पुरुषों की तुलना में महिलाएं अंगदान को क्यों हो जाती हैं तैयार

  • 10 अगस्त 2018
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Image caption स्विटज़रलैंड में 631 किडनी ट्रांसप्लांट में से 22 फ़ीसदी में महिलाओं ने अपने पुरुष साथियों को अंग दिये. जबकि पुरुषों के मामले में यह तादाद महज़ 8 फ़ीसदी थी

2016 आते-आते मेरी मां के गुर्दों ने फिर से काम करना बंद कर दिया था. उनकी पहली किडनी का ट्रांसप्लांट, एक लाश से मिले गुर्दे से किया गया था. इसके लिए भी उन्हें लंबा इंतज़ार करना पड़ा था. लेकिन, इस बार जब मेरी मां की परेशानियां बढ़ीं, तो मेरी सब से छोटी मौसी, उन्हें किडनी देने के लिए तैयार थीं.

हम अक्सर देखते हैं कि कोई महिला अपने प्रिय के लिए अंगदान करने को तैयार हो जाती है. किडनी ट्रांसप्लांट में तो ये आम बात है.

अमरीका की बात करें तो, यहां किडनी दान करने वालों में 60 फ़ीसदी महिलाएं होती हैं. दूसरे देशों में भी गुर्दे दान करने वाले महिलाओं और पुरुषों का अनुपात कमोबेश यही रहता है.

लेकिन, अब तो पूरी दुनिया में अंगदान करने वाले पुरुषों की संख्या और भी कम हो रही है. यानी महिलाएं, आज पुरुषों की तुलना में ज़्यादा अंगदान कर रही हैं.

मज़े की बात ये है कि औरतों से अंगदान लेने वाले 59 फ़ीसदी मरीज़ मर्द होते हैं.

आज ज़्यादा पुरुषों को किडनी की ज़रूरत है, वहीं उन्हें ये अंग दान करने वाली ज़्यादा तादाद महिलाओं की है. इस वजह से न सिर्फ़ महिलाओं पर अंगदान का बोझ बढ़ रहा है, बल्कि, मर्दों की सेहत के लिए भी ये बड़ी चुनौती की बात है.

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Image caption अमरीका में किडनी दान करने वाले 10 लोगों में से छह महिलाएं हैं

मर्दों के मुकाबले छोटे होते हैं महिलाओं के अंग

अक्सर, मर्दों का शरीर, महिलाओं की किडनी को स्वीकार करने से इनकार कर देता है. अमरीका में 1998 से 2012 के बीच हुए दो लाख तीस हज़ार से ज़्यादा अंगदान के मामलों में, देखा गया कि अगर महिलाओं की किडनी पुरुषों को लगाई गई, तो उसके फ़ेल होने की आशंका ज़्यादा थी.

यही हाल दिल के ट्रांसप्लांट का दिखा. महिलाओं के दिल अगर पुरुषों में ट्रांसप्लांट किए गए, तो उनके अगले पांच साल में मरने की आशंका 15 फ़ीसदी तक बढ़ती दिखी.

अंगदान में इस लिंगभेद की बड़ी वजह, महिलाओं और पुरुषों के अंगों में फ़र्क़ को बताया जाता है. आम तौर पर महिलाओं के अंग, मर्दों के मुक़ाबले छोटे होते हैं.

अमरीकी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ रॉल्फ़ बार्थ, मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर से जुड़े हैं. वो कहते हैं कि लहीम-शहीम शख़्स को अगर छोटी कद-काठी की महिला की किडनी लगा दी जाएगी, तो वो भारी शरीर का वज़न नहीं उठा सकती. किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाले एक लाख पंद्रह हज़ार लोगों के बीच हुए सर्वे से पता ये चला कि अगर अंगदान देने और लेने वाले के शरीर के वज़न में 30 किलोग्राम का फ़र्क़ है, तो इस ट्रांसप्लांट के नाकाम रहने का डर बढ़ जाता है.

लेकिन, अगर महिला और पुरुष का वज़न एक है, तो भी, महिलाओं के अंग मर्दों के मुक़ाबले छोटे होते हैं.

जानकार कहते हैं कि अक्सर ट्रांसप्लांट के वक़्त सिर्फ़ शरीर के वज़न के नज़रिए से ही अंगों का मिलान किया जाता है. लेकिन, बात इतने से नहीं बनने वाली. अगर अंगदान करने वाली महिला है और इसे लेने वाला मर्द है. और, दोनों के वज़न में 10 से 30 किलो का ही फ़र्क़ है, तो भी, ट्रांसप्लांट फेल होने का ख़तरा रहता ही है.

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Image caption डोनर से मिलान में अंगों का आकार महत्वपूर्ण है लेकिन महिलाओं के अंगों का आकार पुरुषों के मुकाबले छोटा होता है, तब भी जबकि दोनों का वज़न समान हो

दिल का मामला

दिल के ट्रांसप्लांट में दूसरे पैमाने को अपना कर, डॉक्टर इस ख़तरे को कम कर लेते हैं.

अंगों के आकार के अलावा, पुरुषों और महिलाओं के शरीर में बीमारी से लड़ने वाले एंटीजेन भी अलग-अलग होते हैं. हालांकि साइंस की तरक़्क़ी से इस मेडिकल चुनौती पर काफ़ी हद तक क़ाबू पा लिया गया है.

आज ट्रांसप्लांट के दौरान, शरीर के इम्यून सिस्टम को सुन्न करने के लिए नई दवाएं आ गई हैं, ताकि अंगदान लेने वाले का शरीर नए अंग को स्वीकार कर सके.

हालांकि अंगदान को लेकर लिंगभेद के दूसरे मोर्चे भी हैं. अमरीका में अश्वेत महिलाओं पर हुए रिसर्च से पता चला कि मर्दों के मुक़ाबले उनके लिए अंगदान की ज़रूरत कम समझी जाती है. जबकि उनके लिए अंग देने को ज़्यादा लोग तैयार होते हैं. हालांकि ज़्यादा वज़न वाली महिलाओं को कम ही अंग दान में मिलते हैं.

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Image caption महिलाओं के लिए अंगदान की चुनौती का सामना करना मानसिक रूप से आसान होता है

महिलाएं ज़्यादा जज़्बाती

मर्दों के मुक़ाबले औरतें ज़्यादा अंगदान क्यों करती हैं, इसकी कई वजहें हैं.

पहली तो ये है कि महिलाएं, पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा जज़्बाती होती हैं. उन्हें अपने परिजनों से ज़्यादा हमदर्दी होती है. फिर पुरुषों की किडनी फेल होने और ट्रांसप्लांट की आशंका ज़्यादा होती है.

स्विटज़रलैंड में 631 किडनी ट्रांसप्लांट में से 22 फ़ीसदी में महिलाओं ने अपने पुरुष साथियों को अंग दिये. जबकि कुल पुरुषों की तादाद महज़ 8 प्रतिशत थी.

सिर्फ़ जीवनसाथी के लिए ही नहीं, महिलाएं अपने बच्चों, भाई-बहनों या दूसरे परिजनों को भी ख़ूब अंग दान करती हैं.

इसकी बड़ी वजह आर्थिक बताई जाती है. अमरीका हो या कोई और देश हर जगह घर चलाने का बोझ अक्सर मर्दों के ऊपर होता है. बीमारी या ट्रांसप्लांट के दौरान, दान देने वाले को अक्सर महीने-दो महीने के लिए घर बैठना पड़ता है. इससे दोहरा आर्थिक नुक़सान होता है. इसलिए अक्सर महिलाओं को ये लगता है कि अंग दान कर के वो घर को होने वाला आर्थिक नुक़सान कम कर सकती हैं.

स्विटज़रलैंड जैसे देश जहां, अंगदान करने वाले को होने वाले आर्थिक नुक़सान की भरपाई सरकार पैसे से कर देती है, वहां भी अंगदान करने का बोझ अक्सर महिलाएं ही उठाती हैं.

हालांकि सभी लोग महिलाओं के अंगदान की वजह आर्थिक नहीं मानते.

मैरीलैंड मेडिकल सेंटर की कैथी क्लीन-ग्लोवर कहती हैं कि महिलाएं आम तौर पर दूसरों का ध्यान रखती हैं. बच्चों की परवरिश हो या घर का ख़याल रखना, ये काम महिलाएं सदियों से करती आई हैं.

अक्सर घर की परेशानियों को दूर करने के लिए लोग महिलाओं की तरफ़ उम्मीद भरी नज़र से देखते हैं.

तो, जब किसी को अंगदान की ज़रूरत पड़ती है, तो उसके लिए भी महिला की तरफ़ से उम्मीद की जाती है.

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Image caption अक्सर घर की परेशानियों को दूर करने के लिए लोग महिलाओं की तरफ़ उम्मीद भरी नज़र से देखते हैं. ठीक इसी तरह अंगदान के मामले में भी होता है

बलिदान की भावना

आम तौर पर महिलाएं, दूसरे का ख़याल रखती हैं. सामाजिक दबाव और चलन यही है कि घर का ख़याल रखना महिलाओं की ज़िम्मेदारी है.

यही वजह है कि मिस्र से लेकर मेक्सिको तक, ज़रूरत पड़ने पर महिलाओं से ही अंगदान की अपेक्षा की जाती है. ख़ास तौर से बच्चों को ज़रूरत पड़ने पर ये माना जाता है कि जिस मां ने पैदा कर के ज़िंदगी दी, वो ही एक अंग का दान कर के दोबारा ज़िंदगी दे सकती है.

महिलाएं आम तौर पर सेहत की बड़ी चुनौती जैसे जचगी (प्रसव) से गुज़र चुकी होती हैं. तो, उनके लिए अंगदान की चुनौती का सामना करना मानसिक रूप से आसान होता है.

क्लीन-ग्रोवर कहती हैं कि उन्होंने अंगदान करने वाली जितनी भी महिलाओं से बात की, उनमें से ज़्यादातर इसी वजह से अंग देने को राज़ी हुई थीं.

लेकिन, ट्रांसप्लांट की सबसे बड़ी चुनौती ये होती है, कि अंग लेने वाले का शरीर नए अंग को स्वीकार कर ले. चूंकि मां बच्चे को जन्म देते वक़्त उसके एंटीजेन से वाबस्ता हो चुकी होती है, तो बच्चे के शरीर के उसके अंग को रिजेक्ट करने की आशंका बढ़ जाती है.

जानकार मानते हैं कि मेडिकल रिसर्च से भविष्य में इस चुनौती से पार पा लिए जाने की उम्मीद है.

शायद तब महिलाओं के प्रति सोच भी बदले और मर्द भी ख़ुद को अंगदान करने के लिए ज़िम्मेदार समझने लगें.

(नोटः ये मौली केंड्रिक की मूल कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)

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