सिगरेट ना पीने वालों को फेफड़े का कैंसर क्यों

  • 5 जुलाई 2018
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फेफड़ों का कैंसर आज पूरी दुनिया में तेज़ी से फैलता जा रहा है. इससे जुड़े सबसे ताज़ा आंकड़े साल 2012 के हैं. उस साल फेफड़ों के कैंसर के 18 लाख नए मरीज़ सामने आए थे. इनमें से 58 फ़ीसदी विकासशील देशों के थे. लेकिन अमरीका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी फेफड़ों का कैंसर तेज़ी से फैल रहा है.

रिसर्च के मुताबिक़ ब्रिटेन में हर साल 45 हज़ार फेफड़ों के कैंसर के मरीज़ बढ़ जाते हैं. अमरीका में ये तादाद दो लाख तीस हज़ार और ऑस्ट्रेलिया में साढ़े बारह हज़ार मरीज़ सालाना है.

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फेफड़े के कैंसर के मरीज़ों की तादाद बढ़ी

पिछले कुछ दशकों में जिस तरह कैंसर के मरीज़ों की तादाद बढ़ी है, उनके हिसाब से मरीज़ों को बचाने के तरीक़ों में कोई ख़ास तेज़ी नहीं आई है. 1971 से 72 तक बीमारी पकड़ में आने के बाद तीन फ़ीसदी मरीज़ों को ही अगले दस साल तक जिंदा रखा जा सकता था.

2010 से 11 तक इसमें महज़ 2 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ. जबकि इसी दौर में ब्रेस्ट कैंसर से मरने वालों की तादाद में 34 फ़ीसदी तक गिरावट आई.

फेफड़ों के कैंसर के बारे में आम राय है कि ये सिगरेट पीने की वजह से होता है. अगर ये आदत छोड़ दी जाए तो कैंसर ठीक हो जाता है. जबकि ऐसा नहीं है. जो लोग सिगरेट नहीं पीते, उन्हें भी फेफड़ों का कैंसर हो जाता है. हां, इतना ज़रूर है कि औरतों के मुक़ाबले मर्दों में इसका ख़तरा ज़्यादा रहता है.

अमरीका में हर 15 में से एक मर्द को जबकि हर 17 में से एक औरत में ताउम्र फेफड़ों के कैंसर का ख़तरा बना रहता है.

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महिला लंग कैंसर मरीज़ों की संख्या बढ़ी

पर, हाल की रिसर्च साबित करती है कि लंग कैंसर वाले मर्दों की तादाद में कमी आई है. जबकि महिला मरीज़ों की तादाद बढ़ी है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की गई रिसर्च तो ये भी साबित करती है कि दुनिया भर में फेफड़ों के मर्ज़ वाले मर्दों की तादाद घटी है. जबकि ऐसी महिला मरीज़ों की तादाद 27 प्रतिशत बढ़ गई है.

बढ़ते आंकड़े के पीछे रिसर्चर कुछ ठोस वजह तो नहीं बता पाते. इतना ज़रूर कहा जाता है कि तंबाकू में पाए जाने वाले कार्सिनोजेन्स यानी ज़हरीले तत्व महिलाओं के डीएनए को ज़्यादा से तेज़ी से तबाह करते हैं.

चूंकि महिलाओं ने मर्दों के मुक़ाबले बाद में स्मोकिंग शुरू की है, लिहाज़ा उन पर इसके असर भी देर से ज़ाहिर हुए हैं. लेकिन जब से सिगरेट पीने या धूम्रपान के दूसरे तरीक़ों को महिला सशक्तीकरण और आज़ादी की मिसाल माना जाने लगा, तभी से महिलाओं में स्मोकिंग की लत और तेज़ी से बढ़ने लगी.

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स्मोकिंग का फैशन बड़ा कारण

रिसर्च साबित करती हैं कि जिन देशों में महिलाएं ज़्यादा सशक्त हैं, वहां स्मोकिंग का फ़ैशन ज़्यादा है. लेकिन ये बात सभी देशों पर लागू नहीं होती. स्मोकिंग के मामले में भी जेंडर गैप नज़र आता है. मिसाल के लिए अमरीका में 22 फ़ीसदी पुरुष और 15 फ़ीसदी औरतें सिगरेट पीते हैं.

ऑस्ट्रेलिया में ये आंकड़ा 19 और 13 फ़ीसदी का है. किशोरों के मामले में जेंडर गैप सिकुड़ जाता है. मिसाल के लिए अमरीका में 13 से 15 साल के 15 फ़ीसदी लड़के और 12 प्रतिशत लड़कियां स्मोकिंग करती हैं. जबकि ऑस्ट्रेलिया में 5 फ़ीसदी किशोर और किशोरियां सिगरेट पीते हैं. वहीं, फ़्रांस और ब्रिटेन में 15 साल की लड़कियां, लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा स्मोकिंग करती हैं.

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सिगरेट पीने से लंग कैंसर का ख़तरा 85 फ़ीसदी अधिक

सिगरेट पीने से फेफड़ों का कैंसर होने का ख़तरा 85 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. लेकिन ब्रिटेन के कैंसर रिसर्च के सीनियर प्रोफ़ेसर चार्ल्स स्वैन्टन का कहना है कि उन्हें ने अपनी प्रैक्टिस के दौरान लंग कैंसर के 5-10 फ़ीसदी ऐसे मरीज़ों को देखा है, जिन्होंने कभी स्मोकिंग नहीं की थी. ये फ़र्क़ महिलाओं में भी देखने को मिला.

फेफड़ों के कैंसर वाली हर पांच महिलाओं में एक मरीज़ ऐसी थी जिसने कभी सिगरेट नहीं पी थी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ सिगरेट नहीं पीने वाले लोग जब सिगरेट के धुएं के संपर्क में आते हैं, तो, उनमें लंग कैंसर की संभावना 20 से 30 फ़ीसदी बढ़ जाती है. इसकी वजह से हर साल दुनिया भर में चार लाख तीस हज़ार मौतें होती हैं. इनमें 64 फ़ीसदी महिलाएं होती हैं.

फेफड़ों के कैंसर के लिए सिगरेट का धुआं ही ज़िम्मेदार हो ऐसा भी नहीं है. चीन में जो महिलाएं बंद घरों में कोयले या लकड़ी की आंच पर खाना बनाती हैं, उन्हें भी ये मर्ज़ हो जाता है. भारत में भी कुछ ईंधन ऐसे हैं, जिनके धुएं से लंग कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है.

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सिगरेट नहीं पीने वाले मरीज़ भी बढ़े

रिसर्च साबित करती हैं कि ऐसे मरीज़ों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है, जिन्होंने कभी सिगरेट नहीं पी.

एक स्टडी के मुताबिक़ 2011-13 में एक ही क़िस्म के कैंसर के 17 फ़ीसदी लोग पाए गए. जबकि 1990 से 1995 में ये आंकड़ा 8.9 फ़ीसदी था.

ब्रिटेन में हुई एक रिसर्च के मुताबिक़ 2008 से 2014 में फेफड़ों के कैंसर का ऑपरेशन कराने वाले मरीज़ों की तादाद में 13 से 18 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. ताइवान में ऐसे मरीजों का आंकड़ा साल 1999 से 2002 में 31 फ़ीसदी था, जो 2008 से 2011 के बीच बढ़कर 48 फ़ीसदी हो गया.

सिगरेट पीने से होने वाला फेफड़ों के कैंसर और सिगरेट नहीं पीने से होने वाले लंग कैंसर में अंतर है. दोनों ही केस में अलग तरह के जीन बदलते और बिगड़ते हैं.

नॉन-स्मोकर्स में आम तौर से ईजीएफ़आर जीन में बदलाव होने से कैंसर होता है. लेकिन इसे नई असरदार दवाओं से कंट्रोल किया जा सकता है.

कोशिकाओं में गड़बड़ी पैदा होने से कैंसर का ख़तरा होता है. कार्सिनोजेनिक केमिकल, वायरस और अल्ट्रा वायोलेट रौशनी कोशिकाओं का डीएनए बिगाड़ देती हैं, जिससे कैंसर की संभावना पैदा हो जाती है. लेकिन कई तरह के कैंसर में सही कारण का पता नहीं चल पाता. शायद स्मोकिंग नहीं करने वालों के केस में भी ऐसा ही होता है.

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प्रदूषण भी लंग कैंसर की बड़ी वजह

इसके अलावा प्रदूषण भी कैंसर की बड़ी वजह है. इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के मुताबिक़ हर साल दुनिया भर में दो लाख 23 हज़ार फेफड़ों के कैंसर के मरीज़ों की मौत PM2.5s की वजह से होती है, जो डीज़ल के धुएं और धूल से निकलता है.

मरने वालों के इस आंकड़े में बड़ी संख्या चीन और पूर्व एशियाई देशों की है, जहां लगातार इमारतें बनने और औद्योगिकरण की वजह से हवा ज़हरीली हो रही है.

स्मोकिंग नहीं करने वाले अक्सर इस भ्रम में रहते हैं कि उन्हें कैंसर जैसी बीमारी नहीं हो सकती. इसीलिए शुरुआती स्टेज में मर्ज़ पकड़ में आने के बावजूद कंट्रोल नहीं हो पाता.

अक्सर ऐसे मरीज़ों का कैंसर एडवांस स्टेज में ही पकड़ में आता है. जिन मरीज़ों का शुरुआती स्टेज में मर्ज़ पकड़ में आ जाता है, उनमें से 70 फ़ीसदी मरीज़ों को सही इलाज देकर बचाया गया है. लेकिन जिनका एडवांस स्टेज में पता चला उनमें से सिर्फ़ 14 फ़ीसदी को ही बचाया जा सका.

रिसर्च पर पैसे बढ़ाने और सोच बदलने की ज़रूरत

डॉक्टरों के मुताबिक़ अगर सीने की कोई तकलीफ़ लंबे वक़्त तक एंटी बायोटिक लेने के बाद भी ठीक ना हो, तो, उसका तुरंत चेक-अप कराया जाना चाहिए. आप सिगरेट पीते हैं या नहीं, अगर मुंह से खून आने लगे तो ये लंग कैंसर की तरफ़ बड़ा इशारा करता है.

समाज में फेफड़ों के कैंसर को एक कलंक की तरह देखा जाता है. अगर ये स्मोकर्स को हो जाए तो ताना दिया जाता है कि सिगरेट पी कर बीमारी को खुद गले लगाया है. यही वजह है कि मरीज़ रिसर्च में भी शामिल नहीं होते. शायद इसीलिए लंग कैंसर की रिसर्च के लिए भी बहुत कम पैसा ख़र्च किया जाता है.

मिसाल के लिए फेफड़ों के कैंसर के मरीज़ों के मामले में कनाडा दुनिया का दूसरा बड़ा देश है. लंग कैंसर से 25 फ़ीसदी मौत होने के बावजूद सिर्फ़ 7 फ़ीसदी फंड ही इसकी रिसर्च पर ख़र्च किया जाता है.

वहीं ब्रिटेन ने फेफड़ों के कैंसर के मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए इस से लड़ने के रिसर्च का फंड बढ़ा दिया है.

लंग कैंसर पर जितनी रिसर्च की जा रही है उससे सकारात्मक नतीजों की उम्मीद है. फेफड़े का कैंसर छूत की बीमारी नहीं.

इस बीमारी पर रिसर्च के लिए जितने पैसे की दरकार है उतना ही समाज को सोच बदलने की ज़रूरत है.

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(ये नाओमी एलस्टर की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है)

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