अंतरिक्ष में महाशक्तियों को चुनौती देता ये नन्हा सा मुल्क़

  • जस्टिन कैल्डरन
  • बीबीसी फ़्यूचर
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आओ तुम्हें चांद पे ले जाएं...एक नई दुनिया बसाएं...

इन दिनों दुनिया में बहुत से लोग लगता है इस हिंदी फ़िल्मी गाने से प्रभावित हो गए हैं.

दुनिया भर के देशों के बीच अंतरिक्ष की रेस तेज़ हो रही है. आलम ये है कि बहुत-सी तकनीकी कंपनियों ने मंगल ग्रह पर इंसानों को बसाने की योजना भी तैयार कर ली है.

पर ऐसा लगता है कि वो धरती से कुछ ज़्यादा ही दूर इंसानों को आबाद करने के ठिकाने तलाश रहे हैं. धरती से परे अंतरिक्ष में ऐसे कई ठिकाने हैं जो इंसानों के लिए काम की जगह साबित हो सकते हैं. इस ठिकाने को तमाम छोटी-छोटी कंपनियां रोशन करने में जुटी हुई हैं.

नासा के वैज्ञानिक कहते हैं कि चांद पर इंसान की बस्तियां बसाने से एक बड़ा फ़ायदा होगा. आगे चलकर हम इसकी बुनियाद पर मंगल ग्रह पर बसने की रिहर्सल कर सकते हैं. चांद पर जो इंसान बस्तियां बसाने का काम करेंगे, इन्हें नौकरी देने वाले नासा जैसे बड़े संस्थान नहीं होंगे. इन्हें तो अंतरिक्ष में कारोबार करने की कोशिश कर रही छोटी कंपनियां नौकरी पर रखने वाली हैं.

और इनमें से कई कंपनियां आप को यूरोप के एक बहुत छोटे से देश लक्ज़मबर्ग में मिलेंगी.

नासा मानता है कि चांद पर अगले चार सालों में इंसानी बस्तियां बसाई जा सकती हैं. इस मौक़े को कई कंपनियां हाथ से नहीं जाने देना चाहती हैं.

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ऐसी ही एक कंपनी है आईस्पेस. आईस्पेस के सीईओ ताकेशी हाकामाडा का इरादा सिर्फ़ चांद पर इंसानों को बसाने तक सीमित नहीं है बल्कि वो तो चांद की खदानों से दुर्लभ खनिज निकालने के मिशन पर लगे हुए हैं.

यूं तो आईस्पेस का मुख्यालय टोक्यो में है, लेकिन उसने लक्ज़मबर्ग में भी ठिकाना बना रखा है. कंपनी का टारगेट है कि 2020 तक वो चांद का चक्कर लगाने वाला मिशन भेजे और 2021 में चांद की सतह पर अंतरिक्ष यान उतारने की कोशिश करे.

ताकेशी हाकामाडा कहते हैं, ''हमारे पहले दो मिशन हमारी तकनीकी क्षमता की नुमाइश करेंगे. इसके बाद हम चांद से सामान ढोकर लाने की अपनी क्षमता दुनिया को दिखाएंगे. अगर हम चांद पर पानी का स्रोत पा गए, तो इससे चांद में एक नए उद्योग की बुनियाद पड़ जाएगी. अगर चांद पर पानी मिल गया, तो ये इंसान के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. इसकी वजह से इंसान लंबे वक़्त तक धरती से दूर कहीं और वक़्त बिता सकेगा.''

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अंतरिक्ष में खनन

वैसे ब्रह्मांड में करियर और कारोबार तलाश रहे ताकामाडा अकेले शख़्स नहीं हैं. लक्ज़मबर्ग में इन दिनों 10 ऐसी कंपनियां रजिस्टर्ड हैं जो अंतरिक्ष में खनन के क्षेत्र में कारोबार करने की कोशिश कर रही हैं.

पांच लाख से थोड़ी ही ज़्यादा आबादी वाले लक्ज़मबर्ग में इतनी स्पेस कंपनियों के होने की वजह क्या है?

असल में लक्ज़मबर्ग ने फरवरी 2016 में स्पेस रिसोर्स लॉ यानी खगोलीय संसाधन क़ानून बनाया था. इसके तहत लक्ज़मबर्ग की सरकार ने 20 करोड़ यूरो से एक फ़ंड बनाकर स्पेस रिसर्च का काम कर रही कंपनियों को मदद देने का फ़ैसला किया.

साथ ही अंतरिक्ष से जुड़े क़ानूनों में भी काफ़ी ढील दी. इस क़ानून के तहत अंतरिक्ष में कारोबार करने वाली कंपनियों को काफ़ी टैक्स छूट भी लक्ज़मबर्ग देता है. यही वजह है कि आज इस छोटे से देश में 10 से ज़्यादा स्पेस माइनिंग कंपनियां काम कर रही हैं.

इन कंपनियों का टारगेट केवल चांद पर खनन नहीं है. ये कंपनियां चांद और धरती के बीच चक्कर लगा रहे उल्कापिंडो में भी दुर्लभ खनिज तलाश रही हैं.

चांद और धरती के बीच कम से कम 16 हज़ार उल्कापिंड हैं जिन पर दुर्लभ खनिज होने का अनुमान है. इन संसाधनों के दोहन की संभावना कई वैज्ञानिक जता चुके हैं. इनमें मशहूर खगोल वैज्ञानिक नील डेग्रास टाइसन भी हैं.

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अमरीका कंपनियां लक्ज़मबर्ग में

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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लक्ज़मबर्ग ने 2016 में जो क़ानून बनाया उसके चलते वो अमरीका के बाद दूसरा ऐसा देश बन गया जो अंतरिक्ष में संसाधनों की खोज को क़ानूनी मानता है. लक्ज़मबर्ग के वित्त मंत्रालय के अधिकारी पॉल ज़ेनर्स कहते हैं कि 2016 में ये क़ानून बनने के बाद क़रीब 200 कंपनियों ने उनकी सरकार से संपर्क किया है कि वो लक्ज़मबर्ग को अपना मुख्यालय बनाना चाहती हैं.

लक्ज़मबर्ग के अलावा सिर्फ़ अमरीका ही ऐसा मुल्क़ है जो अंतरिक्ष में संसाधनों की तलाश के कारोबार को क़ानूनी मान्यता देता है.

हालांकि, अमरीका के क़ानून में ये शर्त है कि ये काम करने के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वाली कंपनियों में 50 फ़ीसद पूंजी अमरीकी नागरिक की होनी चाहिए, लेकिन लक्ज़मबर्ग ने ऐसी कोई शर्त नहीं लगाई है. इसीलिए ताकामाडा की आईस्पेस जैसी कंपनियां टोक्यो के अलावा लक्ज़मबर्ग में भी दफ़्तर स्थापित कर रही हैं. इससे उनको काफ़ी टैक्स की बचत होगी.

हालांकि लक्ज़मबर्ग पर टैक्स चोरों का अड्डा होने के आरोप भी लगते हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में लक्ज़मबर्ग दुनिया का सबसे अमीर देश है. इसकी वजह यहां टैक्स की दरें कम होना भी है.

2016 में जब लक्ज़मबर्ग ने अंतरिक्ष से जुड़ा क़ानून बनाया तो कई अमरीकी कंपनियों ने यहां का रुख़ किया. जैसे कि डीप स्पेस इंडस्ट्रीज़ और प्लैनेटरी रिसोर्सेज़ ने यहां पर अपने ठिकाने बनाए हैं.

अंतरिक्ष के क्षेत्र में काम करने वाली निजी कंपनियों में प्लैनेटरी रिसोर्सेज़ सबसे पुरानी है. इसमें गूगल के सह संस्थापक लैरी पेज और वर्जिन ग्रुप के सर रिचर्ड ब्रैनसन ने पूंजी लगाई हुई है. हालांकि इस कंपनी ने लक्ज़मबर्ग में कितना निवेश किया है, ये बात सार्वजनिक नहीं की गई है.

आज की तारीख़ में स्पेस उद्योग का लक्ज़मबर्ग की अर्थव्यवस्था में 1.8 फ़ीसद का योगदान है. ये किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में अंतरिक्ष उद्योग के योगदान से ज़्यादा है.

हालांकि लक्ज़मबर्ग की ही क़ानूनी कंपनी एलेन ऐंड ओवेरी कहती है कि अंतरिक्ष के संसाधनों पर कोई भी देश हक़ जताने की इजाज़त नहीं दे सकता क्योंकि ये अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के ख़िलाफ़ है.

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अंतरिक्ष पर किसका दावा

जब 2015 में अमरीका ने अंतरिक्ष खनन का ऐसा ही क़ानून बनाया था तो रूस ने उस पर सख़्त एतराज़ जताया था.

बाह्य अंतरिक्ष में किसी भी गतिविधि को नियंत्रित करने के लिए 1967 में आउटर स्पेस ट्रीटी या संधि हुई थी. शीत युद्ध के दौर की इस संधि के तहत अंतरिक्ष के संसाधनों का कोई देश इकतरफ़ा तरीक़े से दोहन नहीं कर सकता है. न ही अंतरिक्ष के इलाक़े देशों ने आपस में बांटे हैं. इस समझौते पर 105 देशों ने दस्तख़त किए हुए हैं, लेकिन हाल ही में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने स्पेस फ़ोर्स बनाने का एलान करके इस समझौते को चुनौती दे दी है.

आउटर स्पेस ट्रीटी यानी OST की सबसे बड़ी ख़ामी ये है कि ये अंतरिक्ष के संसाधनों के मालिकाना हक़ को लेकर ख़ामोश है. इसीलिए लक्ज़मबर्ग और अमरीका जैसे देश अब क़ानून बनाकर स्पेस रिसोर्स पर हक़ जताने में लगे हैं. हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात ने भी ऐसा ही क़ानून बनाने के लिए लक्ज़मबर्ग से समझौता किया है.

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ज़ेनर्स कहते हैं कि उनके देश का क़ानून बाहरी अंतरिक्ष में संसाधनों की तलाश और दोहन को क़ानूनी जामा पहनाता है, लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं है कि वो इन संसाधनों पर अवैध कब्ज़े को बढ़ावा देता है.

अब अगर कुछ कंपनियों को अंतरिक्ष में दुर्लभ खनिज तलाशने और उन्हें धरती तक लाने में कामयाबी मिल गई तो इससे स्पेस रेस और भी दिलचस्प हो जाएगी. इससे सुदूर अंतरिक्ष में मिशन भेजने के रास्ते भी खुलेंगे.

अमरीका की डीप स्पेस इंडस्ट्रीज़ ने लक्ज़मबर्ग में अपना यूरोपीय मुख्यालय बनाया है. कंपनी के सीईओ बिल मिलर कहते हैं कि अमरीका और लक्ज़मबर्ग ने अंतरिक्ष क़ानून बनाकर एक शानदार पहल की है.

लेकिन अंतरिक्ष की ये रेस तभी और दिलचस्प होगी जब इन कंपनियों के हाथ कुछ ऐसा लगे जो ये बेच सकें. जो कारोबार के लिहाज से मुनाफ़े का सौदा हो. तब तक तो अंतरिक्ष कंपनियों के ऐसे बड़े दावों पर यक़ीन करना ज़रा मुश्किल है.

(नोटः ये डेविड रॉबसन की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिककरें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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