ख़तरे में क्यों हैं ब्रह्मपुत्र के द्वीप पर रहने वाले ये लोग

  • जूल्स मोंटागुए
  • बीबीसी फ़्यूचर
ब्रह्मपुत्र

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उत्तराखंड से लेकर केरल तक इस वक़्त देश के कई हिस्से बारिश और बाढ़ की मार झेल रहे हैं. कहीं घरों और दुकानों में पानी भर रहा है तो कहीं मकान ढह रहे हैं.

लोग घर बार छोड़ सुरक्षित स्थानों पर जा रहे हैं. लेकिन जिनके पास कोई आसरा नहीं, वो वहीं रहने को मजबूर हैं.

ज़रा सोचिए अगर ऐसे में किसी को मेडिकल हेल्प की ज़रूरत पड़ जाए तो क्या होगा.

ब्रह्मपुत्र पर रहने वाले लोग

भेकली-1 असम का ऐसा ही द्वीप है, जो अक्सर बाढ़ की मार झेलता है.

ये द्वीप ब्रह्मपुत्र नदी के पास है. इसे सपोरी या चार्स के नाम से भी जाना जाता है.

ब्रह्मपुत्र नदी हिमालय से निकलती है और अपने साथ बड़ी मात्रा में रेत और गाद लाती है.

इसी गाद से सपोरी द्वीप का निर्माण हुआ है, जिस पर करीब 25 लाख लोग रहते हैं. ये असम की कुल आबादी का आठ फ़ीसद है.

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एक वक़्त था जब यहां के लोग बाढ़ आने पर इलाज की कमी से मर जाते थे. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. अब यहां के लोगों को ब्रह्मपुत्र बोट क्लीनिक का सहारा है.

बोट क्लीनिक है सहारा

बोट क्लीनिक कैसे काम करती है, ये आपको बताएंगे लेकिन उससे पहले सपोरी द्वीप की भौगोलिक स्थिति जान लेते हैं.

कहा जाता है कि पहले ब्रह्मपुत्र नदी अपने आज के रास्ते से बहुत दूर बहती थी. लेकिन 1987 की बाढ़ के बाद ये इलाक़ा खाली करा कर लोगों को दूसरी जगहों पर भेज दिया गया.

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बाढ़ तो गुज़र गई, लेकिन लोगों की मुसीबत कम नहीं हुई. सपोरी द्वीप असम के मुख्य भू-भाग से दूर ब्रह्मपुत्र नदी के पास बसता है.

इस नदी का पानी ना सिर्फ़ असम की सरज़मीन को उपजाऊ बनाता है, बल्कि यहां के लोगों को उजाड़ने की ताक़त भी रखता है.

जलवायु परिवर्तन के चलते यहां बाढ़, मिट्टी के कटाव और भूकंप का ख़तरा हर वक़्त मंडराता रहता है.

सपोरी लोग जो यहां कच्चे घरों में रहते हैं, उन्हें हर वक़्त अपना आशियाना उजड़ने का डर सताता रहता है.

ये लोग यहां क़रीब एक सदी से रह रहे हैं, लेकिन बाढ़ आने पर घर उजड़ने का सिलसिला आज भी जारी है.

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अमेज़न और कांगो बेसिन के मुक़ाबले ब्रह्मपुत्र का दायरा काफ़ी बड़ा है. इस नदी की ख़ामोशी डराने वाली है.

क्योंकि तेज़ बारिश, लैंडस्लाइड और बाढ़ जब इसका मूड बिगाड़ते हैं तो ये तबाही लाती है. लोग बेघर होते हैं, रिलीफ़ कैंपों में भीड़ बढ़ जाती है, फसलें बर्बाद हो जाती है.

ब्रह्मपुत्र की डराने वाली ख़ामोशी

1950 से अब तक यहां क़रीब 25 बड़े सैलाब आ चुके हैं. 1977 में आई बाढ़ में करीब 11,000 लोगों की मौत हुई थी. जुलाई 2012 में आए सैलाब में क़रीब बीस लाख लोग बेघर हुए थे.

पिछले साल सितंबर महीने में एक और बड़ा सैलाब आया जिसमें पंद्रह लाख लोग बेघर हुए थे.

ऐसे सैलाबों में सबसे बुरा हाल सपोरी लोगों का होता है. ये लोग असम के मुख्य आबादी वाले इलाक़ों से दूर रहते हैं. ऐसे में इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता.

लेकिन इनका मसीहा बने पत्रकार, रिसर्चर, फिल्म मेकर और पॉलिसी विश्लेषक संजॉय हज़ारिका.

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उन्होंने मेडिकल सहायता के अभाव में सैलाब में फंसी एक गर्भवती महिला की कहानी सुनी थी. जिसे सुनकर उनका दिल पसीज गया और उन्होंने सपोरी लोगों की मदद करने की ठान ली.

उन्होंने ब्रह्मपुत्र बोट क्लीनिक नाम की यूनिट तैयार की. जिस पर बुनियादी चिकित्सा सेवा की सारी सुविधाएं मौजूद है.

संजॉय हज़ारिका ने ये सेवा साल 2005 में महज़ एक बोट से शुरू की थी. लेकिन आज ऐसी क़रीब 15 बोट 250 स्टाफ़ के साथ असम के 13 ज़िलों में काम कर रही है.

इस बोट क्लीनिक की टीमें हर साल क़रीब साढ़े तीन लाख लोगों तक मदद पहुंचाती हैं.

तंत्र-मंत्र से इलाज़ तक का सफर

मेडिकल सुविधा पहुंचने के पहले तक यहां के लोग बीमारियों का मुक़ाबला तंत्र-मंत्र से करते थे.

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समाप्त

काला जादू के चलते लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता था. ऐसी ही एक मरीज़ हैं, 70 साल की बुज़ुर्ग तिकश्री पेगु जिन्हें बीस साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ा था. उन्होंने तंत्र-मंत्र पर भरोसा किया.

नतीजा ये कि उनका दाहिना हाथ बेकार हो गया. हालांकि तंत्र-मंत्र में भी जड़ी बूटियों का इस्तेमाल होता था.

लेकिन, जागरूकता बढ़ने के बाद अब काला जादू को यहां ग़ैर कानूनी घोषित कर दिया गया है. जबकि देसी जड़ी बूटियों से इलाज का सिलसिला आज भी जारी है.

पानी और घने जंगलों के नज़दीक रहने की वजह से यहां के लोगों को बीमारियां भी विचित्र प्रकार की होती हैं.

सुअर का गोश्त यहां के लोगों की बुनियादी ख़ुराक है, जिसे अधपका ही खा लिया जाता है. जिससे लोगों के शरीर में टेपवर्म होने की शिकायत आम बात है.

बोट क्लीनिक पर लोगों को इससे बचने का इलाज किया जाता है. इसके अलावा फैमिली प्लानिंग की सलाह और उसका तरीक़ा भी समझाया जाता है. हाई ब्लड प्रेशर, मलेरिया, त्वचा संबंधी बीमारियां, जिनका इलाज लोगों को अब तक नहीं मिल पाता था, क्लीनिक बोट पर उपलब्ध है.

रास्ता बदलती रहती है ब्रह्मपुत्र

बोट मास्टर बिपुल पेयेंग पिछले दो दशकों से ब्रह्मपुत्र नदी में ये नाव क्लीनिक चला रहे हैं. उनका कहना है कि यहां जीपीएस जैसी तकनीक काम नहीं करती, क्योंकि ये नदी अपना रास्ता बदलती रहती है.

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1950 में आए भूकंप के बाद ब्रह्मपुत्र नदी ने हमेशा के लिए अपना रास्ता बदल लिया और नदी अपने साथ क़रीब 45 अरब टन रेत, तलछट और गाद लेकर आई, जिससे यहां उपजाऊ भूमि तैयार हुई.

आज भी ये नदी दुनिया की सबसे ज़्यादा तलछट लाने वाली नदी है. लेकिन अब इस नदी से अन्य कई और नदियां नकल गई हैं. जिसकी वजह से तलछट वाली ज़मीन कटने लगी है.

मिट्टी के कटाव की वजह से ही चाय के बाग़ान, 18 शहर और ढाई हज़ार छोटे-छोटे गांव तबाह हो गए हैं. और क़रीब पांच लाख लोग इससे प्रभावित हुए हैं.

2005 से 2010 के दरमियान ही 880 गांव और लगभग 37000 घर पूरी तरह बर्बाद हो गए.

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जानकारों के मुताबिक़ बढ़ते प्रदूषण और तापमान से तिब्बत के पठार पर जमी बर्फ़ और हिमालय के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं.

इससे ब्रह्मपुत्र नदी पर बने बांधों और नदी दोनों का जलस्तर बढ़ेगा. हो सकता है इससे ब्रह्मपुत्र नदी एक बार फिर अपना रास्ता बदल ले.

जल्द रास्ता बदल सकती है ब्रह्मपुत्र

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ नदी में जलस्तर बढ़ने से मिट्टी के कटाव में इज़ाफ़ा होगा. इससे सैलाब का ख़तरा 25 फ़ीसद सैलाब और सूखे का ख़तरा 75 फ़ीसद तक बढ़ जाएगा.

सैलाब और मिट्टी के कटाव से इलाक़े के इको-सिस्टम को भी ख़तरा है. यहां की ज़मीन दलदली है.

बांस के जंगल और चाय के बाग़ान नदी के ज़रख़ेज़ बेसिन में ही हैं. इसके अलावा यहां दो वर्ल्ड हेरिटेज साइट हैं क़ाज़ीरंगा और मानस जो एक सींग वाले दरियाई घोड़े, हाथी, चीता, भैंस, गोल्डन लंगूर, बारहसिंघों और शेर के लिए मशहूर हैं.

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लेकिन बाढ़ आने से इन सभी को खतरा हो जाता है. 2017 में आए सैलाब में क़ाजीरंगा के 346 जानवर मरे थे.

ब्रह्मपुत्र नदी में डॉल्फ़िन भी हैं, जिनकी प्रजाति लुप्त होती जा रही है. दुनिया भर में केवल 1200 मीठे पानी वाली डॉल्फ़िन बची हैं जिनमें से 300 सिर्फ़ ब्रह्मपुत्र नदी में हैं. लेकिन नदी में बढ़ने वाली गंदगी और शिकार ने इन के लिए ख़तरा पैदा कर दिया है.

ब्रह्मपुत्र घाटी में 220 से भी ज़्यादा जातियों के लोग रहते हैं, जो लगभग 45 ज़बानें बोलते हैं, और ना जाने कितने तरह के रस्मो रिवाज और मज़हबों को मानते हैं.

हालांकि, नौजवान पीढ़ी असम के बड़े शहरों में बस रही है, लेकिन खेती ही आज भी ब्रह्मपुत्र के द्वीपों के बाशिंदों के लिए रोज़गार का बड़ा ज़रिया है.

बाढ़ और मिट्टी के कटाव से खेती की ज़मीन अब कम पड़ने लगी है और ये ब्रह्मपुत्र घाटी में रहने वालों के लिए चिंता का विषय है.

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