पीने के बाद कुछ लोग गिर क्यों जाते हैं?

  • 20 जुलाई 2018
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सारा हेपोला ये बिल्कुल भूल चुकी थीं कि पिछली रात उनके साथ क्या हुआ था.

उन्हें बस इतना याद था कि पिछली रात एक पार्टी में वो कुछ लोगों से बात कर रही थीं. पर, इसके बाद क्या हुआ था, वो ये बिल्कुल भूल चुकी थीं.

एक रात पहले क्या हुआ?

सारा उस पार्टी में कैसे पहुँची? उनके हाथ में वो मुहर कैसे लगी? पिज़्ज़ा किसने ख़रीदा? उनके बगल में कौन आदमी था? इनमें से किसी भी सवाल का जवाब उनके पास नहीं था.

सारा उस सुबह को याद करके कहती हैं, "मेरे लिए ये सब बेहद अजीब था. मुझे कुछ नहीं पता कि क्या हुआ था. मैंने बात को हंसी में उड़ा दिया. मुझे लगा कि ये तो बहुत आम बात है".

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सारा के साथ याददाश्त गुम हो जाने की ऐसी घटनाएँ कई बार हो चुकी हैं और ये उनके साथ उम्र के शुरुआती दौर से हो रहा है.

सारा कहती हैं, "अक्सर मेरे साथ ऐसा होता था कि रात में किसी तहखाने का दरवाज़ा खुलता था. और सुबह मैं कहीं और ही नींद से जागती थी".

असल में सारा हेपोला शराब पीने के बाद बेहोश हो जा रही थीं. जिस मामले को वो हंसी में उड़ा रही थीं, वो असल में बहुत गंभीर नतीजे वाली बात हो सकती थी.

उस वक़्त उन्होंने मामले को सीरियसली नहीं लिया था. लेकिन शराब के साथ अपने उस रिश्ते को सारा अब बहुत बड़ा गड़बड़झाला मानती हैं.

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शराब पीने के बाद लोग अक्सर बहक जाते हैं. कुछ भी बोलने लगते हैं. कुछ भी करने लगते हैं. कोई कहता है वो ऐसा जान-बूझकर करते हैं. नशे में होने का फ़ायदा उठाकर दिल की भड़ास निकालते हैं.

वहीं, कुछ लोग कहते हैं कि नशा चढ़ने के बाद उन्हें कुछ याद ही नहीं रहता. आम लोगों के लिए ये बातें महज़ मज़ाक़ हो सकती हैं. लेकिन, मनोवैज्ञानिकों के लिए ये रिसर्च का विषय है.

शराब पीकर बहकना या बेहोश हो जाना आम बात है. हाल में क़रीब 20 हज़ार किशोरों पर हुए एक सर्वे के मुताबिक़ 20 फीसदी किशोर शराब पीने के बाद बेहोश हो जाते हैं.

अंग्रेज़ी में इसे 'ब्लैकआउट' कहते हैं. ज़्यादा नशे की सूरत में लोग क्या करते हैं, या उनके साथ क्या होता है, उन्हें कुछ याद नहीं रहता.

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सौ में से 60 लोग...

अमरीका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन अल्कोहल एब्यूज़ एंड एल्कोहलिज़्म के प्रोफ़ेसर आरोन व्हाइट का कहना है कि अब से 15 साल पहले तक इसे आम बात नहीं माना जाता था.

लेकिन अब मान लिया गया है कि अक्सर शराब लोगों के दिमाग़ पर चढ़ जाती है. उन्हें बेहोश भी कर देती है.

इसीलिए अब वैज्ञानिक इसकी वजहें तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही इसका नेगेटिव असर कम करने के तरीक़े पर भी ग़ौर किया जा रहा है.

ब्लैकआउट की स्थिति में याददाश्त पर कितना और कैसा असर होता है, ये जानने के लिए 1960 के दशक में डोनाल्ड गुडविन नाम के एक वैज्ञानिक ने कुछ शराबियों को अस्पताल में और कुछ को जॉब सेंटर में भर्ती किया.

रिसर्च में पाया गया कि:

  • 100 में से 60 से ज़्यादा शराब पीने के बाद बेहोश हुए.
  • इस दौरान कुछ की याददाश्त पूरी तरह चली गई, जबकि कुछ को टुकड़ों में कुछ बातें याद थीं.
  • कुछ लोगों को तो शराब पीते ही चढ़ गई, जबकि कुछ को पीने के क़रीब आधे घंटे बाद नशा हुआ.
  • शराब पीने से लेकर नशा चढ़ने तक जितने सवाल उनसे पूछे गए, उनका जवाब तो उन्होंने सही दिया. लेकिन होश में आने के बाद उन्हें कुछ याद नहीं था.
  • कुछ को बहुत याद करने पर कुछ बातें याद आ रही थीं. हालांकि नैतिकता के आधार पर आज इस तरह का तजुर्बा करना मुश्किल है.
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हिप्पोकैंपस

लेकिन, आधी सदी पहले हुए इस रिसर्च के आधार पर वैज्ञानिक कहते हैं कि शराब के नशे में बेहोश होने के दौरान दिमाग़ का वो हिस्सा जिसे हिप्पोकैंपस कहते हैं, कुछ वक़्त के लिए बिगड़ जाता है.

हिप्पोकैंपस दिमाग़ का वो हिस्सा होता है, जो तमाम तरह की जानकारियों को याददाश्त के लिए एक फाइल के तौर पर स्टोर करता है.

जिन लोगों के दिमाग़ के इस हिस्से पर असर ज़्यादा होता है, वो नई चीज़ें याद नहीं रख पाते.

शराब पीने पर हिप्पोकैंपस को जानकारी पहुँचाने वाले दिमाग़ के दो अन्य हिस्से फ़्रंटल लोब और अमेगडाला भी प्रभावित होते हैं.

फ़्रंटल लोब दिमाग़ का विचार बुद्धि वाला हिस्सा है. जबकि, अमेगडाला हमें ख़तरे के बारे में सतर्क करता है.

ख़ाली पेट या सोने से पहले शराब पीना ज़्यादा घातक होता है. अल्कोहल का ख़तरा इस बात पर भी निर्भर करता है कि कितनी जल्दबाज़ी में उसका सेवन किया जा रहा है.

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मर्दों और महिलाओं का मुक़ाबला

अगर 0.20 से 0.30 फ़ीसद अल्कोहल ख़ून में शामिल है, तो याददाश्त पूरी तरह काम करना बंद कर देती है.

लेकिन इसमें शरीर का वज़न और लिंग दोनों अहम होते हैं. इसीलिए जिन लोगों का वज़न कम होता है उनके दिमाग़ पर अल्कोहल का असर तेज़ी से होता है.

शराब पीने के बाद महिलाएं भी ख़ूब टल्ली होती हैं. हालांकि अल्कोहल लेने के मामले में मर्दों के मुक़ाबले उनकी संख्या कम है.

लेकिन उनके शरीर में चर्बी ज़्यादा होती है, जिसका मतलब है अल्कोहल को पतला करने के लिए उनके शरीर में पानी की मात्रा कम होती है. इसीलिए उनके ख़ून में शराब का असर ज़्यादा और तेज़ी होता है.

2017 की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़ मर्दों के मुक़ाबले तीन पैग कम लेने पर भी महिलाएं शराब पीकर बेहोश हो जाती हैं.

जबकि 2015 की एक रिसर्च के मुताबिक़ मर्दों के मुक़ाबले एक भी पैग ज़्यादा लेने वाली महिलाओं में मर्दों के मुक़ाबले बेहोश होने संभावना 13 फ़ीसद तक बढ़ जाती है.

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किशोरावास्था में असर

दिलचस्प बात है कि इस मामले में ख़ानदान या मां-बाप के रोल भी अहम हो जाते हैं.

रिसर्च के मुताबिक़ जिनकी मांओं को शराब पीने के बाद दिक़्क़त होती थी, उनके लिए ख़तरा ज़्यादा है.

दिमाग़ पर होने वाले असर के मामले में आनुवांशिक अंतर भी अहम रोल निभाता है.

चूहों पर की गई रिसर्च के मुताबिक़ बहुत ज़्यादा शराब का सेवन दिमाग़ में कई अन्य बदलावों को जन्म दे सकता है.

किशोरावस्था में दिमाग़ और शरीर दोनों ख़ुद को मज़बूत करने का प्रयास कर रहे होते हैं. ऐसे में अल्कोहल का नकारात्मक असर उनके दिमाग़ और शरीर दोनों पर पड़ता है.

दिमाग़ का फ़्रंटल लोब वाला हिस्सा 25 साल की उम्र तक विकसित होता है. लिहाज़ा किशोरावास्था में उस पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है.

ख़तरे का हसास

जिन महिलाओं को शराब पीने के बाद सब कुछ भूल जाने की आदत होती है, नशे में उनका सेक्शुअल बिहेवियर भी बदल जाता है. और अगले दिन उन्हें अपने किए पर पछतावा होता है.

आंकड़े बताते हैं कि जो महिलाएं शारीरिक हिंसा का शिकार हुई होती हैं, वो शराब के नशे में दोबारा आसानी से इसकी शिकार बन जाती हैं.

नशे की हालत में उनका दिमाग़ उन्हें ख़तरे का अहसास ही नहीं करा पाता. फ़ैसला लेने की क्षमता भी कमज़ोर हो जाती है.

ख़तरा नशा उतरने के बाद भी बना रहता है, क्योंकि उन्हें याद ही नहीं रहता कि नशे के वक़्त उनके साथ क्या हुआ था.

भले ही नशे की हालत में कोई रज़ामंदी दे दे. लेकिन हो सकता है कि वो इसके लिए तैयार ना हो. लेकिन जब कोर्ट में केस पहुँचेगा तो वहाँ इसे रज़ामंदी ही माना जाएगा.

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काउंसेलिंग और इलाज

सेक्स को लेकर पॉज़िटिव तौर पर हामी भरने के मामले में भी कई देशों के कानून अलग हैं और कई देशों के तो राज्यों में ही कानून बदल जाते हैं.

जैसे न्यूयॉर्क में दिमागी अक्षमता होने पर महिलाओं को रज़ामंदी को हामी नहीं माना जाता.

शराब पीने के बाद ब्लैकआउट होने का मतलब आंखें बंद करके बेसुध हो जाना ही नहीं है.

ब्लैकआउट का मतलब है दिमाग़ का सुन्न हो जाना. सोचने-समझने की क्षमता खो बैठना. हो सकता है देखने में हालत सामान्य लगे, लेकिन ऐसी हालत में दिमाग़ कोई नई जानकारी जमा नहीं करता.

अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिसौरी की मनोवैज्ञानिक मेरी-बेथ मिलर का कहना है कि नई तकनीक के सहारे ब्लैकआउट की समस्या को ख़त्म किया जा सकता है.

उन्होंने कई पूर्व सैनिकों और यूनिवर्सिटी के छात्रों पर तजुर्बा किया भी है. वो इसे पर्सनेलिटी नॉर्मेटिव फ़ीडबैक कहती हैं.

ऑनलाइन प्रशनपत्र के ज़रिए लोगों से उनकी शराब पीने की आदत संबंधी सवाल पूछे जाते हैं. जवाब के आधार पर उनकी काउंसेलिंग और इलाज होता है.

जिन्हें अंदाज़ा है कि वो शराब पीकर बहक जाते हैं और कुछ याद नहीं रहता, ऐसे लोगों को ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है.

ऐसी स्थिति का लोग नाजायज़ फ़ायदा उठा सकते हैं. शराब उतनी ही लें जितना पचा सकते हैं. अति किसी भी चीज़ की नुक़सानदेह है.

(येलेख मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है.अंग्रेज़ी में इस स्टोरी को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.)

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