोटीन शेक कितना फ़ायदा दे रहा है. वो ये भी नहीं बता पाते कि इसका कोई असर उन्हें पता चल रहा है या नहीं.

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Image caption 12.4 अरब डॉलर का है प्रोटीन सप्लीमेंट्स का बाज़ार

2014 में 36 रिसर्च का निचोड़ निकालकर ये कहा गया कि वर्ज़िश के शुरुआती दिनों में तो प्रोटीन डाइट लेने का फ़ायदा होता है. लेकिन उसके बाद इसके फ़ायदे के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.

जैसे-जैसे आपकी कसरत की आदत पड़ती जाती है, प्रोटीन शेक या प्रोटीन बार लेने के फ़ायदे कम होते जाते हैं. जानकार कहते हैं कि ऐसी प्रोटीन डाइट का फ़ायदा तब है, जब इसे कार्बोहाइड्रेट के साथ लिया जाए. हां, ये बात तय है कि प्रोटीन की ये मात्रा आपके बदन को हल्का और फिट रखने में मददगार होती है. आप ज़्यादा शारीरिक मेहनत कर पाते हैं.

लेकिन, अगर एथलीटों और जिम जाने वालों को प्रोटीन की एक्स्ट्रा डोज़ से फ़ायदा होता है तो इसका ये मतलब नहीं कि आप भी प्रोटीन सप्लीमेंट लेना शुरू कर दें. ब्रिटेन की स्टर्लिंग यूनिवर्सिटी में खान-पान के प्रोफ़ेसर केविन टिप्टन कहते हैं कि, 'ज़्यादातर लोगों को उनकी ज़रूरत भर से ज़्यादा ही प्रोटीन उनके खाने से मिल जाता है. किसी को सप्लीमेंट लेने की ज़रूरत नहीं है. आप आसानी से अपनी रोज़मर्रा की खाने-पीने की चीज़ों के ज़रिए पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन हासिल कर सकते हैं'.

सिर्फ़ प्रोटीन लेने से चल जाएगा काम?

केविन टिप्टन कहते हैं कि प्रोटीन बार कैंडी बार की तरह ही हैं. बस उनमें थोड़ा सा प्रोटीन होता है. टिप्टन ये भी कहते हैं कि बॉडी बिल्डरों को भी प्रोटीन बार वग़ैरह की उतनी ज़रूरत नहीं है, जितना शोर मचाया जाता है. टिप्टन के मुताबिक़ आज सप्लीमेंट लेने पर बहुत ज़ोर है. इसका बड़ा बाज़ार है.

केविन टिप्टन के मुताबिक़ आज आपकी अच्छी सेहत में सिर्फ़ प्रोटीन का रोल नहीं है. बल्कि आपको इसलिए अच्छी नींद आनी चाहिए. तनावमुक्त होना चाहिए और अपने खान-पान पर ध्यान देना चाहिए.

दूसरे एक्सपर्ट भी मानते हैं कि प्रोटीन की ज़रूरी मात्रा हमें अपने खाने के ज़रिए ही लेनी चाहिए. सप्लीमेंट इसका अच्छा ज़रिया नहीं हैं. लिवरपूल की जॉन मूर यूनिवर्सिटी के ग्रीम क्लोज़ कहते हैं कि सिर्फ़ एथलीटों को ही अलग से प्रोटीन लेने की ज़रूरत है. लेकिन वो भी अगर एक प्रोटीन शेक वर्ज़िश के बाद ले लें तो उतना पर्याप्त है.

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इसके अलावा बुज़ुर्गों को भी खान-पान के अलावा भी सप्लीमेंट के तौर पर प्रोटीन लेने की ज़रूरत होती है. ब्रिटेन की न्यूकैसल यूनिवर्सिटी की एमा स्टीवेंसन खान-पान के सामान बेचने वाली कंपनियों के साथ काम कर रही हैं. वो स्नैक्स में प्रोटीन मिलाने की जुगत निकाल रही हैं, ख़ास तौर से उन स्नैक्स में, जिन्हें बुज़ुर्ग ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं.

ग्रीम क्लोज़ कहते हैं कि जहां युवाओ को अपने वज़न के प्रति किलो के हिसाब से 0.75 ग्राम प्रोटीन की ज़रूरत होती है. वहीं बुज़ुर्गों को प्रति किलो वज़न पर 1.2 ग्राम प्रोटीन चाहिए.

ज़्यादा प्रोटीन से नुक़सान होता है?

अच्छी बात ये है कि आपका ज़्यादा प्रोटीन खाना इतना आसान नहीं है. कुछ डायटिशन इस बात को लेकर फ़िक्रमंद रहते हैं कि कहीं ज़्यादा प्रोटीन खाने से गु्र्दों पर असर न पड़ जाए. लेकिन तमाम सबूत बताते हैं कि ऐसा होता बहुत कम है.

अक्सर प्रोटीन का ताल्लुक़ वज़न घटाने से बताया जाता है. कम कार्बोहाइड्रेट वाले खान-पान से आपका वज़न कम होता है. कुछ प्रोटीन डाइट भी ऐसा करने में आपकी मददगार हो सकती हैं.

अगर आप सुबह प्रोटीन से भरपूर नाश्ता करते हैं, तो दिन में आप को भूख कम महसूस होती है. इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि प्रोटीन आपकी भूख को अच्छे से मिटाता है.

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Image caption प्रोटीन बॉल्स में ज़्यादा कैलरीज़ होती हैं और उनमें बड़ी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट भी हो सकते हैं

एबरडीन यूनिवर्सिटी की एलेक्स जॉन्सटन कहती हैं कि अपने खाने में कार्बोहाइड्रेट घटाकर और प्रोटीन से भरपूर खान-पान से आप आसानी से वज़न घटा सकते हैं. उनकी सलाह है कि आप को ऐसा खाना खाना चाहिए जिसमें 30 प्रतिशत प्रोटीन, 40 फीसद कार्बोहाइड्रेट और 30 प्रतिशत फैट हो. इससे आपको वज़न घटाने में काफ़ी मदद मिलेगी.

औसत खान-पान में 15 प्रतिशत प्रोटीन, 55 फ़ीसद कार्बोहाइड्रेट और 35 फ़ीसद फैट होता है. हां, अगर आप ये सोचें कि सिर्फ़ ज़्यादा प्रोटीन लेने से वज़न घट जाएगा तो आप मुग़ालते में हैं. चिकन या फ़िश खाना आपके लिए फ़ायदेमंद हो सकता है. वहीं रेड मीट और मटन आपके वज़न घटाने की कोशिशों पर पानी फेर सकते हैं. इन से कैंसर और दिल की बीमारियों का ख़तरा भी बढ़ जाता है.

माइकोप्रोटीन नाम का एक प्रोटीन ऐसा है, जो बिना मांस खाए भी आप को मिल सकता है. ये फफ़ूंद की कुछ प्रजातियों से मिलता है. इसमें फ़ाइबर भी होता है. हालांकि अभी इसके पूरे फ़ायदे समझने के लिए रिसर्च चल ही रही है.

कुल मिलाकर, ज़्यादा प्रोटीन खाने का खतरा कम है. अंदेशा इस बात का ज़्यादा है कि इसके चलते हम महंगे प्रोटीन सप्लीमेंट ख़रीदने लगते हैं. ये महंगे तो हैं ही, इनका सेहत पर भी बुरा असर पड़ने का डर है. क्योंकि, इनमें काफ़ी मात्रा में शुगर यानी कार्बोहाइड्रेट होता है, जो आपकी अच्छी सेहत पाने की कोशिश पर पानी फेरने के लिए काफ़ी है.

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