इसलिए पूरी दुनिया को बदलनी होंगी खाने की आदतें

  • 25 अगस्त 2018
किसान

मलक्का जल संधि के पास एक फलों का बागीचा है. इसके मालिक लिम कोक अन्न के पास केडोनडॉन्ग नाम के फल का पेड़ है.

लिम के फ़ार्म में केडोनडॉन्ग का केवल एक पेड़ बचा है. केडोनडॉन्ग कुरकुरा और खट्टा फल होता है. मलेशिया में लोग इसे अचार और सलाद में इस्तेमाल करते हैं.

लिम कोक अन्न कहते हैं कि लोगों को इस फल के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है. इसलिए इसकी डिमांड नहीं है. यही वजह है कि लिम अनानास और दूसरे फलों की खेती पर ज़्यादा ध्यान देते हैं. वो कहते हैं कि जिस चीज़ की मांग ही नहीं है, उसको उगाने से क्या फ़ायदा. मुनाफ़ा न हो तो कोई भी फल क्यों उगाया जाए?

लेकिन, लिम कोक के बागीचे से कुछ ही दूरी पर स्थित एक विशाल प्रयोगशाला में कुछ और ही हो रहा है. मलेशिया के ग्रामीण इलाक़ों से दूर स्थित इन तीन विशाल चांदी सरीखे चमकीले गुम्बदों के नीचे वैज्ञानिक खान-पान के भविष्य को बदलने में जुटे हैं.

यहां काम करने वाले वैज्ञानिक इंसान के खान-पान का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. ताकि मौजूदा चीज़ों पर हमारी निर्भरता कम हो और हम केडोनडॉन्ग जैसे फल भी अपने खाने में शामिल करें.

मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में क्रॉप्स फॉर फ्यूचर यानी भविष्य की फ़सलों पर तजुर्बे करने वाले ग्लोबल रिसर्च सेंटर का मुख्यालय है.

यहां पर केडोनडॉन्ग जैसे बहुत कम इस्तेमाल होने वाले फल से ऐसा जूस तैयार किया गया है, जो शुगर-फ्री है. इसमें विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में है और जो स्वाद के पैमानों पर भी खरा उतरता है.

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पेड़-पौधे जिन्हें भुला दिया गया

सीएफएफ के बागीचों के बीच टहलते हुए इसके प्रमुख सैयद आज़म अली कहते हैं, ''यहां पर आप जो भी पेड़-पौधे देख रहे हैं, वो सभी भुला-बिसरा दिए गए हैं.'

इस बागीचे में दुबले-पतले मोरिंगा के पेड़ हैं. क्रीम कलर की मूंगफली जैसी बाम्बरा के पौधे हैं, खट्टे केडोनडॉन्ग की झाड़ियां हैं. ये वो पौधे हैं जिन्हें इंसान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सदियों तक उगाता रहा था. मगर अब इन्हें भुला दिया गया है.

अब इन पौधों के मूल स्थान के सिवा कहीं और नहीं जाना जाता. यहां तक कि इनके अपने देश में भी पौधों की इन प्रजातियों को भुला दिया गया है.

सीएफएफ के प्रमुख सैयद आज़म अली कहते हैं कि दुनिया की चार प्रमुख फ़सलों की ऐसी 'दागागीरी' है कि बाक़ी सभी चीज़ें नेपथ्य मे धकेल दी गई हैं.

प्रोफ़ेसर अली कहते हैं कि, 'केवल चार फ़सलें, गेहूं, मक्का, चावल और सोयाबीन दुनिया के दो-तिहाई खाने की ज़रूरतें पूरी करती हैं. हम दुनिया का पेट भरने के लिए इन चार फ़सलों पर ही निर्भर हैं. लेकिन, दुनिया भर में ऐसी सात हज़ार से ज़्यादा फ़सलें हैं, जो इंसान हज़ारों सालों से उगाता आया है. हम इन सब की अनदेखी कर रहे हैं.'

अब रिसर्चर इन नज़रअंदाज़ फ़सलों में भविष्य के खान-पान की संभावनाएं तलाश रहे हैं. वैज्ञानिक इन फ़सलों को भूली-बिसरी, कम इस्तेमाल की जाने वाली या वैकल्पिक फ़सलें कहते हैं.

इसकी वजह ये है कि दुनिया की चार प्रमुख फ़सलों के बेतहाशा इस्तेमाल से खान-पान की तमाम चीज़ें बस उन्हीं से बनती हैं. स्थानीय फ़सलों की अनदेखी की जा रही है.

वैसे, ये तलाश बहुत सही वक़्त पर शुरू की गई है. आज की तारीख़ में दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक तिहाई खान-पान के उद्योग से होता है. संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य संगठन के मुताबिक़ 2050 तक हमें आज के मुक़ाबले 50 फ़ीसद ज़्यादा खाद्य पदार्थ उपजाने होंगे, तभी उस वक़्त की 10 अरब हो चुकी आबादी का पेट भरा जा सकेगा. इस मांग को बिना पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाए नहीं पूरा किया जा सकता.

अगर हम अपने मौजूदा खान-पान के तरीक़ों पर ही अमल करते रहे, तो जैव विविधता को और भी नुक़सान पहुंचेगा और धरती के इकोसिस्टम को भी क्षति पहुंचेगी. यानी हमें जल्दी ही खान-पान की दिशा में बड़ा बदलाव करना होगा. सीएफफ यानी क्रॉप्स फॉर फ्यूचर का रिसर्च इसीलिए हो रहा है.

सीएफएफ के मुताबिक़ भूली-बिसरी फ़सलों से हम इन चुनौतियों का हल ढूंढ सकते हैं. जिन स्थानीय पौधों की अनदेखी हो रही है, उन्हें उगाने पर ज़ोर दे कर तमाम देश आयातित फ़सलों पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं. इससे पर्यावरण प्रदूषण को भी नियंत्रित किया जा सकता है.

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'खाद्य असुरक्षा नहीं खाद्य अज्ञानता'

दुनिया की बदलती आबो-हवा से मौजूदा फ़सलों पर ख़तरा मंडरा रहा है. अगर हम इन भूली-बिसरी फ़सलों को फिर से अपने खान-पान का हिस्सा बना लेते हैं, तो किसी भी देश की खान-पान को लेकर दूसरे देशों पर निर्भरता भी कम होगी.

वो खाने के मामले में आत्मनिर्भर होंगे और पर्यावरण को भी कम नुक़सान होगा. साथ ही हम ज़्यादा पौष्टिक आहार भी स्थानीय स्तर पर जुटा सकेंगे. आज़म अली कहते हैं कि, 'इंसानियत के बेहतर भविष्य के लिए खान-पान में विविधता लाना ज़रूरी है.'

खाद्य सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञ भी ये बात मानते हैं.

सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के इंस्टिट्यूट ऑफ़ वाटर पॉलिसी की रिसर्चर सेसिलिया टोर्टाजाडा कहती हैं, ''इस वक़्त दुनिया में खाद्य असुरक्षा नहीं, खाद्य अज्ञानता है. जब भी हम स्थानीय फ़सलों को देखते हैं, तो उनकी अनदेखी कर देते हैं. हम ये समझते हैं कि उनकी कोई क़ीमत नहीं जबकि सच ये है कि ऐसी स्थानीय फ़सलें बेशक़ीमती हैं.'

सैयद आज़म अली को भी इस बात का अच्छा तजुर्बा है. ऐसी उपेक्षित फ़सलों की तरफ़ उनका ध्यान 80 के दशक में उस वक़्त गया था, जब वो अफ्रीकी देश नाइजर में कुछ महिला किसानों से मिले थे. उस वक़्त आज़म अली पढ़ाई कर रहे थे.

उन्होंने देखा था कि नाइजर की महिलाएं अपने घरों के किचेन गार्डेन में ऐसे कई स्थानीय पौधे उगा रही थीं, जो उनकी खान-पान की ज़रूरतें पूरी करते थे. ये काम वो महिलाएं बिना किसी तकनीकी मदद के कर रही थीं. जब भी बड़ी फ़सलें नष्ट होती थीं, तो महिलाओं के किचेन गार्डेन में उगने वाले पौधे ही काम आते थे.

सैयद आज़म अली ने इन महिलाओं से प्रेरणा लेते हुए सोचा कि वैकल्पिक फ़सलों पर रिसर्च को आगे बढ़ाना चाहिए. हालांकि वो उन दिनों को याद कर के कहते हैं कि जब उन्होंने पहले-पहल ये प्रस्ताव दिया, तो इसका बहुत विरोध हुआ था.

विरोध के बावजूद सैयद आज़म अली अपने इरादों से डिगे नहीं. अपने तमाम तजुर्बों से आज़म अली ने साबित किया है कि अलग-अलग माहौल में उगने वाले ये उपेक्षित पौधे हमारे अभी के खान-पान की प्रमुख फ़सलों का विकल्प हो सकते हैं. बड़ा सवाल ये था कि क्या इन फ़सलों को उगाने से मुनाफ़ा कमाया जा सकता है? इन फ़सलों की मार्केटिंग करके खपाना आज़म अली के लिए अगली बड़ी चुनौती बन गया.

कुआलालम्पुर की रिसर्च लैब के उन तीन गुम्बदों में से एक के नीचे खाद्य विशेषज्ञ टैन चिन लिन एक हरे रंग की लेई को तेज़ी से मथ रही हैं.

इसमें उन्होंने मोरिंगा की पिसी हुई पत्तियों को गेहूं के आटे में मिला कर तैयार किया है. इस तैयार हुए बैटर से वो ऐसा केक तैयार कर रही हैं, जिसमें ग्लूटेन कम होगा और पोषक तत्व ज़्यादा.

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फ़सलों की अनदेखी

इस प्रयोगशाला में चिन लिन का काम है, उपेक्षित फ़सलों से ऐसे व्यंजन तैयार करना, जिसकी स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग हो. जिन्हें खाना लोग पसंद करें.

हाल के कुछ बरसों में चिन लिन ने मोरिंगा की पत्तियों और बम्बारा मूंगफ़ली की मदद से इंस्टैंट सूप से लेकर इटैलियन बिस्कोटी और टॉर्टेलिनि ही नहीं, भारत में ख़ूब पसंद किया जाने वाला मुरुक्कू भी तैयार किया है.

चिन लिन कहती हैं कि, 'मेरी कोशिश ये होती है कि मै भूली-बिसरी फ़सलों को नए रंग-रूप में लोगों को खाने के लिए पेश करूं. इसलिए पुरानी रेसिपी के बजाय कुछ नया तैयार करती हूं.'

चिन एक पेशेवर शेफ़ भी हैं. चिन और उनकी टीम दुनिया में तेज़ी से फैल रहे मध्यम वर्ग की फास्ट फूड की मांग को इन फ़सलों से पूरा करने की कोशिश कर रही हैं. वो लोगों को ये संदेश देना चाहती हैं कि भूले-बिसरे पौधे गरीब लोगों का खाना नहीं हैं.

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स्थानीय पौधों और फ़सलों को लेकर ऐसी सोच लोगों के ज़हन में गहरे बैठी है. जैसे कि अफ़्रीका की बम्बारा मूंगफली. अफ़्रीका के सहारा देशों में पैदा होने वाली ये फली प्रोटीन से भरपूर होती है. ये दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देशों में भी उगाई जाती है.

औपनिवेशिक दौर में ये फ़सल हाशिए पर धकेल दी गई. सैयद आज़म अली बताते हैं कि उस दौर में जो महिलाएं इसे उगाती थीं उन्हें सज़ा दी जाती थी. औपनिवेशिक हुकूमतें कहती थीं कि इसमें तेल नहीं निकलता, तो इसे मत उगाओ.

लेकिन, आज की तारीख़ में बम्बारा से बना हुआ मुरुक्कू सीएफएफ का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन है. अब इसे किराने की दुकानों से लेकर बड़े रिटेल स्टोर्स में बेचने की तैयारी हो रही है.

आज बम्बारा में क्विनोआ की तरह ही लोकप्रिय होने की उम्मीद देखी जा रही है. आज से 30 साल पहले क्विनोआ को इसके मूल स्थान यानी लैटिन अमरीकी देश बोलीविया और पेरू के सिवा शायद ही कोई जानता था. लेकिन आज ये पौष्टिक अनाज दुनिया के तमाम देशों में परोसा जा रहा है.

असल में इन फ़सलों की अनदेखी की बड़ी वजह है कि इन्हें उपज की तादाद के पैमाने पर तोला गया जबकि होना ये चाहिए था कि इन्हें पौष्टिकता के लिहाज़ से देखा जाना चाहिए था. 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद से ज़्यादा उपज वाली फ़सलों की खेती पर दुनिया भर में ज़ोर दिया जाने लगा.

उस दौर में ये ज़रूरी भी था, ताकि तबाही लाने वाले अकालों से बचा जा सके. लोगों को भर-पेट खाना मुहैया कराया जा सके.

लेकिन, आज पोषण एक टाइम बम बन चुका है, क्योंकि हवा में बढ़ती कार्बन डाई ऑक्साइड से फ़सलों के खनिज ख़त्म हो जाते हैं.

सैयद आज़म अली कहते हैं कि पुरानी और ज़्यादा उगाई जाने वाली फ़सलों को पौष्टिक बनाने में ज़ोर लगाने से बेहतर है कि इन उपेक्षित फ़सलों को उगाने पर ज़ोर दिया जाए.

सीएफएफ के तीसरे गुम्बद के नीचे लैब प्रबंधक गोमती सेतुरमन एक अलग ही तजुर्बा कर रहे हैं. यहां पर उपेक्षित रही फ़सलों पर धरती के बढ़ते तापमान और कार्बन डाई ऑक्साइड के असर को समझने की कोशिश हो रही है. इस रिसर्च के नतीजे उत्साहित करने वाले हैं. भविष्य में अगर धरती का तापमान और बढ़ता है, प्रदूषण और फैलता है, तो यहां उगाई जा रही फ़सलें ही सबसे ज़्यादा सेहतमंद होंगी.

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लुभा रहा है इम्पोर्टेड खाना

भूले-बिसरे पौधों को लेकर पूरी दुनिया में जागरूकता बढ़ रही है. अमरीकी थिंक टैंक फूड टैंक के अध्यक्ष डेनियल नीरेनबर्ग कहते हैं कि सीएफएफ के अलावा कई और संगठन भी हैं, जो इस काम में जुटे हैं.

क्रॉप ट्रस्ट, स्लो फूड इक्रीसैट और बायोडायवर्सिटी इंटरनेशनल नाम के संगठन भी खान-पान की बायोडायवर्सिटी यानी खान-पान में और ज़्यादा पौधों को शामिल करने का काम कर रहे हैं.

अब अगर इन कोशिशों में उस बढ़ते मिडिल क्लास को भी जोड़ दिया जाए, जो सेहतमंद खाने की तलाश ज़ोर-शोर से कर रहा है, तो हमें इन कोशिशो का भविष्य शानदार दिखाई देता है.

डेनियल नीरेनबर्ग कहते हैं कि किसान और ख़ास तौर से महिलाएं काफ़ी समय से वैकल्पिक खान-पान पर ज़ोर देती रही हैं. तमाम घरों में बीजों को सहेजकर रखा जाता है. ताकि तरह-तरह के अनाज उपजाए जा सकें. ये सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आ रहा है.

दिक़्क़त ये है कि हम पश्चिमी देशों के ज़्यादा चीनी और फैट वाले प्रसंस्कृत यानी प्रॉसेस्ड फूड के आदी होते जा रहे हैं. इम्पोर्टेड खाना हमें ज़्यादा लुभाता है.

स्थानीय खान-पान की हम अक्सर अनदेखी करते हैं. विदेशी खाने को स्टेटस सिम्बल माना जाता है. लेकिन अब बहुत से होटल और रेस्टोरेंट स्थानीय खान-पान को बढ़ावा देते हैं. पुराने दौर में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों से बने व्यंजन परोसते हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के फूड पॉलिसी प्रोफ़ेसर टिम लैंग कहते हैं कि, 'जलवायु परिवर्तन के असर से हमारे स्वाद में बदलाव आने तय हैं. हमें दूसरी फ़सलें खाने की आदत डाल लेनी चाहिए. क्योंकि जो अभी की प्रमुख फ़सलें हैं, उनका उत्पादन कम होने वाला है.'

सैयद आज़म अली कहते हैं कि वैकल्पिक फ़सलों को विकसित करने के लिए निवेश जुटाना अभी सबसे बड़ी चुनौती है. लोगों को ये पहल दिलचस्प तो लगती है, मगर इसका बाज़ार फिलहाल उन्हें नहीं दिखता.

इसीलिए अब सैयद आज़म अली और उनका संगठन सीएफएफ स्थानीय लोगों को अपनी कोशिशों से जोड़ने की कोशिश कर रहा है. लोगों को खान-पान की विरासत सहेजने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.

पिछले साल सीएफएफ ने फॉरगॉटेन फूड नेटवर्क यानी भूले-बिसरे खाने के नेटवर्क की शुरुआत की. इसका उद्घाटन ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स ने किया. इसके तहत दुनिया भर से ऐसी रेसिपी जुटाई जाएंगी, जो स्थानीय उपज से तैयार होती हैं.

इसके सीईओ कहते हैं, 'भूले-बिसरे खान-पान हमारी पारिवारिक विरासत का हिस्सा हैं. अगर हम उस जानकारी को नहीं सहेजते, तो दस हज़ार साल पुराना इतिहास एक पीढ़ी में ही ख़त्म हो जाएगा.'

उनकी कोशिश है कि ऐसा न होने पाए.

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