हवाई सफ़र की दुनिया बदल देंगे ये बैटरी वाले विमान

  • 2 सितंबर 2018
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Image caption ज़ुनुम एरो का प्रस्तावित विमान

हाल ही में भारत में पहली बायोफ़्यूल कमर्शियल फ़्लाइट ने उड़ान भरी. देहरादून से दिल्ली की इस उड़ान में जो ईंधन इस्तेमाल हुआ, उससे प्रदूषण भी कम फैलेगा और उड़ान का ख़र्च भी कम होगा.

हवाई सफ़र सस्ता हो, पर्यावरण के लिए मुफ़ीद हो, इसके लिए दुनिया भर में कोशिशें हो रही हैं. उत्तरी यूरोपीय देश नॉर्वे ने इस कोशिश में बाज़ी मार ली है.

इसी साल जुलाई महीने में नॉर्वे के परिवहन मंत्री केटिल स्लोविक-ओस्लेन और नॉर्वे की एयरपोर्ट कंपनी एविनॉर के प्रमुख डाग फ़ॉक-पीटरसन ने एक छोटी-सी उड़ान भरी थी. ये बहुत ही ख़ास फ़्लाइट थी.

मीडिया के हुजूम की मौजूदगी में ये दोनों लोग एक टू-सीटर विमान पर सवार हुए. इस विमान को स्लोवेनिया की कंपनी पिपिस्ट्रेल ने बनाया था. इसका नाम है अल्फ़ा इलेक्ट्रो जी-2. विमान को ख़ुद फ़ॉक-पीटरसन उड़ा रहे थे. इस फ़्लाइट ने नॉर्वे की राजधानी ओस्लो के कुछ चक्कर लगाए.

अब आप को इस उड़ान की ख़ूबी बताते हैं. पहले तो आप विमान के नाम से ही समझ गए होंगे. और नहीं समझे तो ये जान लीजिए कि ये विमान पूरी तरह से इलेक्ट्रिक था. यानी बैटरी से उड़ रहा था.

तो इस विमान की उड़ान से इलेक्ट्रिक विमानों का ख़्वाब हक़ीक़त में तब्दील हो गया है.

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Image caption नॉर्वे एक बड़ा देश है जहां कई सारी छोटी हवाई पट्टियां हैं

नॉर्वे का बड़ा लक्ष्य

वैसे स्लोविक-ओल्सेन और फ़ॉक-पीटरसन ये उड़ान मौज-मस्ती के लिए नहीं भर रहे थे. असल में नॉर्वे ने बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. वो 2040 तक प्रदूषण का स्तर बहुत कम करने का इरादा रखता है. आज से 22 साल बाद नॉर्वे का इरादा सभी छोटी फ़्लाइट को इलेक्ट्रिक विमानों से पूरा करने का है.

विमानों से होने वाले प्रदूषण को घटाने की ये सबसे बड़ी योजना है. दिक़्क़त ये है कि अभी दुनिया में ऐसा कोई यात्री विमान नहीं बना है, जो कमर्शियल उड़ानों के लिए मुफ़ीद हो.

यूं तो दुनिया में कई कंपनियां इलेक्ट्रिक विमान बना रही हैं. मगर वो सभी ऐसे ही छोटे विमान हैं, जैसे विमान में नॉर्वे के परिवहन मंत्री ने उड़ान भरी थी. लेकिन एविनॉर के प्रमुख फ़ॉक-पीटरसन का कहना है कि ये हालात बहुत जल्द बदलने वाले हैं. आज से कुछ साल पहले नॉर्वे की तमाम विमान कंपनियों के मालिक यही मानते थे कि इलेक्ट्रिक विमान दूर की कौड़ी हैं. मगर आज वो हक़ीक़त बन चुके हैं.

कई कंपनियां बना रही हैं इलेक्ट्रिक विमान

दुनिया की दो बड़ी कंपनियां एयरबस और बोइंग, दोनों ही इलेक्ट्रिक विमान विकसित करने पर काम कर रही हैं. बोइंग ने इसके लिए ज़ुनुम एरो नाम की कंपनी बनाई है, जो नासा के साथ मिलकर इस मिशन पर काम कर रही है.

नॉर्वे छोटा-सा देश है. इसका ज़्यादातर इलाक़ा पहाड़ी है. छोटी दूरियों के लिए सड़क से जाने की बजाय उड़ान भरना बेहतर होता है. यानी यहां छोटी दूरी की उड़ानों के लिए काफ़ी संभावनाएं हैं. ख़ुद एविनॉर कंपनी नॉर्वे में 46 हवाई अड्डे चलाती है. एविनॉर के प्रमुख फ़ाक-पीटरसन कहते हैं कि सर्दियों में नॉर्वे की सड़कों पर चलना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसलिए लोग फ्लाइट से चलते हैं. नॉर्वे में ऐसी बहुत-सी उड़ानें हैं, जो 15 से 30 मिनट में पूरी हो जाती हैं.

अब नॉर्वे की कोशिश है कि उसे 25-30 सीटों वाले विमान मिल जाएं जो इलेक्ट्रिक ऊर्जा से चलते हों. यहां का परिवहन मंत्रालय बैटरी से चलने वाले विमानों की उड़ान 2025 से शुरू करना चाहता है.

क्षमता बढ़ाने की कोशिशें जारी

इंटरनेशनल कंसल्टिंग कंपनी रोलां बर्जर का कहना है कि इस वक़्त दुनिया भर में इलेक्ट्रिक विमान बनाने के 100 से ज़्यादा प्रोजेक्ट पर काम हो रहा है. नॉर्वे में जिस विमान ने उड़ान भरी, उसे बनाने वाली स्लोवेनिया की पिपिस्ट्रेल इन में से एक है. इस कंपनी के प्रवक्ता टाजा बोस्कैरोल कहते हैं कि उनकी कंपनी कई फ़ोर-सीटर विमान बना रही है. इनमें से एक है टॉरस जी-4 जो दुनिया का पहला इलेक्ट्रिक फ़ोर सीटर विमान होगा.

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Image caption स्लोवेनिया की पिपिस्ट्रेल कंपनी ने बिजली से चलने वाले हल्के विमान बनाए हैं

टाजा बोरस्कैल कहते हैं कि उन्होंने हाइब्रिड ईंधन से चलने वाले विमान भी बनाए हैं. ये विमान 2019 तक उड़ान के लिए तैयार होगा.

पिपिस्ट्रेल का मानना है कि उसके विमान ट्रेनिंग के काम में इस्तेमाल हो सकेंगे. वो 2025 तक 19 मुसाफ़िरों को ले जा सकने वाला फ़्यूल सेल विमान भी बनाने पर काम कर रहे हैं.

पिपिस्ट्रेल का सीधा मुक़ाबला बोइंग की सहयोगी कंपनी ज़ुनुम एरो से है. ज़ुनुम एरो इससे भी बड़े विमान बनाने पर काम कर रही है. इसके सीईओ आशीष कुमार कहते हैं कि नॉर्वे की पहल से उनका हौसला बढ़ा है.

ज़ुनुम एरो शुरुआत में छोटी दूरी की उड़ान के लिए 12 सीटों वाला विमान विकसित कर रही है. इसके 2022 तक उड़ान भरने की उम्मीद है. इसके बाद कंपनी 50 सीटों वाला बैटरी चालित विमान बनाएगी जो एक हज़ार मील तक उड़ान भर सकेगा. कंपनी का इरादा 2020 के दशक के आख़िर तक 100 सीटों वाला इलेक्ट्रिक विमान विकसित करने का है.

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Image caption ज़ुनुम एरो की योजना 2020 तक कई तरह के विमान बनाने की है

बैटरी का वज़न मुख्य चुनौती

विमानों को उड़ाने में बहुत ईंधन लगता है. मुसाफ़िरों और उनके सामान का वज़न उठाए हुए आसमान में उड़ना मामूली काम तो है नहीं. ऐसे में विमानों की ईंधन की ज़रूरत बैटरी के ज़रिए पूरी करना चुनौती भरा है क्योंकि बैटरी से ईंधन तो मिल जाएगा, मगर उनका ख़ुद का वज़न भी विमानों को उठाना पड़ेगा. ज़ुनुम एरो के आशीष कुमार कहते हैं कि 'बड़ी चुनौती ये है कि विमान में लगे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को क्या बैटरी से लगातार चलाया जा सकता है?'

अगर इलेक्ट्रिक विमान छोटी दूरी की उड़ानों के लिए ही तैयार किए जाते हैं तो इससे बैटरी के बोझ वाली दिक़्क़त दूर हो जाएगी.

दुनिया भर में बड़े विमान 4000 मील तक की दूरी तय करने के लिहाज से बनाए जाते हैं. मगर इनमें से 80 फ़ीसद केवल 1500 मील तक की दूरी तय करने के लिए काम में लाए जाते हैं. आशीष कुमार कहते हैं कि समय आ गया है कि छोटी दूरी के लिए ऐसे भारी-भरकम विमान न इस्तेमाल हों. इनकी जगह बैटरी से उड़ने वाले विमान ले सकते हैं.

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Image caption ज़ुनुम एरो के आशीष कुमार कहते हैं कि छोटे रूटों के लिए अभी भी लंबी दूरियों के लिए बनाए गए विमान चलाए जाते हैं

छोटे विमान फ़ायदेमंद रहेंगे

छोटे विमानों के कई फ़ायदे हैं. वो ईंधन कम खाएंगे. उनके लिए बड़े एयरपोर्ट बनाने की ज़रूरत नहीं होगी. वो ज़्यादा शोर नहीं मचाएंगे, यानी प्रदूषण भी कम होगा. ऐसे विमान उड़ाने का ख़र्च कम होगा. इससे हवाई सफ़र सस्ता होगा. सस्ते टिकट का मतलब ये है कि ज़्यादा लोग हवाई सफ़र कर सकेंगे.

इस वक़्त जो बड़े विमान हैं वो बहुत ईंधन खाते हैं. बहुत प्रदूषण फैलाते हैं. जैसे कि बोइंग का 787 ड्रीमलाइनर 1.3 मेगावाट बिजली पैदा करता है. इतनी बिजली से 850 घरों की बिजली की ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं.

एविनॉर के फ़ॉक-पीटरसन कहते हैं कि बैटरी से चलने वाले शुरुआती विमानों में शायद हाइब्रिड इंजन इस्तेमाल हों. मतलब ये कि वो फ़िलहाल इस्तेमाल होने वाला ईंधन भी बैटरी के साथ-साथ इस्तेमाल करेंगे.

इसके बाद हवाई अड्डों पर रिचार्जिंग की सुविधा भी मुहैया करानी होगी. जैसे इन दिनों ऊबर जैसी कंपनियां जगह-जगह चार्जिंग प्वाइंट लगाती हैं. जहां उनके ड्राइवर बैटरी रिचार्ज कर सकते हैं.

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Image caption क्या विमान चार्ज करना इलेक्ट्रिक कार करने जैसा आसान हो जाएगा?

अगर नॉर्वे का मिशन सफल होता है, यहां 90 मिनट से ज़्यादा देर तक उड़ने वाले इलेक्ट्रिक विमान तैयार हो जाते हैं तो इसका असर दूसरे यूरोपीय देशों पर भी होगा.

विमान बनाने वाली कंपनियां जैसे एयरबस पहले से ही 100 सीटों वाले बैटरी चालित विमान के डिज़ाइन पर काम कर रही हैं.

वैसे इलेक्ट्रिक विमानों के लिए बुनियादी ढांचे का विकास भी बड़ी चुनौती है. विमानों की बैटरी चार्ज करने का इंतज़ाम खर्चीला है. नॉर्वे तो धनी देश है. दूसरे देशों को ऐसा बुनियादी ढांचा विकसित करने में पैसे और वक़्त दोनों लगाने पड़ेंगे.

तब तक फ़ॉक-पीटरसन जैसे पायलट, विमान को हवाई अड्डे पर उतारेंगे, उन्हें चार्जिंग पर लगाएंगे और आराम करेंगे. बैटरी चार्ज होगी तब तक वो आराम कर चुके होंगे और नए सफ़र पर निकल जाएंगे.

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